लखनऊ तिरछी नज़र: तवायफ़ी सीजफायर, नमाज़ बख्शवाने निकली थी, रोज़े गले पड़े

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लखनऊ में नवाब नसीरुद्दीन हैदर का ज़माना चल रहा था। तवायफ़ी, कबूतरबाज़ी, मुर्ग़बाज़ी आदि अपनी चरम पे थी। लखनऊ की हवा में एक अज़ब सी रवानगी थी।

इन्ही दिनों लखनऊ में दो रईस नवाब सलमान अली और नवाब शाहरुख ख़ान के बड़े चर्चे थे। दोनों ही बड़े रईस शौकीन मिजाज कुनबे के चश्मोचिराग थे।

दोनों के कुनबे के शजरे बताते थे दोनों के पुरखों ने कुफ़्र का रास्ता छोड़ दीन की राह पकड़ी थी। दोनों ही पक्के पाबंदी थे – बस एक ही समस्या थी। दोनों के कुनबों में घनघोर अदावत थी- पुश्तैनी दुश्मनी। एक लंबे अरसे से चली आ रही थी।

कभी नवाब सलमान के कारिंदे शाहरुख की कोठी में घुस जाते तो कभी शाहरुख के लठैत सलमान के आदमियों पे लाठियाँ बरसा देते। कुल मिला कर दुश्मनी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी और दोनों का खूब नुक़सान हो रहा था।

दोनों ही अपने नुक़सान के चलते परेशान थे। एक पीर साहब ने दोनों को बुला समझाया- आप दोनों सुलह क्यों नहीं कर लेते। नवाब शाहरुख अपने लड़के का निकाह नवाब सलमान की लड़की से कर दें तो मुआमला ठंडा पड़ जाये।

दोनों रईस मान गए। अब सुलह किधर हो कैसे हो कौन बिचौलिया बने? उन दिनों लखनऊ में मुश्तरी जान नामक तवायफ़ का जलवा था।

अल्हड़ शोख़ चंचल और बदमाश तबियत की मुश्तरी के एक हाथ में शाहरुख थे और दूसरे हाथ में सलमान। मुश्तरी की बात कोई ना टाल सकता था। बड़े लोगों की ये तो बात निराली होती है कि अपनी मुँहलगी नचनिया की बात नहीं टालते है। मुश्तरी जान ने तयशुदा दिन सब इंतज़ाम कर के रखे। पान इलायची बीड़े के साथ साथ टुंडे उस्ताद के नर्म गलौती कबाब के साथ लाल परी के ड्रम आदि मँगवाए। भंडेती के साथ खाना पीना आदि खूब हुआ। दोनों के सामने मुश्तरी ने बड़ा बढ़िया नाच पेश किया। सुरूर में झूमते नवाब शाहरुख ने मुश्तरी को चिकोटी भर दी। ये देख सलमान अली आपे से बाहर हो गए। शाहरुख को जी भर गालियाँ दी। सुलह अमन चैन सीजफायर दो पल में खत्म हो गया। मुश्तरी दोनों के बीच समझौता कराती रह गई किंतु दोनों नवाब तमतमाये हुए बाहिर निकल गए। मुश्तरी के अरमानों पे पानी पड़ गया- नमाज़ बख्शवाने निकली थी, रोज़े गले पड़ गए।

इनाम की उम्मीद बांधी थी- वो तो मिला नहीं ऊपर से पान बीड़े आदि का खर्चा अलग गले पड़ा। चिकोटी भी मुफ्त में कटवाई सो अलग। पीर साहब ने फरमाया- जनाब, तवायफ़ों के कोठों पे रिश्ते की बात नहीं करते। कल भी सरहद पार ठीक यही हुआ। मुश्तरी जान अब तखमीना जोड़ रही है कि इस्लामाबाद वार्ता में हमारा कितना खर्चा हो गया। बख्शीश तो मिली नहीं, ऊपर से कंगाली में आटा गीला अलग से हो गया।

(एक लघुकथा बकलम मीर मुंशी जी)

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