स्टालिन अपनी विचारधारा के साथ आयेंगे BJP के करीब!

Tamil Nadu
अजय कुमार                             
अजय कुमार

Tamil Nadu चार मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रदेश की राजनीतिक हवाएँ अचानक बदल गई थीं। चार मई से पहले प्रदेश में जब भी कहीं कोई सभा सजती थी, तो द्रमुक की झंडियाँ और उसके समर्थकों की उमंग इतनी प्रबल दिखती थी कि विरोधी दल भी चुप रह जाते थे। पर अब वही मंडप, वही लोग और वही भाषण, सब कुछ जैसे किसी अनकहे वादे से खाली पड़ गया हो। विधानसभा के अंदर-बाहर नेता और कार्यकर्ता कह रहे थे कि जो रिश्ता वर्षों से बना रहा, वह अब टूटता दिख रहा है। कांग्रेस ने जहाँ अपने दो विधायकों को थलापति के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बनाकर पूछ बढ़ाई, वहीं द्रमुक के सांसदों ने संसद में अलग बैठने के लिए पत्र लिख दिया। शहर के चाय वालों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक हर जगह चर्चा इस बात की थी कि क्या द्रमुक सत्ता से कट जाएगी, और क्या उसकी चाल भाजपा की ओर झुकेगी। हाल यह है कि चार मई के बाद द्रमुक नेता और पूर्व सीएम स्टालिन के चेहरे पर निराशा का भाव नजर आने लगा।

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उनके पास द्रमुक की विरासत का भार था, वह विरासत जिसने दशकों तक दक्षिण की राजनीति को आकार दिया और जिसके साथ आज की नई पीढ़ी भी जुड़ी थी। उन सबके सपने चूर-चूर हो गए। बता दें, द्रमुक तमिलों के विश्वास और दक्षिण के आत्मसम्मान से जुड़ा एक संदेश था। पर अब यही संदेश संदेह में बदलता दिखा, क्योंकि द्रमुक का झुकाव बीजेपी की तरफ नजर आने लगा है। जबकि कुछ समय पूर्व तक द्रमुक नेता परिसीमन के विरोध में बीजेपी के खिलाफ लगातार मोर्चा खोले हुए थे। लोकसभा की सीटें बढ़ाए जाने से भी द्रमुक नाराज था। द्रमुक अक्सर कहा करता था कि नया परिसीमन दक्षिण को नीचा दिखाने की साजिश है। इस मुद्दे पर उन्होंने झंडे उठाए, प्रदर्शन किए और संसद में काले कपड़े पहने। यह उनकी असहमति का प्रतीक था। इसी कारण समर्थक उम्मीद रखते थे कि द्रमुक कभी भी अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा। पर राजनीति में सिद्धांतों और संकल्पों के बीच अक्सर व्यावहारिक चुनौतियां आ जाती हैं।

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द्रमुक के कई पुराने साथी अब अलग खड़े दिखने लगे थे। कुछ नेता, जिनका व्यक्तिगत स्वार्थ और चालाकी लंबे समय से जमी हुई थी, उन्होंने अवसर देख लिया। कांग्रेस के दो विधायकों का मंत्री बन जाना सिर्फ एक संकेत था कि गठबंधन टिकाऊ नहीं रह पाया। और जब द्रमुक के सांसदों ने संसद में अलग बैठने की मांग की, तो बहुतों ने इसे रिश्तों में दरार का प्रतीक माना। मैदान में बैठी जनता भी विभाजित हो गई थी। कुछ स्टालिन के साथ थे, तो कुछ बोले कि यह निर्णय वक्त की मांग हो सकता है। भाजपा ने यह सब देखकर चुपचाप द्रमुक की सोच को परखना शुरू कर दिया। बीजेपी की इस रणनीति को भेदभाव वाला नहीं कहा जा सकता। बीजेपी की नजर लगातार दक्षिण में ताकत बढ़ाने पर लगी थी। अगर द्रमुक केंद्र में सहयोग दे दे, तो इसे एक बड़ी जीत माना जाएगा। भाजपा को भी पता है कि यह आसान नहीं होगा। द्रमुक के लिए दो ऐसे प्रश्न थे, जिन पर समझौता असंभव जैसा दिखता है। पहला परिसीमन का मुद्दा और दूसरा दक्षिण के प्रतिनिधित्व का सिद्धांत। द्रमुक के समर्थक हमेशा दक्षिण की अस्मिता और अधिकार की बात करते रहे थे। इसलिए स्टालिन के लिए भाजपा के साथ नजदीकी बनाना एक जोखिम था, क्योंकि इससे उसके विश्वासपात्र और समर्थक नाराज हो सकते थे। लेकिन इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि द्रमुक बीजेपी सरकार के साथ रह चुकी है।

