ब्राजील की गार्गी ग्लोरिया एरिएरा

Gloria Ariera

Gloria Ariera: ग्लोरिया भगवदगीता को वैश्विक ग्रंथ माने जाने की प्रबल पक्षधर हैं। वह कहती हैं सभी धर्मों के सार के साथ जीवन का सार इसमें निहित है। वेदांत, भगवद्गीता के साथ संस्कृत भाषा को आत्मसात करने वाली ब्राजील की विदुषी महिला ग्लोरिया एरिएरा के हृदय में भारतीय संस्कृति की आत्मा रच बस गई है। ग्लोरिया के भारतीय संस्कृति और भारत के आर्ष ग्रंथों के प्रति समर्पण और अनुशीलन और वेदांत में अतुल्य योगदान को देखते हुए उन्हें देश के शिखर सम्मान पद्मश्री से नवाजा गया है।

मूलत: ब्राजील की रहने वाली ग्लोरिया ने भारत की संस्कृति को जानने के लिए न केवल संस्कृत भाषा सीखी बल्कि उस पर एकाधिकार कर भगवदगीता और वेदों का पुर्तगाली भाषा में अनुवाद कर उसकी पहुंच उस समाज तक बनाई है जिसे भारत की महान सांस्कृतिक विरासत के बारे में बहुत अल्प ज्ञान था। उनकी यह यात्रा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। उन्होंने ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरियो में समुद्र के मनोरम तट पर वेदान्त और संस्कृत के पठन-पाठन के लिए विद्या मंदिर के नाम से एक संस्थान भी स्थापित किया है। इसमें ढेर सारे विदेशी विद्यार्थियों को वे भारतीय संस्कृति और वेद वेदांग की शिक्षा दे रही हैं। भारतीय संस्कृति के प्रति ग्लोरिया के झुकाव की कहानी बहुत दिलचस्प है।

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बात 1973 की है। रियो डी जेनेरियो में वे एक बार चिन्मय मिशन के भगवदगीता व्याख्यानमाला में भाग लेने गई थीं। दरअसल सुख समृद्धि के बीच पली बढ़ी ग्लोरिया को वैसे कोई कमी नहीं थी मगर उनके हृदय के कोने में अपने अस्तित्व को जानने की जिज्ञासा के अंकुर थे जो अनुकूल वातावरण पाकर प्रस्फुटित हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि खुद को जानने के लिए उनके मन में जो अकुलाहट और बेचैनी है उसका उत्तर तो भगवदगीता के तत्वमसि के सार में उन्हें मिल गया। उन्हें यही जिज्ञासा भारत खींच लाई। उन्होंने मुंबई (पोवाल) स्थित चिन्मयानंद आश्रम में वेद, भारतीय दर्शन, भगवद्गीता, उपनिषद का मर्म समझने के लिए संस्कृत भाषा में दक्षता हासिल की।

भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और दर्शन को जानने के क्रम में वे भारतीय जीवन पद्धति, रहन-सहन और खान-पान से भी बेहद प्रभावित हुईं। एक तरह से भारत की उनकी यह यात्रा अपने अस्तित्व के खोज की यात्रा थी। उन्हें हम कौन हैं?, हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? और उसे पाने का मार्ग क्या है? इसका संतोषजनक उत्तर भारतीय ग्रंथों के अध्ययन, मनन और अनुशीलन से मिल गया। इन ग्रंथों ने सही मायनों में उन्हें आत्म साक्षात्कार करा दिया। चूंकि उनकी मनोभूमि पहले से इन सवालों का उत्तर जानने समझने के लिए उर्वर हो चुकी थी ऐसे में उन्हें बहुत ही कम समय में भारतीय संस्कृति के गूढ़ रहस्य समझ में आ गए।

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नतीजा सामने था। शोहरत इतनी बढ़ी कि उनसे ढेर सारे विद्यार्थी भारतीय संस्कृति और वेदान्त पढ़ने आने लगे। वह संस्कृत, पुर्तगाली और अंग्रेजी भाषा में वेदान्त और उपनिषद की कक्षाएं लेने लगींं। बकौल ग्लोरिया उनके विद्यार्थियों ने उनसे न केवल भारतीय आर्ष ग्रंथों की शिक्षा प्राप्त की बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी सकारात्मक बदलाव महसूस किया। परिणामस्वरूप उनका वैदिक अध्ययन केंद्र प्रसिद्धि के शिखर चूमने लगा। वह स्वीकार करती हैं कि भारतीय संस्कृति को मनसा वाचा कर्मणा अंगीकार करने के कारण ही उन्हें यह शोहरत और सम्मान प्राप्त हुआ। उन्होंने विदेशी पहनावा त्यागकर भारतीय परिधान साड़ी धारण कर लिया। 1996 में चारों धाम की यात्रा कर भारतीय संस्कृति के मानबिंदुओं की महत्ता और प्रभाव को प्रत्यक्ष महसूस किया। 2007 में भारत की प्राणवायु कहे जाने वाले स्थलों गोमुख, गंगोत्री और बद्रीनाथ की यात्रा कर मानों उन्हें अपने जीवन का अभीष्ट प्राप्त हो गया।

