
धीरे धीरे मैने जीवन जान लिया।
रंग बदलती दुनियां को पहचान लिया।।
सत्ता बदली शासन बदली… बदल गए इंसान।
जिसको देव समझ बैठा था वे निकले हैवान।।
घोर निराशा हुई मगर पहचान लिया।
सब कुछ मेरा भ्रम था मैने जान लिया।।
साधु वेष धारण कर रावण आया था।
जनक नंदिनी ने भी धोखा खाया था।।
अबलाये़ं अब भी न सुरक्षित हो पाईं।
चीर हरण की घटना हर युग मे छाई।।
अब द्रोपदी भला क्या संबल पायेगी।
कौन बढ़ाये चीर? कृष्ण ला पायेगी।।
सत्ता का सिंहासन ही शोषक होगा।
फिर किसके प्रति न्याय मिलेगा?क्या होगा।।
अंधे युग मे सारे राजा अंधे हैं।
सत्य सुशाशन.. ये सब इनके धंधे हैं।।
राम नाम का सत्य भला ये क्या जाने?
सत्ता लोलुप ,सिंहासन ही सच मानें।।
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