पत्रकारिता और बेरोज़गारी का पोस्टमार्टम: सच, संघर्ष और सवाल

Journalism

 

विजय श्रीवास्तव
विजय श्रीवास्तव

Journalism लखनऊ/बढ़नी। समाज की बुराइयों पर किसी न किसी को पहल करनी ही पड़ती है। क्यों न शुरुआत अपने ही पत्रकार समाज की कमियों पर आत्ममंथन से की जाए। आज शहरों और कस्बों में अखबारों तथा तथाकथित पत्रकारों की बाढ़-सी आ गई है। दोपहिया और चारपहिया वाहनों पर “प्रेस” लिखा आसानी से दिखाई देता है। कई लोग पत्रकारिता की मूल शिक्षा या प्रशिक्षण लिए बिना ही अपना समाचार पत्र शुरू कर देते हैं और बेरोजगार युवाओं को आकर्षक सपने दिखाकर अवैतनिक संवाददाता बना लेते हैं। उनकी आय का प्रमुख स्रोत समाचार नहीं, बल्कि विज्ञापन जुटाना बन जाता है। राष्ट्रीय पर्वों या सरकारी आयोजनों के समय विभिन्न कार्यालयों में विज्ञापन मांगने वालों की लंबी कतारें इस व्यवस्था की एक सच्चाई को उजागर करती हैं। उत्तर प्रदेश में हजारों समाचार पत्र और पत्रिकाएं पंजीकृत हैं, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या का अस्तित्व मुख्यतः विज्ञापनों पर टिका है। अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्र भी समय के साथ आर्थिक संकट के कारण बंद हो चुके हैं।

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पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना, समाज को सही जानकारी देना और जनहित की आवाज़ बनना है। लेकिन जब पत्रकारिता केवल विज्ञापन या निजी लाभ का माध्यम बन जाती है, तब उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सभी पत्रकार भ्रष्ट हैं। आज भी बड़ी संख्या में ईमानदार और निष्ठावान पत्रकार कठिन परिस्थितियों में निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं। उन्हीं के कारण पत्रकारिता की गरिमा और समाज का विश्वास आज भी कायम है। एक गंभीर प्रश्न यह भी है कि बेरोजगारी के कारण अनेक शिक्षित युवा पत्रकारिता को आसान रोजगार समझकर इसमें आ जाते हैं। यदि पत्रकारिता केवल पहचान, सम्मान या प्रभाव का माध्यम बनकर रह जाए और आर्थिक आत्मनिर्भरता का कोई स्थायी आधार न हो, तो भविष्य में परिवार की जिम्मेदारियां निभाना कठिन हो सकता है। अस्पताल के बढ़ते खर्च, बच्चों की शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं के सामने केवल सामाजिक पहचान पर्याप्त नहीं होती। इसलिए युवाओं को पत्रकारिता में आने से पहले स्वयं से कुछ प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए। क्या यह उनका मिशन है या केवल रोजगार का विकल्प? क्या उनके पास आजीविका का कोई स्थायी स्रोत है? क्या वे आर्थिक दबाव के बावजूद निष्पक्ष पत्रकारिता कर पाएंगे।

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अक्सर कहा जाता है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति सच बोलने में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र होता है, क्योंकि वह छोटे-छोटे प्रलोभनों या दबावों से आसानी से प्रभावित नहीं होता। हालांकि यह हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू नहीं होता है।  ईमानदारी अंततः व्यक्ति के चरित्र और मूल्यों पर निर्भर करती है। महात्मा गांधी का यह विचार आज भी प्रासंगिक है कि अत्यधिक धन की लालसा और समाज सेवा साथ-साथ नहीं चल सकती। पत्रकारिता मूलतः समाज सेवा का माध्यम है, इसलिए इसमें नैतिकता, आत्मानुशासन और आर्थिक स्वावलंबन तीनों का संतुलन आवश्यक है। सरकारें भी शिक्षित बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार और उद्यमिता से जुड़ी अनेक योजनाएं संचालित करती हैं। युवाओं को चाहिए कि वे इन अवसरों का लाभ उठाकर अपने भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाएं। पत्रकारिता करें, लेकिन उसे मजबूरी नहीं, बल्कि मिशन बनाएं। पत्रकारिता का सम्मान केवल प्रेस लिखी गाड़ी या परिचय पत्र से नहीं बढ़ता, बल्कि निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और जनहित के प्रति समर्पण से बढ़ता है। यही पत्रकारिता की वास्तविक पहचान है।

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