असद के साथ पूरा विपक्ष, सूर्या अकेला क्यों!

The Murder of Surya Chauhan
संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

The Murder of Surya Chauhan उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के खोड़ा इलाके में बकरीद के समय युवा सूर्या चौहान की हत्या ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। कोई इसे हिन्दू-मुस्लिम के एंगल से देख रहा है तो किसी को इसके पीछे मजहबी कट्टरता नजर आ रही है। सूर्या को एक मजहब के कुछ लड़कों ने जिस तरह से पाँच लड़कों के समूह ने पेट में चाकू भोंक कर मौत की नींद सुलाया, वह दिल दहला देने वाला था। यूपी पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जबकि मुख्य आरोपी असद पुलिस से मुठभेड़ में मारा गया। बस इसी के बाद प्रदेश में राजनीति शुरू हो गई। सूर्या की हत्या पर जो मौन थे, वह असद के एनकाउंटर पर विलाप करने लगे। असद के एनकाउंटर के खिलाफ एक मजहब के लोग और विपक्ष की एकजुटता देखने लायक है। पुलिस व योगी सरकार के रवैये पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं, इसके साथ-साथ निर्दोष युवा सूर्या चौहान के परिवार वालों को तसल्ली देने वाले लोग मुट्ठी भर हैं। सूर्या चौहान की हत्या और उसके बाद असद के एनकाउंटर ने शहर को दो हिस्सों में बाँट दिया है। एक तरफ वह लोग हैं जो योगी सरकार की कार्रवाई की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे हैं, यह कहते हुए कि कानून का पोषक अपराधियों के खिलाफ कठोर होना चाहिए। दूसरी तरफ विपक्ष और एक खास मजहब के लोग एक साथ असद के पक्ष खड़े होते हैं, पुलिस की तेजतर्रार कार्रवाई के तरीकों पर सवाल उठाते हैं और शेखी से ज्यादा पारदर्शिता की मांग करते हैं। इस घड़ी में वही पुरानी परतें फिर उभर कर आती दिखती हैं, जातिगत भावनाएँ, राजनीतिक फायदा और फास्ट-फॉरवर्ड जस्टिस की लालसा।

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पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक सूर्या की हत्या और इस परिवार का प्रलाप दिखाई देता है तो कुछ स्थानीय लोग अपराध की कुछ पुरानी घटनाओं को उजागर करते हुए सूर्या की हत्या को नई ‘शक्ल’ देने में लगे हैं। यहाँ एक विशेष मजहब से ताल्लुक रखने वाले लोग पूरे घटनाक्रम से जानबूझकर दूरी बनाए हुए हैं। वे कहते हैं कि उन्हें किसी सूर्या की हत्या के बारे में नहीं पता है, पर जब असद के एनकाउंटर की बात आती है तो उनकी संवेदना अचानक जाग जाती है। विशेषकर जब उनके समुदाय का कोई सदस्य किसी विशिष्ट नैरेटिव में फिट नहीं बैठता। राजनीति तुरंत सक्रिय हो जाती है। विपक्षी नेताओं के भाषण में नेमबद्ध आरोप नजर आते हैं। आरोप लगाया जाता है कि पुलिसिया एनकाउंटर कई बार खतरनाक तरीके से इसलिए किए जाते हैं ताकि असुविधाजनक सवालों और गवाहों को समाप्त किया जा सके। वे पुराने मामलों की सूची गिनाते हैं जहाँ प्रत्यक्षदर्शियों, आरोपियों या पीड़ितों के साथ संदिग्ध परिस्थितियों में निपटा गया। जनता की स्मृति में 2010 का वह मामला आता है, जब एक युवक की संदिग्ध हालातों में मौत हुई और पुलिस ने उसे आत्मरक्षा का ठहराया। फिर 2014 और 2018 की घटनाएं भी दिमाग में घूमती हैं। हर बार एक ही पैटर्न तेज-तर्रार कार्रवाई, संदेह के बादल, और समय के साथ फीकी पड़ती जाँचें। विपक्ष इन पुराने मामलों का हवाला देता है ताकि सामूहिक गुस्से को विधि और प्रक्रिया के साथ जोड़ कर दर्शाया जा सके कि यह सिर्फ व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि प्रणालीगत समस्या है।

