डिजिटल बगावत की दस्तक, क्या सियासत की कसौटी पर टिकेगी?

Digital Rebellion
अजय कुमार                             
अजय कुमार

Digital Rebellion दिल्ली का कॉन्स्टिट्यूशन क्लब अमूमन गंभीर राजनीतिक बहसों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और रवायती नेताओं की सफेद पोशाकों का गवाह बनता रहा है। लेकिन बीते बुधवार को वहां जो कुछ हुआ, उसने भारतीय राजनीति के एक नए और अतरंगे अध्याय की आहट दे दी। तीन पढ़े-लिखे नौजवान मंच पर बैठते हैं और देश के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग बुलंद करते हैं। यह मांग किसी स्थापित विपक्षी दल की तरफ से नहीं, बल्कि एक ऐसे संगठन की ओर से आती है जिसका नाम ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ है। जो कल तक सोशल मीडिया के टाइमलाइन पर महज एक व्यंग्य, डिजिटल मज़ाक और कड़वे मीम्स का जरिया था, वह अब देश की राजधानी की सड़कों पर उतरने की तैयारी कर रहा है। नीट-यूजी और सीबीएसई जैसी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों ने देश के युवाओं के भीतर जिस कदर हताशा और आक्रोश भरा है, यह आंदोलन उसी की एक उपज है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ डिजिटल स्पेस में वायरल होकर या तंज कसकर देश की जमीनी सियासत को बदला जा सकता है? क्या यह भारतीय लोकतंत्र में युवाओं की वास्तविक छटपटाहट है या फिर सोशल मीडिया की चमक-दमक के बीच उपजा एक और अल्पकालिक तमाशा?

ये भी पढ़े

तमिलनाडु की सियासत में ‘सिंघम’ का नया दांव और BJP के सामने बड़ी चुनौती

इस आंदोलन की रीढ़ कहे जाने वाले तीन चेहरे सौरव दास, विजेता दहिया और आशुतोष रांका अपने आप में दिलचस्प पृष्ठभूमि रखते हैं। इनमें कोई स्थापित और मझा हुआ राजनेता नहीं है। एक सजग पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं जो आरटीआई के जरिए सरकारी तंत्र की खामियों को उजागर करते रहे हैं, तो दूसरा ध्रुव राठी जैसे बड़े मंचों के लिए गहरे शोध और स्क्रिप्ट लेखन से जुड़ा रहा है। तीसरे चेहरे को देखें तो वे आईआईटी कानपुर और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसी वैश्विक संस्थाओं से पढ़कर लौटे पब्लिक पॉलिसी विशेषज्ञ हैं। ये वो युवा हैं जो अंग्रेजी बोलते हैं, इंटरनेट की बारीकियों को समझते हैं और जिनके पास अपनी बात को आधुनिक तरीके से रखने का सलीका है। आगामी 6 जून को जब इस पार्टी के संस्थापक अमेरिका से दिल्ली लौटेंगे और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगी जाएगी, तब इस डिजिटल गुस्से की पहली असली परीक्षा जमीन पर होगी। पेपर लीक का मुद्दा निश्चित रूप से देश के करोड़ों छात्रों और उनके अभिभावकों के भविष्य से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय है। इस मुद्दे पर युवाओं की नाराजगी शत-प्रतिशत जायज है, लेकिन इस नाराजगी को अभिव्यक्त करने के लिए ‘कॉकरोच’ जैसे प्रतीक और विशुद्ध व्यंग्य का सहारा लेना इस आंदोलन की गंभीरता पर ही सवाल खड़े कर देता है।

ये भी पढ़े

असद के साथ पूरा विपक्ष, सूर्या अकेला क्यों!

इतिहास गवाह है कि महज आक्रोश और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम से कभी भी स्थायी तब्दीली नहीं आती। डिजिटल दुनिया में किसी पोस्ट का ट्रेंड कर जाना या लाखों लाइक्स मिल जाना क्रांति का पैमाना नहीं हो सकता। कॉकरोच पार्टी ने युवाओं के भीतर पनप रहे असली दर्द और बेरोजगारी की कड़वी सच्चाई को बेबाकी से सामने तो रखा है, लेकिन जब बात ठोस और व्यावहारिक एजेंडे की आती है, तो यह संगठन बगलें झांकता नजर आता है। किसी भी लोकतांत्रिक देश को सिर्फ चुटकुलों, मीम्स और परफॉर्मेंस के सहारे नहीं चलाया जा सकता। एक वक्त के बाद जनता और वक्त दोनों ही मुश्किल सवाल पूछते हैं। नौकरियां कैसे पैदा होंगी? देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को सुधारने की क्या योजना है? टैक्स ढांचा, पुलिस सुधार या विदेश नीति पर संगठन की क्या सोच है? इन बुनियादी और जटिल नीतिगत सवालों पर कॉकरोच पार्टी के पास फिलहाल कोई ठोस जवाब नहीं है। राजनीति में इस तरह की अस्पष्टता का एक फायदा जरूर होता है कि विचारधारा के स्तर पर मतभेद नहीं होते और हर तरह का असंतुष्ट तबका आपके साथ जुड़ा रहता है, लेकिन जैसे ही आप किसी एक गंभीर मुद्दे पर ठोस स्टैंड लेते हैं, आंतरिक अंतर्विरोध और मतभेद सतह पर आने लगते हैं।

