व्य़ंग्यः UP विधानसभा में कोठा, कोठे में टल्‍ली पत्रकार पान भंडार

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  • गठित, पुनर्गठित और फिर पुनर्गठित होने का खेल
  • मामा को गाली का हिसाब पूछने पहुंचा भांजा, फिर चला रहपटा
  • बाथरूम में घुसे प्रोप्राइटर और प्रेस रूप में फैलती बदबू

कुमार सौवीर

Lucknow: विधानसभा परिसर में एक कोठा है, नाम है “प्रेस रूप”। इस कोठे में पान की एक दुकान भी है। दुकान का नाम है पत्रकार पान भंडार और दुकान के प्रोप्राइटर हैं त्रिपाठी। यह कोई सामान्य पान की दुकान नहीं है। यहां माल का मूल्य उसकी गुणवत्ता से नहीं, दुकानदार की सुविधा से तय होता है। खारिज माल अव्वल साबित किया जा सकता है और अव्वल माल को दो कौड़ी का। गठित को पुनर्गठित किया जा सकता है और पुनर्गठित को फिर से पुनर्गठित। पत्रकारिता का यह अनोखा कारोबार विधानसभा के उस परिसर में चलता है जहां लोकतंत्र की खबरें लिखी जानी चाहिए, लेकिन यहां कभी कभी खबर से ज्यादा खबरनवीसों की दुकानदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।

प्रोप्राइटर त्रिपाठी पत्रकारों की ऐसी दुकान चलाते हैं जिसमें ग्राहकों की संख्या चाहे जितनी बताई जाए, असली हिस्सेदारी गिनती के लोगों की ही दिखाई देती है। चार जनों की इस निजी कंपनी में पत्ते फेंटे जाते हैं, हिस्से बांटे जाते हैं और फिर तय होता है कि कौन पत्रकार है, कौन बड़ा पत्रकार है और कौन पत्रकार कहलाने लायक भी नहीं। कभी संगठन गठित होता है, फिर पुनर्गठित होता है और पुनर्गठन के बाद भी संतोष न हो तो दोबारा पुनर्गठन कर दिया जाता है।

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मानो पत्रकार संगठन कोई लोकतांत्रिक संस्था नहीं, ताश की गड्डी हो, जिसे जब चाहो फेंट लिया और जब चाहो नया खेल शुरू कर दिया। आरोप लगते रहे हैं कि इसी घेरे में कभी गाली गलौज होती है, कभी एनेक्सी में खिचड़ी भोज होता है और कभी पत्रकारिता के नाम पर ऐसे उपक्रम चलते हैं जिनका पत्रकारिता से रिश्ता तलाशने के लिए दूरबीन की जरूरत पड़े। पानवाड़ी ने खिचड़ी भोज में एक बड़के अफसर को बुला लिया, तो सचिवालय सचिव ने पनवाड़ी ही नहीं, बल्कि सारे पत्रकारों के एनेक्‍सी घुसने में परमानेंट रोक लगा दी। लो, अब पकड़ो सिंघाड़ा की नोक। पत्रकारची कहीं के।

अखबारों के नाम जरूर हैं, लेकिन पाठक तक अखबार पहुंचता है या नहीं, यह सवाल शायद इस दुकान की बिक्री नीति में शामिल ही नहीं है। लिखने की तमीज पर भी सवाल उठते हैं, लेकिन नाम अखबारों के ऐसे रखे जाते हैं जैसे देश की पत्रकारिता का भार इन्हीं कंधों पर टिका हो। अखबार बिके तो बिके, न बिके तो न सही, सरकारी मकान मौजूद है और दुकान चलाने के लिए सरकारी मकान से बेहतर जगह भला क्या होगी। उस मकान की अपनी भी एक दिलचस्प कहानी बताई जाती है। कभी वहां धर्मेंद्र प्रधान जैसे किसी नेता और उनकी पत्नी के रहने की चर्चा रही, बगल में टंकण करने वाला एक पत्रकार भी था। लेकिन वह पुराना किस्सा फिर कभी, क्योंकि वह अपने आप में अलग अध्याय मांगता है। बताते हैं कि इसी चक्‍कर में धर्मेंद्र टाइप नेता और टंकण में चुम्‍माचुम्‍मी होने लगी। बाद में झोंटा-झुंचव्‍वर।

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लेकिन अब आइए ताजा किस्से पर। उपलब्ध विवरण के मुताबिक एक दिन पहले विधानसभा के प्रेस रूप में प्रोप्राइटर त्रिपाठी और दूसरे त्रिपाठी के बीच विवाद हुआ। रिश्ते का हिसाब भी बड़ा दिलचस्प है। पीटे गए व्यक्ति को मामा बताया जा रहा है और हाथ उठाने वाले को भांजा। करीब पंद्रह दिन पहले मामा ने भांजे को गाली दी थी। कल सचिवालय के प्रेस रूप में दोनों आमने सामने पड़ गए। भांजे ने पुरानी गाली का हिसाब पूछ लिया। जवाब में कथित तौर पर फिर गाली मिली और इसके बाद पत्रकारिता का संवाद लोकतांत्रिक विमर्श से निकलकर हाथापाई में पहुंच गया। भांजे ने रहपटा रसीद कर दिया। मामा की पैंट ग्रीसयुक्त हो गयी। हालत बिगड़ती देखकर वहां मौजूद पत्रकार धीरे धीरे प्रेस रूप से खिसक लिये और मामा बाथरूम में जा घुसे। यानी जिस जगह से खबर बाहर निकलनी चाहिए थी, वहां खबर का एक पात्र ही भीतर घुस गया।

लेकिन रुकिए। कहानी का सबसे घटिया हिस्सा अभी बाकी है। प्रोप्राइटर त्रिपाठी जब से टायलेट में घुसे हैं, प्रेस रूप में बदबू आने लगी है। अब यह बदबू टायलेट की है, पत्रकारिता की है, संगठनबाजी की है, सरकारी मकान पर जमे कब्जे की है या उस पूरी व्यवस्था की जिसमें पत्रकारिता के नाम पर निजी दुकान चलाने की कोशिश होती है, इसका फैसला पाठक करें। पान की दुकान में नशेड़ी पान बिकता है या नहीं, यह तो जांच का विषय है, मगर विधानसभा के प्रेस रूप में अगर गाली, संगठनबाजी और थप्पड़ का कारोबार चलने लगे तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि किसके गाल पर रहपटा पड़ा। बड़ा सवाल यह है कि प्रेस रूप आखिर प्रेस का रूप बचा भी है या पत्रकारों की ऐसी दुकान बन चुका है जहां खबर से ज्यादा दुकानदारी बिकती है।

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