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वहीं असद के एनकाउंटर को सही ठहराने वाले कहते हैं कि कानून का हाथ जब तेजी से चलता है तो अपराधी डरते हैं और अपराध घटते हैं। उनके लिए एनकाउंटर तुरंत सज़ा देने जैसा लगता है। नतीजा साफ और त्वरित होता है। वे पुलिस की नीतियों में कठोरता की वकालत करते हैं और सिस्टम पर भरोसा जताते हैं। इस विश्वास की जड़ें कई वर्षों के अनुभवों से जुड़ी हैं, जब सिस्टम धीमा और गैर-लाभकारी लगता है, तब लोक-मन चाहने लगता है कि निर्णायक कार्रवाई हो। यही भावना अक्सर भीड़ की मांग बनकर सामाजिक दबाव उत्पन्न करती है। असल में समस्या केवल न्यायिक या पुलिसिया प्रक्रिया पर नहीं टिकती; यह पहचान, समुदाय और राजनीतिक असंतुलन का भी मामला है। सूर्या के मरने के बाद जिन कुछ लोगों की तस्वीरें और वीडियो सामने आते हैं, वे मुट्ठी भर हैं। वे स्थानीय लोग, कुछ रिश्तेदार और कुछ परिचित हैं, पर आंकड़े बताते हैं कि इलाके में रहने वाले विशेष मजहब के कई लोग अब भी इस पूरे घटनाक्रम से विमुख हैं। उनके बीच भय की एक परत घूम रही है। ये लोग खुलकर बोलने से सामाजिक बहिष्कार, बदनामी या राजनीतिक निशाना बनते हैं। इसलिए वे बाहर से दुख ज़ाहिर करते हैं, पर अंदर से दूरी बनाए रखते हैं। इस दूरी में राजनीति फल-फूल रही है; नेता अपनी आवाज़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं, और स्थानीय लोगों की अनिच्छा कार्यवाही के नैरेटिव को बदल देती है।

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समाचार माध्यम और सोशल मीडिया इस स्थिति में ईंधन का काम करते हैं। मीडिया के कुछ हिस्से घटनाओं को तेजी से पॉलिटिकल फ्रेम में आकार देते हैं, कुछ हिस्से भावनाओं को हवा देते हैं। सोशल मीडिया पर क्लिक्स के लिए कटिंग क्लिप, भावनात्मक पोस्ट और कुछ केस-हिस्ट्रीज़ चलते हैं। कभी-कभी सटीक तथ्य की जगह अफवाहें तेजी से फैलती हैं। परिवार के सदस्यों के कथित बयान, वीडियो के अनचेक्ड क्लिप, और पुराने विवादों की रील-रीप्ले। इस माहौल में निष्पक्ष जांच और ठोस सबूत माँगना कठिन हो जाता है, क्योंकि सार्वजनिक धारणा पहले ही धक्का खा चुकी होती है। विरोध और समर्थन दोनों तरफ के बयानों में एक सामान्य रिसाव दिखता है। इंसानियत के सवाल पीछे छूट जाते हैं। सूर्या का परिवार दुखी है, वे न्याय की मांग करते हैं; परिवार की आवाज़ें अक्सर राजनीतिक रैलियों और चैनलों की पृष्ठभूमि बन जाती हैं। उनसे जुड़ी वास्तविक ज़रूरतें, मुकम्मल और निष्पक्ष जाँच, संरक्षण, मुआवजा और समुदाय में शांति कम चर्चा में रह जाती हैं। इसके बजाय बहस ध्रुवीकरण पर केन्द्रित होती है, न्याय बनाम सज़ा, प्रक्रिया बनाम परिणाम, समुदाय बनाम सरकार। लब्बोलुआब यह है कि खोड़ा का केस केवल एक घटना नहीं रह जाता; यह एक आईना बनकर सामने आता है जो बताता है कि कानून और सामाजिक जवाबदेही के बीच कितना फासला है। इतिहास के उन उदाहरणों को याद करते हुए जहाँ सत्ता, जाति और धर्म ने न्याय की गति बदल दी, वर्तमान में उठी इस आवाज को सुनकर आवश्यक है कि हम शीघ्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करें। तभी समाज भरोसा फिर से जीत पाएगा और सूर्या जैसे युवा के नाम पर न्याय की भावना जीवित रहेगी।

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