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ग्लोरिया की पारिवारिक पृष्ठभूमि

उम्र के 58 वसंत पार कर चुकी ग्लोरिया तीन बच्चों की गौरवशाली मां हैं। उन्होंने अपने पूरे परिवार को भारतीय जीवन पद्धति, संस्कृति और संस्कारों में ढाल दिया है। उनके पति हेनेरिक क्रिस्टो योग शिक्षक हैं। हर शुक्रवार को उनके वहां मां सरस्वती की पूजा होती है। उनके द्वारा स्थापित विद्या मंदिर में सभी भारतीय त्योहार बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं। भारतीय संस्कृति और देववाणी संस्कृत को आचरण में उतारने वाली ग्लोरिया की गणना प्राचीन भारत की गार्गी, घोषा, लोपाद्रुमा और मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं की श्रेणी में होने लगी है। रियो डी जेनेरियो निवासी ग्लोरिया की परवरिश चार भाई बहनों वाले संयुक्त परिवार में हुई है। अपने जीवन और सोच को विस्तृत फलक देने में वह देश विदेश की यात्राओं का बड़ा योगदान मानती हैं। उनकी मातृभाषा तो पुर्तगाली है मगर उनकी शिक्षा दीक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई है। इस भाषा पर भी उनका समान अधिकार है।

ऐश्वर्य और सुख से भरी पाश्चात्य संस्कृति को छोड़कर भारतीय संस्कृति के आत्मोत्सर्ग वाले मार्ग को अपनाने के बारे में वह कहती हैं- मैं क्रिश्चियन धर्म में पली बढ़ी और जिन सवालों ने मेरे चेतन मन को बेचैन कर रखा था उनका हल ढूंढ़ने के लिए मैंने अपने मूल धर्म के ग्रंथों और विद्वानों का सानिध्य प्राप्त किया मगर मेरे सवाल अनुत्तरित ही रहे। वहां ईश्वर या परम सत्ता को जानने के लिए कोई ऐसा मार्ग मिला ही नहीं जो मेरे ‘रेशनल माइंडÓ और आध्यात्मिक मन दोनों की जिज्ञासा शांत कर सके। पर स्वामी चिन्मयानंद से मुलाकात के बाद उनके निर्देशानुसार जैसे ही मैंने वेदांत, भागवदगीता का अध्ययन और सत्संग किया मेरी आध्यात्मिक और तार्किक दोनों ही जिज्ञासा शांत हो गई।

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मेरा भ्रम दूर हो गया। हमने स्वामी चिन्मयानंद और मिशन के गुरुकुलम के आचार्य स्वामी ध्यानानंद के सानिध्य में रहकर जीवन के लक्ष्य और उसे प्राप्त करने के लिए संधान का तरीका सीखा। स्वामी जी ने बताया जीवन में समस्याएं आनी तय हैं। हम उसे रोक नहीं सकते। अलबत्ता जीवन की प्राथमिकताएं तय कर इन समस्याओं को सहचर बनाते हुए जीवन पथ पर चलने का उपक्रम कर सकते हैं। जीवन की बाधाओं को सहजता से स्वीकार करके ही हम आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर चल सकते हैं। ग्लोरिया कहती हैं स्वामी जी से मिले उपदेश के इन मोतियों ने हमें अंदर से बहुत दृढ़ बनाया।

स्वामी चिन्मयानंद से जीवन के व्यावहारिक पक्ष का ज्ञान प्राप्त करने के बाद हमने स्वामी ध्यानानंद से वेदांत और सनातन धर्म की शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने बताया कि वेदांत कोई धर्म नहीं जिसमें आस्था या विश्वास व्यक्त किया जाय। यह तो स्वयं में प्रमाण है। यह खुद के साथ ईश्वर और संसार की वास्तविकता जानने का स्वयंसिद्ध प्रमाण है और यही वह मार्ग भी है जो महाध्येय वाक्य ‘तत्वमसि’ के गूढ़ रहस्यों की परतें खोलता है। भागवदगीता के 18 अध्यायों में इसी ‘तत्वमसि’ की ही तो व्याख्या है। इसीलिए ग्लोरिया भगवदगीता को वैश्विक ग्रंथ माने जाने की प्रबल पक्षधर हैं। वह कहती हैं सभी धर्मों के सार के साथ जीवन का सार इसमें निहित है।

विवेकानंद त्रिपाठी

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