क्या ऐसे बनेगा विकसित भारत?

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अजय कुमार                             
अजय कुमार

India 2047 में विकसित भारत बनने का सपना केवल एक सरकारी लक्ष्य नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षा है। यह सपना दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने, आधुनिक शहरों, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे और बेहतर जीवन गुणवत्ता का वादा करता है। लेकिन हर मानसून इस सपने के सामने एक ऐसा आईना रख देता है, जिसमें चमचमाते दावे नहीं, बल्कि पानी में डूबी सड़कें, घंटों का ट्रैफिक जाम, उफनते सीवर, धंसती सड़कें और बेबस नागरिक दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं कि बारिश कितनी हुई। असली सवाल यह है कि क्या हमारा शहरी ढांचा आज भी सामान्य मानसूनी बारिश झेलने लायक नहीं बन पाया? इस बार मानसून ने पूरे देश को समय पर अपनी गिरफ्त में ले लिया। किसानों के लिए यह राहत की खबर थी, लेकिन शहरों के लिए वही पुराना संकट लौट आया।

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दिल्ली में कुछ घंटों की बारिश के बाद अंडरपास जलमग्न हो गए, प्रमुख सड़कों पर लंबा जाम लग गया और कई इलाकों में जनजीवन ठहर गया। गुरुग्राम में करीब 115 मिमी बारिश ने एनएच-48 से लेकर सोहना रोड तक यातायात को घंटों रोक दिया। शहर की पहचान आईटी कंपनियों और ऊंची इमारतों से है, लेकिन हर बारिश यह साबित कर देती है कि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ड्रेनेज सिस्टम है, न कि मौसम। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ भी इससे अलग नहीं है। गोमती नगर, आशियाना, जानकीपुरम, अलीगंज और कई नई कॉलोनियों में हर साल वही दृश्य दोहराया जाता है। जिन सड़कों का उद्घाटन कुछ महीने पहले हुआ होता है, वे पहली तेज बारिश में उखड़ने लगती हैं। कहीं डामर बह जाता है, कहीं गड्ढे बन जाते हैं और कहीं पूरी सड़क धंस जाती है। शहर का विस्तार तो तेजी से हुआ, लेकिन जलनिकासी की योजना उसी अनुपात में विकसित नहीं हुई। नई कॉलोनियां बसती रहीं, पर यह नहीं सोचा गया कि बरसात का पानी आखिर जाएगा कहां?समस्या की जड़ केवल भारी वर्षा नहीं, बल्कि हमारी विकास की सोच है। भारत में सड़क बनने से पहले ही उसके दोबारा खोदे जाने की तैयारी शुरू हो जाती है।

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आज सीवर लाइन बिछेगी, कुछ महीने बाद गैस पाइपलाइन डलेगी, फिर बिजली की केबल जाएगी, उसके बाद फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क। हर विभाग अलग काम करता है, लेकिन किसी के पास साझा योजना नहीं होती। परिणाम यह होता है कि करोड़ों रुपये खर्च कर बनी सड़कें बार-बार टूटती हैं और अंततः नागरिक को घटिया निर्माण की कीमत चुकानी पड़ती है। विकसित देशों में पहले भूमिगत उपयोगिताओं की समेकित योजना बनाई जाती है, उसके बाद सड़क बनती है। भारत में अक्सर सड़क पहले बनती है और योजना बाद में खोजी जाती है।

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इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी जवाबदेही की है। नगर निगम नालों की सफाई का दावा करता है, लोक निर्माण विभाग सड़क निर्माण का, विकास प्राधिकरण आधुनिक कॉलोनियों का और जल संस्थान सीवर सुधार का। लेकिन जब बारिश होती है तो हर विभाग दूसरे पर जिम्मेदारी डाल देता है। आखिर पहली बारिश में सड़क धंसने पर कितने अभियंता निलंबित होते हैं? कितने ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जाता है? कितने अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है? शायद ही कोई उदाहरण जनता को याद हो। यही कारण है कि हर साल वही गलती दोहराई जाती है और हर बार नए वादे कर दिए जाते हैं।