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अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय भी ऐसे मौके आए थे, पर तब की राजनीति और आज की राजनीति में जमीन अलग है। स्टालिन ने महसूस किया कि इतिहास बार-बार लौटता है, पर परिस्थितियां बदल जाती हैं। क्या वे पुराने रिश्तों को नए संदर्भ में जिंदा कर सकते हैं? क्या यह उनके लिए राजनीतिक उत्तराधिकार का सवाल बन सकता है? बहरहाल, सूत्र बताते हैं कि उनके राजनीतिक सलाहकारों ने उनके सामने कई विकल्प रखे। कुछ ने कहा कि केंद्र के साथ कामकाजी रिश्ते बनाए जाएँ, समर्थन मुद्दों पर दिया जाए, पर खुले तौर पर गठबंधन न किया जाए। कुछ ने चेतावनी दी कि ऐसा करने पर पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में दरार आ सकती है। स्टालिन को समझना होगा कि दक्षिणी जनमानस के लिए सम्मान और स्वाभिमान क्या मायने रखते हैं।

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किसी भी प्रकार का समझौता अगर उस स्वाभिमान को चोट पहुँचाएगा, तो इसकी कीमत बहुत भारी होगी। दूसरी ओर भाजपा के लोग भी सक्रिय हो गए। उसके सांसदों ने चुपचाप द्रमुक से संपर्क बढ़ा लिया है, और बीजेपी कह रही है कि देश के हित में मुद्दों पर साथ काम करना बुरा नहीं है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि राजनीतिक विरोध से अलग नीति निर्माण और विकास के लिए सहयोग आवश्यक है। इस तरह की बातों से स्टालिन के कुछ सहयोगी प्रभावित हुए, पर भीतर की औपचारिक आलोचना तेज थी। कार्यकर्ता और युवा नेता सोशल मीडिया पर लड़ते-लड़ते थक नहीं रहे थे। हर तरफ सवाल उठ रहे थे   क्या द्रमुक ने अपना आत्मविश्वास खो दिया? क्या स्टालिन अब बड़े राजनीतिक दांव खेलने जा रहे हैं? उधर, द्रमुक सुप्रीमो की सोच के चलते स्थानीय स्तर पर इस सबका दिन-ब-दिन अधिक जमीनी असर दिखने लगा है। कुछ जिलों में द्रमुक के पारंपरिक समर्थक नाराज होकर छोटी स्थानीय समितियों का गठन कर रहे थे। वहीं कुछ प्रभावशाली व्यवसायी और उद्योगपति यह सोच रहे थे कि अगर द्रमुक केंद्र के साथ मिलकर काम करता है, तो व्यापारिक हितों में स्थिरता आएगी। यह विरोधाभास द्रमुक के विचारों को और जटिल बना रहा था। आखिरकार स्टालिन ने एक मुश्किल निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि द्रमुक का मार्ग स्पष्ट रहेगा, राज्य का प्रतिनिधित्व और अधिकार सर्वोपरि होंगे, पर यदि राष्ट्रीय मुद्दों में कोई स्पष्ट लाभ दिखे, तो स्थिति के अनुरूप बातचीत की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यह निर्णय कुछ हद तक सुलह का संदेश था। उन्होंने खुला दरवाजा रखा, पर अपनी नींव नहीं छोड़ी।

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लेकिन उनका यह फैसला हर किसी को संतुष्ट नहीं कर सका। कुछ नेता चाहते थे कि द्रमुक पूरी तरह से कट जाए और कड़ाई से भाजपा का विरोध करे। कुछ चाहते थे कि द्रमुक केंद्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चालाकी से कदम बढ़ाए। पर राजनीतिक जीवन में हर निर्णय की तरह यह भी संतुलन का निर्णय था। कभी-कभी सार्वभौमिक संतोष असंभव होता है। लब्बोलुआब यह है कि समय के चक्र ने दिखा दिया कि राजनीति धारा जैसी है। यह बहती है, मोड़ लेती है और फिर नई दिशा में बहने लगती है। द्रमुक का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कैसे अपने सिद्धांतों और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाए रखता है। एक बात स्पष्ट है कि लोगों की नजरें अब अधिक तीव्र हो गई हैं। हर नेता की चाल, हर समर्थन और हर पल की समीक्षा होने लगी है। और जब देश की राजनीति की बड़ी किताबें लिखी जाएगी, तो यह अध्याय भी उसी तरह एक सबक की तरह रहेगा  कभी असमान नजरों में टूटना, कभी जुड़ने की कोशिशें, और हमेशा सत्ता और सिद्धांत के बीच जटिल संतुलन की खोज।

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