राज्यपाल बनाम लोकतंत्र! तमिलनाडु घटनाक्रम ने खड़े किए बड़े सवाल

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  • तमिलनाडु विवाद के बहाने केंद्र और राजभवन के रिश्तों पर तेज हुई बहस

यशोदा श्रीवास्तव

तमिलनाडु की राजनीति में सरकार गठन को लेकर पैदा हुआ नया विवाद एक बार फिर भारत में राज्यपालों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप लग रहे हैं कि राज्यपाल की ओर से सबसे बड़े दल को सरकार बनाने से रोकने की कोशिश की जा रही है। इससे यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या राज्यपाल संवैधानिक मर्यादा के तहत काम कर रहे हैं या केंद्र सरकार की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चूंकि राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र सरकार की सिफारिश पर होती है, इसलिए अक्सर उन पर केंद्र के दबाव में काम करने के आरोप लगते रहे हैं। भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब राज्यपालों के फैसलों को लेकर निष्पक्षता पर सवाल उठे।

तमिलनाडु में क्यों बढ़ा विवाद?

तमिलनाडु में भाजपा का केवल एक विधायक होने के बावजूद यदि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने से रोका जाता है तो यह स्वाभाविक रूप से विवाद को जन्म देता है। अभिनेता से नेता बने थलापति विजय की पार्टी सरकार बनाने के बेहद करीब बताई जा रही है। कांग्रेस ने समर्थन का संकेत दिया है, जबकि डीएमके प्रमुख और निवर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भी सरकार गठन में बाधा खड़ी किए जाने के विरोध में हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब किसी दल को बहुमत साबित करने का अवसर विधानसभा में मिलना चाहिए, तो राजभवन की ओर से देरी या अड़चन क्यों पैदा की जा रही है? संवैधानिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि बहुमत परीक्षण का सही मंच विधानसभा ही है, न कि राजभवन।

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पहले भी विवादों में रही है राज्यपालों की भूमिका

भारत के राजनीतिक इतिहास में राज्यपालों की भूमिका को लेकर कई बड़े विवाद सामने आ चुके हैं। एस.आर. बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी सरकार का बहुमत सदन के भीतर ही परखा जाना चाहिए। इसके बावजूद समय-समय पर राज्यपालों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत और तत्कालीन राज्यपाल कलराज मिश्र के बीच टकराव इसका बड़ा उदाहरण रहा। वहीं कर्नाटक, गोवा, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड जैसे राज्यों में भी सरकार गठन के दौरान राज्यपालों के फैसले विवादों में रहे।

अनुच्छेद 356 और राजनीतिक इस्तेमाल

लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई बार राज्यपालों की रिपोर्ट के आधार पर अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त किया गया। खासतौर पर कांग्रेस शासनकाल में और बाद में भाजपा शासन के दौरान भी इस तरह के आरोप सामने आते रहे। 1959 में केरल की EMS नंबूदरीपाद सरकार को बर्खास्त किए जाने का मामला अक्सर इस संदर्भ में याद किया जाता है। वहीं 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव सरकार के साथ हुआ घटनाक्रम भी राज्यपालों की भूमिका पर गंभीर सवाल छोड़ गया था।

क्या बदलने की जरूरत है?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में राज्यपाल का पद निष्पक्ष संवैधानिक संरक्षक का होना चाहिए, लेकिन समय के साथ यह पद राजनीतिक विवादों का केंद्र बनता गया। राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार होने पर केंद्र और राजभवन के रिश्ते अक्सर टकराव में बदल जाते हैं। तमिलनाडु का ताजा विवाद इसी लंबे राजनीतिक इतिहास की एक नई कड़ी माना जा रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले दिनों में संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान कैसे निकलता है।


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