
लड़की की इज्जत बचाने के लिए अकेले 40 लुटेरों से भिड़ गया,खुखरी से 3 को मार गिराया और 8 को किया घायल !
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
Vishnu Prasad Shrestha : बात 2 सितंबर 2010 की है जब मौर्य एक्सप्रेस ट्रेन रांची से गोरखपुर की ओर जा रही थी। ट्रेन में 35 वर्षीय विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ भी सवार थे, जो भारतीय सेना की 7/8 गोरखा राइफल्स में नायक रह चुके थे। वह सेना से रिटायर होकर अपने घर नेपाल लौट रहे थे।
रात के करीब 1 से 2 बजे के बीच ट्रेन अचानक घने जंगल के बीच रुक गई। यात्रियों को कुछ समझ आता, उससे पहले ही हथियारों से लैस लगभग 30 से 40 लुटेरे ट्रेन के डिब्बे में घुस आए। किसी के हाथ में चाकू था, किसी के हाथ में तलवार और किसी के पास देसी कट्टा।
लुटेरों ने यात्रियों को धमकाना शुरू कर दिया। वे महिलाओं के गहने, मोबाइल, पैसे और कीमती सामान लूटने लगे। विरोध करने वालों के साथ मारपीट की जा रही थी। पूरे डिब्बे में चीख-पुकार मच गई थी।
विष्णु प्रसाद ने भी अपना पर्स और मोबाइल लुटेरों को दे दिया। लेकिन तभी उनकी नजर एक 18 साल की लड़की पर पड़ी, जिसे कुछ लुटेरों ने घेर रखा था। लड़की के माता-पिता रोते हुए अपनी बेटी को छोड़ने की गुहार लगा रहे थे। लुटेरे लड़की को जबरदस्ती अपने साथ ले जाने की कोशिश कर रहे थे।
यह देखकर विष्णु प्रसाद से रहा नहीं गया। उन्होंने तुरंत अपनी खुखरी निकाली और लड़की को बचाने के लिए लुटेरों पर टूट पड़े।
एक तरफ अकेला गोरखा सैनिक और दूसरी तरफ लगभग 40 हथियारबंद लुटेरे ! लेकिन विष्णु ने पीछे हटने के बजाय मुकाबला करना चुना। उन्होंने अपनी खुखरी से लुटेरों पर हमला कर दिया। डिब्बे का गलियारा युद्ध का मैदान बन गया।
लुटेरों ने उन पर चाकुओं और तलवारों से हमला किया। इस दौरान विष्णु के बाएं हाथ में भी गंभीर चोट लगी और खून बहने लगा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
इस खूनी संघर्ष में उन्होंने 3 लुटेरों को मार गिराया और 8 से ज्यादा को घायल कर दिया। अकेले गोरखा सैनिक के इस साहस को देखकर बाकी लुटेरों के हौसले टूट गए। आखिरकार वे लूटा हुआ सामान लेकर ट्रेन से कूदकर भाग गए।
सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस लड़की को लुटेरे निशाना बना रहे थे, वह सुरक्षित बच गई। यात्रियों की जान और सामान की रक्षा करने वाले बिष्णु खुद गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। बाद में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया और उनके हाथ में कई टांके लगे।
उनकी बहादुरी के लिए उन्हें सेना मेडल और उत्तम जीवन रक्षा पदक से सम्मानित किया गया।
विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ ने उस रात साबित कर दिया कि एक सच्चा सैनिक कभी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता। भले ही वह सेना से रिटायर हो जाए, लेकिन उसके अंदर का सैनिक हमेशा जिंदा रहता है।
ऐसे वीर गोरखा सैनिक को दिल से सलाम ! जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना एक बेटी की रक्षा के लिए अकेले हथियारबंद लुटेरों का सामना किया।
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