
New Delhi: जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी नेटवर्क की डिजिटल गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने एक नई चुनौती का पता लगाया है। अधिकारियों के अनुसार, पारंपरिक मैसेजिंग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी बढ़ने के बाद आतंकी संगठन कथित तौर पर ऐसे वैकल्पिक ऑनलाइन माध्यमों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनके जरिए उनकी पहचान और बातचीत को छिपाया जा सके।
जांच से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स और दूसरे डिजिटल माध्यमों पर कार्रवाई बढ़ने के बाद आतंकी नेटवर्क ने अपने संचार के तरीकों में बदलाव किया है। अब कुछ संदिग्ध नेटवर्क ऐसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और एन्क्रिप्टेड संचार सेवाओं का सहारा ले रहे हैं, जिनकी निगरानी करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
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सोशल मीडिया की जगह वैकल्पिक ऑनलाइन माध्यम
अधिकारियों के मुताबिक, आतंकी नेटवर्क अब व्हाट्सऐप, सिग्नल और फेसबुक जैसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म्स पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। जांच में ऐसे मामलों की जानकारी सामने आई है, जहां इंटरनेट पर उपलब्ध कुछ कम पारंपरिक चैट सुविधाओं का इस्तेमाल संपर्क स्थापित करने के लिए किया गया।
सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि सीमा पार बैठे हैंडलर्स इन माध्यमों के जरिए जम्मू-कश्मीर में मौजूद संपर्कों तक पहुंच बनाने और उन्हें निर्देश देने का प्रयास कर सकते हैं। युवाओं को प्रभावित करने और आतंकी गतिविधियों की ओर आकर्षित करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दुरुपयोग की संभावना को भी गंभीरता से देखा जा रहा है।
एन्क्रिप्टेड ऐप्स भी जांच के दायरे में
जांच एजेंसियां ऐसे एन्क्रिप्टेड ऐप्स और डिजिटल सेवाओं की भी पड़ताल कर रही हैं, जिनमें यूजर की पहचान छिपाने की सुविधा उपलब्ध होती है। कुछ प्लेटफॉर्म्स पर मोबाइल नंबर, सिम कार्ड या सामान्य ईमेल आधारित रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता कम या अलग तरीके की हो सकती है।
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ऐसी तकनीकों के कारण किसी संदिग्ध डिजिटल नेटवर्क की पहचान करना और उसके संपर्कों तक पहुंचना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अधिकारियों के मुताबिक, फ्रांस, वियतनाम और चीन से जुड़े कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की गतिविधियों को भी जांच के दायरे में रखा गया है।
कमजोर इंटरनेट नेटवर्क में भी संपर्क की कोशिश
सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि कुछ डिजिटल सेवाएं कम इंटरनेट स्पीड वाले नेटवर्क पर भी काम कर सकती हैं। जम्मू-कश्मीर के दूरदराज क्षेत्रों में कमजोर कनेक्टिविटी को देखते हुए यह आतंकी नेटवर्क के लिए उपयोगी हो सकता है। कुछ संचार सेवाओं में संदेशों को सीमित समय के बाद हटाने जैसी सुविधाएं भी होती हैं। हालांकि, इन तकनीकों के इस्तेमाल को लेकर सुरक्षा एजेंसियां लगातार निगरानी और डिजिटल विश्लेषण कर रही हैं।
पुलवामा के बाद लगातार बदली डिजिटल रणनीति
आतंकी संगठनों द्वारा तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा नया नहीं है। 2019 के पुलवामा हमले की जांच के दौरान भी वर्चुअल सिम के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकी नेटवर्क की डिजिटल गतिविधियों पर निगरानी और मजबूत की।
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