
राजेश श्रीवास्तव
Gyanesh Kumar : विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पर विवाद और दो चुनाव आयुक्तों की तरफ से चुनाव आयोग की कार्यशैली पर आपत्ति जताए जाने की रिपोर्ट्स के बाद देशभर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया है। विपक्षी दलों से लेकर कॉकरोच जनता पार्टी जैसे संगठनों ने CEC के खिलाफ मोर्चा छेड़ दिया है और विरोध तेज करने के संकेत दिए हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता, संस्थागत जवाबदेही, वोटर लिस्ट से नाम कटने और विपक्षी गठबंधन की रणनीतिक चुनौतियों इस समय एक की जुबान पर है। पर सबसे दिलचस्प यह है कि जब विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमला बोलते हैं तो भाजपा क्यों जवाब देने लगती है, यह सवाल आम जनता को भी अब अखरने लगा है। हर दल की तरह भाजपा को भी बोलना चाहिए कि चुनाव आयोग सही ढंग से काम करे।
आखिर जो 13 करोड़ नाम कटे हैं, क्या उनमें से कोई भी भाजपा का मतदाता नहीं है, यह समझना होगा। भाजपा की चुनाव आयोग के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना ही सबसे बड़ी मुसीबत बन गया है। इसीलिए सबको लगता है कि चुनाव आयोग भाजपा के कहने पर ही सभी काम कर रहा है। इसी बीच भाजपा यह भी सवाल उठाती है कि आखिर एसआईआर पहली बार तो हो नहीं रहा है जो इतना बवाल है तो हमें यह समझना होगा कि क्या इसमें भी कोई सच्चाई है या सिर्फ खाता न बही, भाजपा जो कहे वही सही।
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अब समझते हैं सच्चाई क्या है। सच तो यह है कि पहले के SIR और अब हो रहे एसआईआर में बहुत अंतर है। एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (ADR) ने बिहार में SIR को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट के सामने 2००3 और अब की प्रक्रिया के बीच अंतर का मुद्दा उठाया था। ADR उन याचिकाकर्ताओं में शामिल है, जिन्होंने बिहार में एसआईआर को चुनौती दी है। संगठन ने अदालत में कहा कि निर्वाचन आयोग भले ही 2०25 के एसआईआर को 2००3 में हुए पुनरीक्षण पर आधारित बता रहा हो, लेकिन दोनों प्रक्रियाओं की गाइडलाइंस में काफ़ी अंतर हैं।
ADR के मुताबिक़, 2००3 की प्रक्रिया को 2०25 के SIR के लिए मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। एडीआर का कहना है कि 2००3 की गाइडलाइंस से पता चलता है कि पूरी इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया छह महीने से अधिक चली थी। तब मतदाता सूची के एकीकरण की प्रक्रिया जून 2००2 के अंत तक पूरी होनी थी, प्राइमरी वोटर लिस्ट की छपाई जुलाई में और घर-घर सत्यापन जुलाई से अगस्त तक चलना था। इसके बाद ड्राफ़्ट रोल तैयार करने के लिए क़रीब दो महीने दिए गए और अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की पुष्टि 6 जनवरी 2००3 को हुई।
इसके विपरीत, 2०25 का SIR महज तीन महीने में पूरा किया गया। 24 जून को इसकी घोषणा हुई, 25 जून से 26 जुलाई तक एन्यूमरेशन फ़ॉर्म जमा किए गए, 1 अगस्त को ड्राफ़्ट रोल प्रकाशित हुआ, 1 सितंबर तक आपत्तियां ली गईं और 3० सितंबर को फ़ाइनल रोल प्रकाशित कर दिया गया। 2०25 का SIR 3० सितंबर को पूरा हुआ, जबकि बिहार विधानसभा चुनाव 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में होने थे। इस तरह, उपलब्ध गाइडलाइंस और समय सीमा की तुलना से 2००3 और 2०25 की प्रक्रियाओं में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
यही नहीं, ADR के मुताबिक़, 2००3 के पुनरीक्षण में मतदाता सूची में नाम शामिल करने और मतदाताओं के डेटा को अपडेट करने की मुख्य जिम्मेदारी एन्यूमरेटर (जो डेटा इकट्ठा करते हैं) की थी। 2०25 के एसआईआर में यह जिम्मेदारी काफ़ी हद तक मतदाताओं पर डाल दी गई है। उन्हें खुद एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरकर जमा करना है और फ़ॉर्म जमा नहीं करने की स्थिति में उनका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सकता। यानि 2००3 की प्रक्रिया अब से काफ़ी अलग थी। 2००3 में किसी भी मतदाता से कोई एन्यूमरेशन फ़ॉर्म नहीं भरवाया गया था। उन दिनों चुनाव आयोग के स्थानीय प्रतिनिधि के बतौर बीएलओ की जगह एन्यूमरेटर हुआ करता था।
