डायबिटिक फुट के घाव को न करें नजरअंदाज, मामूली लापरवाही भी बन सकती है अंग कटने की वजह

Diabetic foot

सिर्फ ड्रेसिंग नहीं, समय पर इलाज है जरूरी

Diabetic foot :  डायबिटीज केवल ब्लड शुगर बढ़ने की बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर के कई अंगों को धीरे-धीरे प्रभावित करती है। इनमें सबसे ज्यादा जोखिम पैरों को होता है। डायबिटीज के मरीजों के पैरों में होने वाला छोटा-सा छाला, जूते की रगड़ से बना घाव या त्वचा की मामूली दरार भी गंभीर समस्या का रूप ले सकती है। यदि समय रहते इसका सही इलाज न कराया जाए, तो संक्रमण बढ़कर हड्डियों तक पहुंच सकता है और कई मामलों में पैर का हिस्सा काटने (एम्प्यूटेशन) की नौबत भी आ सकती है।

पुणे स्थित इनामदार मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट एवं डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. सादिक मुल्ला के अनुसार, लंबे समय तक ब्लड शुगर अनियंत्रित रहने से पैरों की नसों को नुकसान पहुंचता है। इस कारण मरीज को दर्द, गर्मी, ठंड या चोट का सही एहसास नहीं होता। यही वजह है कि पैरों में बना घाव धीरे-धीरे गहरा होता जाता है, लेकिन मरीज को इसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं लग पाता।

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डायबिटीज के कारण पैरों में रक्त संचार भी प्रभावित होता है। जब घाव तक पर्याप्त मात्रा में खून नहीं पहुंचता, तो ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति कम हो जाती है। इससे घाव भरने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और संक्रमण तेजी से फैलने लगता है। इसलिए ऐसे मामलों में केवल नियमित ड्रेसिंग कराना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि घाव के वास्तविक कारण और उसकी गंभीरता का पता लगाना भी जरूरी होता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि डायबिटिक फुट की जांच के दौरान डॉक्टर सिर्फ घाव का आकार नहीं देखते, बल्कि यह भी जांचते हैं कि घाव कितना गहरा है, उसमें मवाद या दुर्गंध तो नहीं है, आसपास सूजन या लालिमा है या नहीं, पैरों में रक्त संचार कैसा है और नसों की संवेदनशीलता कितनी बची हुई है।

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यदि संक्रमण गंभीर होने की आशंका होती है, तो खून की जांच, X-ray, MRI या घाव के सैंपल की जांच कराई जा सकती है। कई बार संक्रमण त्वचा और मांसपेशियों से होते हुए हड्डियों तक पहुंच जाता है, जिससे इलाज और अधिक जटिल हो जाता है। इलाज के दौरान घाव के मृत ऊतकों को हटाना, घाव पर दबाव कम करना, ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना और पैरों में पर्याप्त रक्त संचार बनाए रखना बेहद आवश्यक होता है। संक्रमण होने पर उसकी गंभीरता के अनुसार एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं।

यदि पैरों में खून का बहाव बहुत कम हो जाए, तो वैस्कुलर विशेषज्ञ की सलाह लेकर एंजियोप्लास्टी जैसी प्रक्रिया भी करनी पड़ सकती है। डॉ. मुल्ला का कहना है कि यदि घाव के आसपास सूजन बढ़ने लगे, मवाद या बदबू आने लगे, त्वचा का रंग काला पड़ने लगे, बुखार हो, घाव लगातार गहरा होता जाए या अचानक ब्लड शुगर बढ़ जाए, तो इसे गंभीर चेतावनी समझना चाहिए।

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