‘यज्ञ’ की शक्ति, कैसे है हमारे और पर्यावरण के लिए लाभदायक

डॉ बी के सिंह

The Power of Yajna: भूमंडल की जानकारी तथा नक्षत्रों के ज्ञान के लिए जिस प्रकार एक मानचित्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड की रचना आदि का ज्ञान कराने के लिए यज्ञ का विस्तार किया गया। जो पूर्णतया विज्ञान पर आधारित है। सृस्टि विज्ञान को समझने और ग्रहण करने की क्षमता केवल प्रतिभावान व्यक्तियों में ही हो सकती है। लेकिन इसे आम जनमानस को समझने के लिए यज्ञ ही एक विद्या थी।

जिसके माध्यम से इसका लाभ प्राणियों तथा वनस्पति जगत को प्रत्यक्ष रूप से मिलता रहे इसलिए इसे अनिवार्य कर दिया गया। यज्ञ के लिए वर्णित मंत्रों को जब विशिष्ट क्रम में उतार चढ़ाव के साथ उच्चारित किया जाता है, तो उससे वांछित परिणाम मिलते हैं। इस प्रकार से मंत्र एक महान विज्ञान है। विज्ञान में ताप, द्रव और आकाश में चक्कर लगाता रहता है जिसे हम तरंग भी करते हैं। शब्द का वेग प्राय: एक सेकेंड में 1100 फुट का होता है।

शब्द को प्रकाश में परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार से मंत्र दूसरे रूप में परिवर्तित होकर एक माध्यम के सहारे अपनी यात्रा करते हैं और मंत्र को व्यापक बनाने के लिए ताप और प्रकाश से जोड़ा गया है। जिससे यह अधिक शक्तिशाली और व्यापक बन सके। इस प्रकार से यज्ञ में मंत्र-ध्वनि, ताप और प्रकाश तीनों की शक्ति धाराओं का उच्च स्तरीय उपयोग और समन्वित किया गया है।

मंत्र शक्ति को विस्तारित करने और उसका हस्तांतरण करने के लिए अग्नि का प्रयोग किया जाता है। अत: परिष्कृत वाणी से उच्चारित मंत्र से उत्पन्न शक्ति मिसाइलों की भांति लक्ष्य का भेदन कर सकती है। इसे ही शब्द वेदी बाण की संज्ञा दी जाती है। यज्ञ-अग्नि एक प्रकार की विद्युत उत्पादन केंद्र है। अत: यज्ञ मात्र से मनुष्य स्वयं को ब्रह्माणीय ऊर्जा के संपर्क में ला सकता है।

कहा गया है कि, यज्ञ प्रक्रिया से ‘यजमान: स्वर्ग लोक यति’ अर्थात् यज्ञ से यजमान..श्रेष्ठ आत्मा..अमृत्व को प्राप्त कर लेता है। मंत्रों से जो शिक्ष, अर्थ, संबोधन, आदेश संहित है उसके आधार पर मनुष्यों को अपने कर्तव्य का ज्ञान होता है। साथ ही प्रेरणा मिलती है कि यही मंत्र की प्रमाण्य शक्ति है। कुश, हवि, चरु, आज्य..विभिन्न प्रकार के अन्न.., कुंड, समिधा, पात्र आदि को अभिमंत्रित करके उसको सूक्ष्मप्राण से प्राणवान करना ही मंत्र की फलदायनी शक्ति है।

यज्ञ में आम आदि पेड़ों की लकड़िया तथा उनसे बनी समिधा का प्रयोग, हवन सामग्री में आवश्यकता और उपयोगितानुसार वनस्पित तत्वों के मिश्रण, यज्ञानि के ताप से निकलती ऊर्जा और उसकी व्यापकता अणुओं से भी छोटे-छोटे भागों में जाकर फैलती है। और वातावरण में कल्याणकारी प्रभाव डालती है। तथा मानव शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

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वास्तव में शब्द शूक्ष्मीकृत ईंधन हैं, निर्धारित ध्वनि से शब्द शक्ति की क्षमता एवं उपयोगिता कई गुना बढ़ जाती है तथा इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वे हमारे तीनों शरीर-स्थूल, सूक्ष्म और कारण को परिष्कृत कर सकते है। इस प्रकार से यज्ञ सुख—समृधि का भौतिक विज्ञान है। शब्दों की दूसरी विशेषता उनकी संवहनीयता है। वे विभिन्न माध्यमों में विचरण करते हैं। इसके साथ ही वे ईथर में तरंगों के रूप में ब्रह्मांण का भ्रमण करते हैं।

शब्दों की ध्वनि से व्यापक चंचलमयी तरंगें निकलती हैं। यज्ञों में प्रज्जवलित अग्नि के इलेक्ट्रान उन तंरगों का वहन कर लेते हैं। यह पहले यज्ञ के क्षेत्र में फैलते हैं और घी पदार्थ आदि स्थूल रूप से गैस रूप में फैलते हैं। यज्ञ अग्नि की गर्मी में हवन में प्रयुक्त औषधीय तत्वों.. जैसे- ऐलकेलाइड, ऐमांस, फीलोनिलिक, साइकिलिक, टारपेनिक श्रेणी के अनेकों पदार्थ.. के इलेक्ट्रॉन अपने-अपने पथों पर इतनी तेजी से दौड़ते हैं, कि वे आपस में टकराकर और उन पदार्थों से अलग होकर वायुमंडल में फैल जाते हैं।

इन गैसों और ध्वनितरंगों से आयनमंडल तथा ब्रह्मांडीय शक्तियों के भीतर हलचल उत्पन्न होती है। जो सूर्य के माध्यम से वापस आकर पर्यावरण और जन स्वास्थय को लाभानवित करती है। यज्ञ के जरिए रोग निवारण होते हैं। यज्ञ में अग्नि, घी, अन्न तथा वनस्पतियों की आहूति दी जाती है। जो यज्ञ अग्नि की ज्वाला से रोग निवारक गंध के रूप में वातावरण में फैलते हैं। यह गंध श्वास के माध्यम से फेफड़ों से होते हुए रक्त से सीधा संपर्क करती है और रोग निवारक गुणों को रक्त में पहुंचा देती है।

जिससे मनुष्य स्वस्थ्य हो जाता है। अग्नि की ज्वाला उर्ध्व गामी होती है। जो हमें उच्च स्तरीय द्रष्टिकोण, उत्तम और स्वस्थ्य चिंतन तथा उतकृष्ट विचार बनाने के लिए प्रेरित करती है। इस तरह से यज्ञ विद्या भूमंडल के वातावरण के उपचार की एक प्रक्रिया है। इसमें स्वास्थ्य संर्वधक और रोग निवारण की अद्भुत शक्ति है। वेदों में यज्ञ विद्या भरी पड़ी है। आवश्यकता है ज्ञान प्राप्त करने और उनपर शोध करने की। शोधार्थी तप, संयम से परिस्कृत और शब्द ऊर्जा से ज्ञाता हों।

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