भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट के निर्णय से संत समाज में खुशी की लहर

हाईकोर्ट
  • भोजशाला मामले में कोर्ट के फैसले पर स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती का बड़ा बयान

लखनऊ । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा धार स्थित भोजशाला को ऐतिहासिक एवं संरक्षित वाग्देवी मंदिर मानने संबंधी दिए गए महत्वपूर्ण फैसले पर अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती ने प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने इसे “भारत की सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक सत्य की विजय” बताते हुए कहा कि न्यायालय ने पुरातात्विक तथ्यों, ऐतिहासिक प्रमाणों तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर यह निर्णय देकर करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान किया है।

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स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती ने कहा कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि भोजशाला एक ऐतिहासिक और संरक्षित स्थल है, जो देवी सरस्वती का मंदिर है। न्यायालय ने ASI एक्ट के प्रावधानों तथा अयोध्या विवाद फैसला में स्थापित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय भारतीय संस्कृति, शिक्षा और ज्ञान परंपरा के प्रतीक मां वाग्देवी के सम्मान का विषय है।

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उन्होंने कहा कि अदालत द्वारा ASI के वर्ष 2003 के उस आदेश को रद्द करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें हिंदुओं को भोजशाला में नियमित पूजा-अर्चना के अधिकार से वंचित किया गया था। साथ ही, मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति देने वाले आदेश को भी निरस्त कर दिया गया है। स्वामी जी ने कहा कि अब केंद्र सरकार और ASI को न्यायालय की भावना के अनुरूप मंदिर प्रबंधन और श्रद्धालुओं की धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि वर्षभर मां सरस्वती की पूजा, हवन और वैदिक अनुष्ठान निर्बाध रूप से संपन्न हो सकें। उन्होंने कहा कि भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है। राजा भोज के काल से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर का संबंध शिक्षा, संस्कृत और भारतीय दर्शन की गौरवशाली परंपरा से रहा है। ऐसे में इस स्थल की मूल पहचान को स्थापित करना ऐतिहासिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष द्वारा रखे गए तर्कों का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि यह स्पष्ट रूप से बताया गया कि भोजशाला ASI द्वारा संरक्षित स्मारक है, इसलिए उस पर प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता। हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि भोजशाला का उल्लेख प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम की सूची में दर्ज है। इसी आधार पर अदालत ने ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाणों को महत्व दिया। उन्होंने कहा कि अदालत में हिंदू पक्ष ने यह भी मांग की थी कि 7 अप्रैल 2003 को ASI द्वारा जारी आदेश को निरस्त किया जाए तथा भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय कर उसे पूर्ण रूप से हिंदू समाज को सौंपा जाए। अब हाईकोर्ट के निर्णय ने उस मांग को मजबूत आधार प्रदान किया है। मुस्लिम पक्ष द्वारा फैसले की समीक्षा और सुप्रीम कोर्ट जाने की बात पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती ने कहा कि भारत का संविधान सभी को न्यायिक प्रक्रिया अपनाने का अधिकार देता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आगे भी सभी पक्ष शांति, संयम और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करेंगे। उन्होंने कहा कि समाज में सौहार्द बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है और किसी भी प्रकार का तनाव या टकराव देशहित में नहीं है।

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उन्होंने धार शहर काजी वकार सादिक द्वारा फैसले के सम्मान की बात कहे जाने का भी स्वागत किया और इसे सकारात्मक संकेत बताया। स्वामी जी ने कहा कि भारत की संस्कृति संवाद, सहिष्णुता और न्याय की परंपरा पर आधारित रही है। ऐसे में सभी समुदायों को न्यायालय के निर्णयों का सम्मान करते हुए सामाजिक समरसता को मजबूत करना चाहिए। जैन समाज द्वारा भोजशाला को जैन तीर्थ बताए जाने और मां वाग्देवी की प्रतिमा को मां अंबिका की प्रतिमा कहे जाने पर स्वामी जी ने कहा कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों का इतिहास बहुआयामी रहा है। उन्होंने कहा कि सभी पक्षों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही अंतिम निर्णय होना चाहिए। फिलहाल भोजशाला परिसर के मुख्य द्वार पर बैरिकेडिंग कर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।


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