उसे निर्देश था कि वे घर-घर जाकर पुरानी मतदाता सूची में संशोधन करें। तब संशोधित सूची को नए सिरे से लिखा जाता था और उस पर परिवार के मुखिया के हस्ताक्षर करवाए जाते थे। सामान्य वोटर के लिए ना कोई फ़ॉर्म था, ना कोई समय सीमा और ना ही फ़ॉर्म ना भरने पर लिस्ट से अपने आप नाम कट जाने का डर। 2००3 की गाइडलाइंस के पैरा 12 का हवाला देते हुए एडीआर ने कहा कि उस समय एन्यूमरेटर को घर-घर जाकर मतदाताओं के डेटा को अपडेट करना था। वहीं, पैरा 15 के तहत एन्यूमरेटर को घरों की सूची, संबंधित क्षेत्र का नक्शा और प्राइमरी वोटर लिस्ट उपलब्ध कराई गई थी। उनके काम की निगरानी के लिए पर्यवेक्षकों की जिम्मेदारी तय की गई थी। उन्हें कम से कम 25 फ़ीसदी काम की रैंडम जांच भी करनी थी। पुरानी गाइडलाइन में साफ़ तौर पर लिखा था कि एन्यूमरेटर का काम किसी व्यक्ति की नागरिकता की जांच करना नहीं है। उन्होंने बताया कि उस समय नागरिकता का प्रमाण सिर्फ़ दो स्थितियों में मांगा जा सकता था। पहली स्थिति तब थी, जब किसी इलाके को राज्य सरकार ने ‘विदेशी बाहुल्य क्षेत्र’ घोषित किया हो।
ऐसे इलाके में अगर कोई नया व्यक्ति वोटर आई-कार्ड बनवाने आता था और उसके परिवार के किसी सदस्य का पहले से वोटिग का अधिकार नहीं था, तभी उसकी नागरिकता की जांच की जा सकती थी। दूसरी स्थिति तब थी, जब किसी व्यक्ति के खिलाफ़ लिखित शिकायत की जाती कि वह भारत का नागरिक नहीं है। ऐसी स्थिति में शिकायत करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होता था कि संबंधित व्यक्ति विदेशी है। इन दो स्थितियों के अलावा किसी व्यक्ति की नागरिकता की जांच नहीं की जाती थी और सिर्फ नागरिकता के आधार पर उसका नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता था। जबकि इस बार निर्वाचन आयोग ने विदेशी नागरिकों की पहचान करने की ज़िम्मेदारी खुद अपने हाथ में ले ली है। 2००3 के दिशा-निर्देशों में मौजूदा मतदाता सूची को आधार बनाकर घर-घर जाकर सत्यापन करने का प्रावधान था। एस समय वोटर कार्ड का ईपीआईसी नंबर और वोटर ID कार्ड दोनों को मान्य दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया गया था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
इसके अलावा, 2००3 में एसआईआर शुरू होने से पहले संबंधित क्षेत्र में घरों की सूची तैयार करने और उनका नक्शा बनाने का काम भी किया गया था। 2०25-26 की प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग ने वोटर आईडी कार्ड को उन 11 दस्तावेजों की सूची में शामिल नहीं किया, जिनके जरिए मतदाता अपनी पात्रता साबित कर सकते थे। वोट फ़ॉर डेमोक्रेसी और सिटिजन्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस के मुताबिक़, 2०25-26 की प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग ने वोटर आईडी कार्ड को उन 11 दस्तावेजों की सूची में शामिल नहीं किया, जिनके जरिए मतदाता अपनी पात्रता साबित कर सकते थे। 2००3 में सबसे दस्तावेज मांगा ही नहीं गया था, बल्कि कुछ लोगों से मांगा गया था। भाजपा के नेता भी कई मौकों पर कह चुके हैं कि एसआईआर जैसी प्रक्रिया कांग्रेस के शासनकाल में भी होती रही है । लिहाजा चुनाव आयोग का यह दावा झूठा है कि कि वह एसआईआर में 2००3 की गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को दोहरा रहा है।
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One thought on “ज्ञानेश सही हों या गलत, भाजपा क्यों करती दिख रही गलबहियां”
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