E20 मिला पेट्रोल वर्षों के परीक्षण और विचार-विमर्श का नतीजा

Maruti Suzuki E20 : पेट्रोलियम मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि ई10 से ई20 (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) की तरफ बदलाव वर्षों के जांच, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के साथ विचार-विमर्श और जमीनी परीक्षण का परिणाम है। साथ ही, कहा कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की प्रक्रिया उनकी सरकार में नहीं, बल्कि पिछली सरकारों के दौरान हुई थी। मंत्रालय ने बयान में कहा, “2001 में एथेनॉल मिलाने का एक पायलट प्रोग्राम शुरू किया गया था, 2004 में इसकी औपचारिक घोषणा की गई थी और 2006 तक कई राज्यों में ई5 (5 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण) लागू कर दिया गया था। इसके बाद, यूपीए सरकार के दौरान जनवरी 2013 में भारत के राजपत्र में इसकी पॉलिसी रूपरेखा को अधिसूचित किया गया था। ये सभी सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध है।” भारत ने 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य रखा था। दुर्भाग्य से, इस लक्ष्य के बावजूद, 2014 तक मिश्रण लगभग 1.5 प्रतिशत पर ही अटकी रही।

पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा, “ईंधन के तौर पर एथेनॉल पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। यह बात दुनिया भर में पहले ही तय हो चुकी थी। असली चुनौती यह थी कि भारत कैसे पर्याप्त मात्रा में एथेनॉल का उत्पादन कर सकता है।” उस समय भारत लगभग पूरी तरह से गन्ने पर निर्भर था, जो एक मौसमी फसल है, और सालाना एथेनॉल उत्पादन क्षमता लगभग 400 करोड़ लीटर थी। उत्पादन का यह स्तर एथेनॉल मिश्रण के मामूली लक्ष्यों के लिए भी अपर्याप्त था।

इस समस्या को समझते हुए, सरकार ने अपने काम करने के तरीके में बुनियादी बदलाव किया। मई 2018 में ‘बायोफ्यूल पर राष्ट्रीय नीति’ शुरू होने के साथ, सरकार ने बड़े पैमाने पर एथेनॉल बनाने के लिए जरूरी इकोसिस्टम बनाना शुरू किया। यह पूरी सरकार के लिए एक मिशन बन गया था। सरकारी बयान में कहा गया, “पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय, भारतीय रेलवे और कई अन्य मंत्रालयों ने मिलकर काम किया। उन्होंने फीडस्टॉक बढ़ाने, इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने, टेक्नोलॉजी को सपोर्ट करने, लॉजिस्टिक्स को सही करने, मांग को लेकर निश्चितता बनाने और निवेश को बढ़ावा देने के लिए आपसी तालमेल के साथ काम किया।”

सरकार ने आगे बताया कि अगस्त 2021 में एक अहम कदम उठाया गया, जब भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों आईओसीएल, बीपीसीएल और एचपीसीएल ने एथेनॉल की कमी वाले इलाकों में खास तौर पर एथेनॉल प्लांट (डीईपी) लगाने के लिए ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (रुचि की अभिव्यक्ति) जारी किए।

इन प्रोजेक्ट्स ने निवेश के माहौल को पूरी तरह बदल दिया क्योंकि इनमें ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की तरफ से लंबे समय तक खरीद के पक्के समझौते; एस्क्रो मैकेनिज्म के जरिए पब्लिक सेक्टर के बैंकों के साथ तीन-तरफा फाइनेंसिंग व्यवस्था, जिससे निवेश का जोखिम काफी कम हो गया और सिर्फ ‘एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम’ के लिए एथेनॉल की अनिवार्य आपूर्ति जैसी बातें शामिल थीं। साथ ही, इन प्लांट्स को चालू होने में स्वाभाविक रूप से लगभग दो साल का समय लगा।

एक और अहम पड़ाव जून 2021 में आया, जब नीति आयोग ने ऑटोमोबाइल बनाने वाली कंपनियों, तेल कंपनियों, कृषि विशेषज्ञों और दूसरे संबंधित लोगों के साथ व्यापक बातचीत के बाद एथेनॉल मिश्रण के बारे में अपना विस्तृत रोडमैप जारी किया।

रिपोर्ट में न सिर्फ एथेनॉल से पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा को होने वाले फायदों पर ज़ोर दिया गया, बल्कि ग्रामीण आय और कृषि अर्थव्यवस्था पर इसके बड़े असर के बारे में भी बताया गया। उस समय  भारत को 10 प्रतिशत मिश्रण के लिए सालाना 500-600 करोड़ लीटर एथेनॉल की जरूरत थी। जैसे-जैसे नए निवेश आए और उत्पादन क्षमता बढ़ी, यह साफ हो गया कि देश जल्द ही लगभग 1,200 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन करने में सक्षम हो जाएगा।

मंत्रालय ने कहा कि एक बार जब सप्लाई की स्थिति सुरक्षित हो गई, तो 20 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य रखना तार्किक और जिम्मेदार कदम बन गया। इस कारण यह सुझाव कि भारत ने एथेनॉल ब्लेंडिंग में ‘जल्दबाजी’ की, तथ्यों से मेल नहीं खाता। यह दो दशकों से ज्यादा का सफ़र रहा है – 2001 में पायलट प्रोजेक्ट्स से लेकर 2013 में पॉलिसी नोटिफिकेशन, 2018 के बाद संस्थागत सुधार, 2021 में बड़े पैमाने पर निवेश और फिर ब्लेंडिंग के स्तर में सोच-समझकर और चरणबद्ध तरीके से बढ़ोतरी।

बयान के अनुसार, इसे लागू करने से पहले ऑटोमोबाइल बनाने वाली कंपनियों, टेस्टिंग एजेंसियों, ओएमसी, डीएफपीडी आदि सहित सभी संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श किया गया था। ई20 को लागू करने से पहले, सरकार ने पूरे इकोसिस्टम में तैयारी सुनिश्चित करने के लिए ऑटोमोबाइल बनाने वाली कंपनियों, तकनीकी विशेषज्ञों, टेस्टिंग एजेंसियों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ कई दौर की विस्तृत बातचीत की।

मारुति सुजुकी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 2.84 करोड़ गाड़ियों की सर्विसिंग की, जिनमें 1.5 करोड़ पुरानी, ​​नॉन-ई20 सर्टिफाइड गाड़ियां शामिल थीं, और ई20 से जुड़े किसी भी तरह के जंग, असामान्य टूट-फूट या पुर्जों की उम्र कम होने जैसी कोई समस्या नहीं पाई गई। हीरो मोटोकॉर्प ने भी ऐसा ही अनुभव बताया है। असल दुनिया के ये सबूत अलग-थलग किस्सों की तुलना में कहीं अधिक भरोसेमंद हैं।


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