ये भी पढ़े

डेमोग्राफी चेंज के खतरे पर मोदी सरकार का कड़ा प्रहार

इस पूरे नैरेटिव का एक खतरनाक पहलू यह भी है कि यह आंदोलन युवाओं को लगातार नकारात्मकता और व्यवस्था के प्रति घोर निराशा की ओर धकेल सकता है। सत्ता की आलोचना करना और उससे तीखे सवाल पूछना लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र को ऐसे नागरिकों की भी जरूरत होती है जो यह विश्वास रखें कि मौजूदा तंत्र में सुधार मुमकिन है। जब अदालतें, मीडिया, चुनाव और विश्वविद्यालय जैसी हर संवैधानिक और सामाजिक संस्था सिर्फ उपहास और मज़ाक का विषय बनकर रह जाएगी, तो आम जनता उन्हें सुधारने की उम्मीद और कोशिश ही छोड़ देगी। यह किसी व्यवस्था के खिलाफ बगावत नहीं, बल्कि उसके सामने आत्मसमर्पण या हार मान लेने जैसी स्थिति है। इसके अलावा, आंदोलन का यह दावा भी पूरी तरह सच नहीं लगता कि यह संघर्ष कर रहे देश के हर आम युवा की आवाज है। जरा इसके अगुआ चेहरों और इसके प्रसार के दायरे को देखिए। यह मुख्य रूप से अंग्रेजी बोलने वाले, बड़े शहरों में रहने वाले और चौबीसों घंटे ऑनलाइन रहने वाले युवाओं का एक खास क्लब नजर आता है। भारत के सुदूर गांवों में रहने वाले युवा, खेतों में पसीना बहाने वाले किसान पुत्र, प्रवासी मजदूर और वे करोड़ों नौजवान जिनके पास स्मार्टफोन या हाई-स्पीड इंटरनेट तक नहीं है, वे इस पूरी तस्वीर से पूरी तरह गायब हैं। इंटरनेट पर लोकप्रियता बटोरना और देश की धूल भरी सड़कों पर उतरकर जनसमर्थन हासिल करना, दोनों दो बिल्कुल अलग छोर हैं।

ये भी पढ़े

पूर्वांचल में सपा के PDA केखिलाफ बीजेपी का PDV दांव

दूसरी बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि यह पूरा आंदोलन लगभग एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ शो दिखाई देता है। जब कोई आंदोलन या संगठन किसी एक चेहरे के करिश्मे पर टिक जाता है, तो उस व्यक्ति के पैर डगमगाते ही पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है। भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल का उदाहरण हमारे सामने है, जो एक बड़े जनआंदोलन से उपजे थे, लेकिन बाद में सत्ता के रवायती ढर्रे में ही समा गए। किसी भी वास्तविक राजनीतिक संगठन को चलाने के लिए एक मजबूत संगठनात्मक ढांचा, प्रशिक्षित कैडर और एक स्पष्ट विचारधारा की आवश्यकता होती है। सोशल मीडिया का मौजूदा मॉडल ही इस तरह तैयार किया गया है जो केवल नाराजगी, उत्तेजना और सनसनी को बढ़ावा देता है। अगर किसी आंदोलन के पास साफ सिद्धांत और अनुशासन की सीमाएं न हों, तो ऐसे मंच बहुत जल्दी अराजक तत्वों और अफवाह फैलाने वालों के आसान निशाने बन जाते हैं।

ये भी पढ़े

यूपी चुनाव 2027 : मायावती फिर बदल देंगी उत्तर प्रदेश की राजनीति?

एक असहज करने वाली सच्चाई यह भी है कि मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठानों को अक्सर इस तरह का मीम-आधारित विपक्ष रास आता है। वायरल पोस्ट और मजेदार तंज वाली यह डिजिटल बगावत उस वास्तविक युवा ऊर्जा को बिखेर देती है, जो अन्यथा एक गंभीर चुनावी या राजनीतिक चुनौती में बदल सकती थी। किसी भी मजबूत सरकार के लिए सोशल मीडिया पर मज़ाक उड़ाया जाना उतना बड़ा खतरा नहीं होता, जितना बड़ा डर एक संगठित, अनुशासित और जमीनी स्तर पर काम करने वाले विपक्ष से होता है। यहाँ तक कि पार्टी का चुनाव-चिह्न ‘कॉकरोच’ भी एक दोधारी तलवार की तरह है। भले ही यह जीव हर विपरीत परिस्थिति में जिंदा रहने की क्षमता रखता हो, लेकिन आम जनमानस में उसकी पहचान गंदगी, संक्रमण और घृणा से ही जुड़ी होती है। जब कोई प्रतीक जनता के बीच जाता है, तो वह अपने मूल अर्थ से इतर एक अलग ही छवि बना लेता है।

ये भी पढ़े

स्टालिन अपनी विचारधारा के साथ आयेंगे BJP के करीब!

