अयोध्या से लिखी जा रही है 27 की पटकथा?

Anupam Kher
संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

Anupam Kher अयोध्या की पावन धरा पर इन दिनों सिने जगत के प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर अपनी आगामी फिल्म ‘श्री राम भूमि’ की शूटिंग के सिलसिले में पहुंचे हैं। हनुमानगढ़ी में मत्था टेकने और रामलला के दर्शन करने के बाद उन्होंने जो कहा, वह केवल एक बयान नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं का प्रतिबिंब है। उन्होंने दान पेटी में चोरी की घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा, अगर किसी के घर में चोरी होती है, तो हम चोर को कोसते हैं, न कि उस पवित्र घर को लांछन लगाते हैं। यह एक छोटा-सा वाक्य उन तमाम शक्तियों को जवाब है, जो मंदिर की गरिमा को एक तुच्छ घटना के जरिए कमतर आंकने की कोशिश कर रही हैं। राम मंदिर का निर्माण कोई साधारण निर्माण कार्य नहीं है। यह पाँच शताब्दियों के संघर्ष, अनगिनत बलिदानों और न्याय के लिए किए गए लंबे इंतजार की परिणति है। राम भक्त जब आज अयोध्या की गलियों में चलते हैं, तो उनके पैरों में उस मिट्टी का गौरव होता है, जिसके लिए उनके पूर्वजों ने अपनी जानें न्योछावर कर दी थीं।

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अनुपम ने दो टूक कहा, दान चोरी जैसी घटनाओं से मंदिर की पवित्रता कम नहीं हो सकती, क्योंकि राम मंदिर भक्तों के लिए महज ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और अस्मिता का केंद्र है। एक चोर की नीच हरकत, जो लोभवश की गई हो, वह उस आस्था को कैसे हिला सकती है, जिसने मुगलों के अत्याचार और सदियों के विध्वंस को झेलने के बाद भी अपनी जड़ों को जीवित रखा? भक्त जानता है कि रामलला का मंदिर उस अखंड भारत की स्मृति है, जिसकी रक्षा के लिए हिंदू समाज हर चुनौती का सामना करने को तत्पर रहता है। अनुपम खेर के कहने का सार यही था कि अयोध्या में दान चोरी को लेकर जिस तरह की सियासी बयानबाजी हो रही है, वह चिंताजनक है। विपक्षी दलों द्वारा इस घटना को मुद्दा बनाकर भाजपा, आरएसएस और साधु-संतों को अपमानित करने का जो प्रयास किया जा रहा है, वह स्पष्ट रूप से असुविधाजनक राजनीति का हिस्सा है। बहरहाल, विपक्ष की यह रणनीति कि मंदिर के बहाने सत्ता पर निशाना साधा जाए, जमीनी हकीकत से कोसों दूर दिखती है। आम हिंदू मानस में यह सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्ष को मंदिर की सुरक्षा में हुई चूक पर अफसोस है या वह इस घटना को एक हथियार के रूप में उपयोग करना चाहता है? जब दरगाहों, मदरसों या वक्फ बोर्ड में अनियमितताओं की खबरें आती हैं, तब इसी विपक्ष की चुप्पी यह दर्शाती है कि इनकी धर्मनिरपेक्षता का पैमाना चुनिंदा है। हिंदू समाज इस दोहरे मानदंड को भली-भांति देख और समझ रहा है।

