पति की लंबी उम्र के लिए सुहागिन महिलाएं रखेंगी, वट सावित्री व्रत

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  • जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्व

राजेन्द्र गुप्ता 

वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ माह में दो बार किया जाता है। पूर्व और उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को किया जाता है, जबकि दक्षिण और मध्य भारत में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को किया जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखद दांपत्य जीवन की कामना के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं।

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वट सावित्री व्रत कब है?

पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 16 मई, शनिवार को सुबह 5 बजकर 12 मिनट पर लगेगी और रात में एक बजकर 31 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। उदयातिथि को देखते हुए वट सावित्री व्रत 16 मई को किया जाएगा।

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वट सावित्री व्रत पूजा मुहूर्त

इस दिन पूजा के लिए शुभ समय अभिजीत मुहूर्त का रहेगा। सुहागिन महिलाएं 16 मई को सुबह 11 बजकर 50 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 44 मिनट तक शुभ मुहूर्त में पूजा कर सकती हैं।

वट सावित्री व्रत में बरगद पर जरूर अर्पित करें ये चीजें

वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा के दौरान सूती वस्त्र, लाल फूल, सिंदूर, कच्चा सूत, अक्षत (अटूट चावल), जनेऊ, चंदन और पान-सुपारी अर्पित करने चाहिए। वट वृक्ष के पास घी का दीपक जलाएं और श्रद्धा अनुसार, पेड़ की 7 या 108 बार परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत या मौली (लाल/पीला धागा) लपेटें। ऐसा करने से वैवाहिक संबंध मजबूत होते हैं।

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इस भोग के बिना अधूरा है वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत में भीगे हुए चने (चने की दाल) का विशेष महत्व है, इसे सावित्री और सत्यवान को अर्पित करें। इसके बिना भोग पूरा नहीं माना जाता है। पूजा में 5 प्रकार के ऋतु फल (जैसे आम, जामुन, केला, तरबूज, खरबूज, नारियल पानी) भी जरूर शामिल करें। पूजा में गुड़ से बनी मिठाई या गुड़ से बनी मीठी पूरी भी अर्पित कर सकते हैं।

देवी सावित्री को शृंगार की सामग्री अर्पित करें

वट सावित्री व्रत में माता सावित्री की भी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। उनको सिंदूर, कुमकुम, मेहंदी, चूड़ियां और बिंदी जैसी शृंगार की सामग्री जरूर चढ़ाएं। मान्यता है कि माता सावित्री को सुहाग का सामान चढ़ाने से व्रती महिला को ‘अखंड सौभाग्य’ का आशीर्वाद मिलता है।

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वट सावित्री व्रत पूजा विधि

  • इस दिन सुहागिन महिलाओं को सुबह स्नान करके नए वस्त्र और सोलह श्रंगार करना चाहिए।
  • शाम के समय बरगद के पेड़ के नीचे माता सावित्री की पूजा करें।
  • पूजन सामग्री को पेड़ की जड़ में चढ़ाएं।
  • इसके बाद वट वृक्ष को प्रसाद का भोग लगाएं और धूप-दीपक दिखाएं।
  • इस के बाद हाथ जोड़कर माता सवित्री से पति की लंबी उम्र की कामना करें।
  • वट वृक्ष के चारों ओर 7 बार परिक्रमा करते हुए कच्चे धागे या मोली को 7 बार लपेटें।
  • अंत में बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर माता सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें।

वट सावित्री व्रत पर क्यों होती है बरगद के पेड़ की पूजा

हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को वट वृक्ष और अक्षय वट के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद के पेड़ की जड़ में ब्रह्मा जी, तने में जगत के पालनहार भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन इसी पेड़ के नीचे माता सावित्री ने अपने पति को पुनर्जीवित कराया था। इसलिए विवाहित महिलाएं पति कि दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए इसकी पूजा करती है।


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