लब्बोलुआब यह है कि सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स और वास्तविक राजनीतिक ताकत दो अलग-अलग चीजें हैं। वर्चुअल दुनिया किसी भी आंदोलन को कृत्रिम रूप से बहुत विशाल और प्रभावी दिखा सकती है, लेकिन यह ऑनलाइन लोकप्रियता उतनी ही तेजी से गायब भी हो जाती है, जितनी तेजी से स्क्रीन पर स्क्रॉल होती है। जैसे ही कोई नया वायरल मुद्दा आता है, लोग पुरानी बहसों को भूल जाते हैं। वास्तविक और स्थायी बदलाव के लिए धैर्य, वर्षों की कड़ी मेहनत और संगठन खड़ा करने का वह उबाऊ काम करना पड़ता है, जो इंटरनेट के इस दौर में सबसे ज्यादा मुश्किल है। भारत का युवा बेरोजगारी, महंगाई और एक संवेदनहीन व्यवस्था से सचमुच परेशान है और उसका गुस्सा शत-प्रतिशत वास्तविक है। इस गुस्से को चर्चा के केंद्र में लाने का श्रेय इस डिजिटल मुहिम को दिया जा सकता है, लेकिन किसी समस्या को रेखांकित करना और उसका व्यावहारिक समाधान निकालना, दो अलग बातें हैं। जब तक यह मज़ाक, तंज और मीम्स एक ठोस नीतिगत योजना में नहीं बदलते, तब तक यह कवायद भी इतिहास की उन कई इंटरनेट सनसनियों की तरह ही दर्ज होगी, जो देखने में तो बड़ी क्रांति जैसी लगीं, लेकिन अंततः व्यवस्था में कोई वास्तविक बदलाव नहीं ला सकीं।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews

रूस-यूक्रेन युद्ध पर बड़ा मोड़! जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र

मां और दामाद के रिश्ते का खुला राज, बेटी की मौत से मचा हड़कंप

Sensex Today: एशियाई बाजारों में मचा कोहराम, निवेशकों की बढ़ी चिंता

विदेश यात्रा करने वालों को झटका! IndiGo ने छह इंटरनेशनल रूट्स पर लगाई रोक

बंगाल में अनोखी तस्वीर: अपने ही पार्टी कार्यालय पर चला BJP का बुलडोजर

ईरान-अमेरिका युद्ध का असर, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल

विश्व पर्यावरण दिवस पर अपनी राशि के अनुसार लगाएं पौधे, बदल सकता है भाग्य

नेपाल एयरलाइंस कर्मचारी की गिरफ्तारी से एयरपोर्ट पर हलचल

Spread the love

New Delhi
homeslider National Politics

विजयादशमी पर खरगे-प्रियंका ने दी शुभकामनाएं

New Delhi: विजयादशमी के पावन अवसर पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। दोनों नेताओं ने इस त्योहार के महत्व को रेखांकित करते हुए लोगों के जीवन में सकारात्मकता, सद्भाव और अच्छे मूल्यों की अहमियत पर जोर दिया। विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई और असत्य पर […]

Spread the love
Read More
Chandigarh
homeslider Politics Punjab

झोटा हत्याकांड की CBI जांच, CM मान का बड़ा ऐलान

Chandigarh: पंजाब में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या का मामला लगातार सुर्खियों में है। अब इस मामले में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की घोषणा की है। मंगलवार को मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट साझा कर इसकी जानकारी दी। […]

Spread the love
Read More
homeslider Uttar Pradesh

दशहरा पर्व पर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त: रूट मार्च के साथ सभी दुर्गा पूजा पंडालों का DSP पूर्वी ने लिया जायजा

DSP पूर्वी डॉ दीक्षा शर्मा ने सुरक्षा को लेकर मातहतों को दिया दिशा-निर्देश ए अहमद सौदागर Lucknow : शारदीय नवरात्र पर्व पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के दृष्टिगत DSP पूर्वी डॉ दीक्षा शर्मा रविवार शाम ADCP पूर्वी अमोल मुरकुट, SP विभूतिखंड सौम्या पांडेय, इंस्पेक्टर चिनहट दिनेश चंद्र मिश्रा व कस्बा चौकी प्रभारी अभिषेक तिवारी सहित […]

Spread the love
Read More