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आश्चर्य होता है कि अयोध्या में चंदा चोरी पर हल्ला मचाने वाले दिग्गज राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल वक्फ बोर्ड, दरगाहों और मदरसों से जुड़ी अनियमितताओं के आरोपों, देश-विरोधी गतिविधियों के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोलते हैं। इस पर आलोचकों का तर्क है कि इन नेताओं की चुप्पी तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा होती है, जबकि संबंधित नेताओं का रुख यह रहता है कि वे ऐसे मामलों में सबूतों और कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करते हैं। हाल के वर्षों में वक्फ बोर्ड की संपत्तियों के हस्तांतरण और प्रबंधन को लेकर देश के विभिन्न राज्यों में गंभीर सवाल उठे हैं। विपक्षी नेताओं ने वक्फ (संशोधन) विधेयक के विरोध में मुखरता दिखाई है, लेकिन जब वक्फ बोर्ड के भीतर भ्रष्टाचार या कुप्रबंधन की विशिष्ट शिकायतों की बात आती है, तो ये नेता मौन साधे रहे। जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़ी अनियमितता के आरोपों पर इन नेताओं द्वारा कोई स्पष्ट बयान न देना मतदाताओं के एक वर्ग को साधने की रणनीति के रूप में देखा जाता है। इसी प्रकार से उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में मदरसों की जांच के दौरान विदेशी फंडिंग और वित्तीय अनियमितताओं के दावे किए गए हैं। इन जांचों के दौरान जब मदरसों के प्रबंधन पर सवाल उठे, तो अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने इसे केवल धार्मिक संस्थानों को निशाना बनाने की कार्रवाई करार दिया। उन्होंने इन संस्थाओं के भीतर वित्तीय पारदर्शिता या भ्रष्टाचार के विशिष्ट आरोपों पर विस्तृत टिप्पणी करने के बजाय प्रशासनिक कार्रवाई को ही राजनीतिक रंग दिया, जिससे यह संदेश गया कि वे संस्थागत सुधारों पर चुप्पी साधे हुए हैं।

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वहीं, कई दरगाहों और उनके ट्रस्टों के प्रबंधन को लेकर समय-समय पर स्थानीय स्तर पर धांधली और चंदे के दुरुपयोग की खबरें आती रही हैं। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं का स्टैंड अक्सर धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षण पर केंद्रित रहता है। वे ऐसे विवादों में तब तक दूरी बनाए रखते हैं, जब तक कि कोई बड़ा न्यायिक निर्णय या व्यापक सार्वजनिक आक्रोश न हो। आलोचक इसे एक चुनिंदा चुप्पी के रूप में देखते हैं, जहां भ्रष्टाचार के मुद्दों को केवल इसलिए नहीं उठाया जाता, क्योंकि वे धार्मिक संस्थानों से जुड़े होते हैं। यह स्थिति भारतीय राजनीति के उस जटिल दौर को दर्शाती है, जहां भ्रष्टाचार के मुद्दे भी धर्म और पहचान की राजनीति के घेरे में आ जाते हैं। ऐसे में, इन नेताओं की चुप्पी न केवल उनके राजनीतिक स्टैंड पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि धर्म से जुड़े संस्थानों में सुधार की प्रक्रिया राजनीतिक रूप से कितनी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। उधर, राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए विपक्ष की चंदा चोरी पर हल्ला मचाने वाली रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है। जाति-पाति के नाम पर हिंदू समाज को बांटने की कोशिशें तब और ज्यादा आक्रामक हो जाती हैं, जब वे अपनी सांस्कृतिक पहचान पर प्रहार महसूस करते हैं।

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इतिहास गवाह है कि जब-जब राम, मंदिर या सनातन संस्कृति का अपमान करने का प्रयास हुआ है, तब-तब हिंदू मतदाता ने राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर लामबंद होकर जवाब दिया है। विपक्ष का मंदिर पर हमला, वास्तव में सीधे उन करोड़ों मतदाताओं के हृदय पर चोट है, जिन्होंने राम मंदिर को अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना माना था। यह संभव है कि विपक्ष की यह कुत्सित राजनीति हिंदू मतदाताओं को और अधिक एकजुट कर दे और वे बीजेपी के साथ और मजबूती से खड़े हो जाएं। खैर, अनुपम खेर जैसे कलाकारों का अयोध्या आना और वहां की आस्था को फिल्म के माध्यम से वैश्विक पटल पर ले जाना, यह संदेश देता है कि अयोध्या अब केवल तीर्थ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में पुनर्जीवित हो रही है। मंदिर की गरिमा चोरों से नहीं, बल्कि उन लोगों के संकल्प से मापी जाएगी, जो 500 साल तक उस मंदिर के लिए लड़े। लब्बोलुआब यह है कि राजनीति आती-जाती रहेगी, चुनाव आएंगे और जाएंगे, लेकिन राम के प्रति भक्तों का विश्वास एक ऐसे अटल सत्य की तरह है, जिसे किसी भी राजनीतिक बयानबाजी या छोटी-मोटी चोरी के दावों से डिगाया नहीं जा सकता। यदि विपक्ष ने अपनी रणनीति नहीं बदली, तो 2027 का चुनाव उनकी उम्मीदों के विपरीत, एक बार फिर हिंदू अस्मिता की बड़ी विजय का साक्षी बन सकता है।

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