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भ्रष्टाचार इस संकट की सबसे मजबूत जड़ है। यदि सड़क की आयु दस वर्ष होनी चाहिए और वह एक वर्ष में टूट जाए, तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन की बर्बादी है। यदि नालों की सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पहली बारिश में पानी सड़कों पर भर जाए, तो इसका अर्थ साफ है कि या तो काम ईमानदारी से नहीं हुआ या निगरानी पूरी तरह विफल रही। विकास का सबसे बड़ा दुश्मन संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि संसाधनों का गलत उपयोग है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत की शहरी आबादी 2050 तक लगभग 95 करोड़ तक पहुंच सकती है और तब तक आवश्यक शहरी बुनियादी ढांचे का आधे से अधिक हिस्सा अभी बनाया जाना बाकी है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि यदि शहरों को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप तैयार नहीं किया गया तो केवल शहरी जलभराव से ही हर वर्ष अरबों डॉलर का नुकसान होगा।

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दिल्ली और लखनऊ उन 24 शहरों में शामिल हैं, जिनका अध्ययन इस रिपोर्ट में किया गया। जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। अब कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि शहरों ने अपने प्राकृतिक नाले, तालाब, पोखर और वर्षाजल के रास्ते स्वयं खत्म कर दिए हैं। जहां पानी को जमीन में उतरना था, वहां आज कंक्रीट है। जहां जलनिकासी का रास्ता था, वहां बहुमंजिला इमारतें खड़ी हैं। जब प्रकृति का रास्ता बंद होगा, तो पानी अपना रास्ता खुद बनाएगा और उसका पहला पड़ाव हमारी सड़कें ही बनेंगी।

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विकसित भारत का अर्थ केवल बुलेट ट्रेन, मेट्रो या एक्सप्रेसवे नहीं है। विकसित भारत वह होगा जहां किसी गर्भवती महिला की एम्बुलेंस बारिश के कारण जाम में न फंसे, जहां स्कूल जाने वाले बच्चे गंदे पानी से होकर न गुजरें, जहां व्यापारी का कारोबार जलभराव से बंद न हो और जहां पहली बारिश के बाद लोग सोशल मीडिया पर डूबी हुई राजधानी की तस्वीरें साझा करने को मजबूर न हों।अब समय केवल घोषणाओं का नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने का है। हर शहर का वैज्ञानिक ड्रेनेज मास्टर प्लान अनिवार्य होना चाहिए। सड़क निर्माण से पहले सभी उपयोगिता एजेंसियों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया जाए। ठेकेदारों को गुणवत्ता की कानूनी गारंटी देनी होगी।

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पहली बारिश में सड़क टूटे तो भुगतान रोका जाए और जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। शहरों के पुराने तालाब, नाले और वर्षाजल मार्ग पुनर्जीवित किए जाएं। नगर निकायों का सामाजिक और तकनीकी ऑडिट नियमित रूप से हो। जब तक भ्रष्टाचार पर कठोर प्रहार नहीं होगा, तब तक हर मानसून विकास के दावों को बहाकर ले जाएगा। 2047 दूर नहीं है। हर गुजरता मानसून हमें याद दिला रहा है कि विकसित भारत का रास्ता संसद की घोषणाओं से नहीं, बल्कि शहर की उस सड़क से होकर जाता है जिस पर आम नागरिक रोज चलता है। यदि दिल्ली, लखनऊ और देश के दूसरे शहर हर वर्ष पहली बारिश में ठहर जाते हैं, तो समस्या बादलों में नहीं, हमारी नीतियों में है। विकसित राष्ट्र बनने का सपना तभी सच होगा, जब बारिश राहत का संदेश लेकर आए, भय और बदहाली का नहीं।

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