
Jagdalpur: छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और लोक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। इसी बस्तर को प्राचीन काल में दंडकारण्य के नाम से जोड़ा जाता है। कमरछठ यानी हलषष्ठी पर्व से जुड़ी एक लोक मान्यता के अनुसार, वनवास के दौरान माता सीता ने इसी दंडकारण्य क्षेत्र में अपने देवर लक्ष्मण की दीर्घायु और कुशलता की कामना करते हुए व्रत रखा था। मान्यता है कि पूजा के बाद उन्होंने जंगल में प्राकृतिक रूप से उगने वाले देवधान के चावल से तैयार प्रसाद ग्रहण किया था।
स्थानीय जानकारों और वैद्यराजों के बीच प्रचलित इस कथा के मुताबिक, भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास का लंबा समय दंडकारण्य क्षेत्र में बिताया था। उस दौरान लक्ष्मण भगवान राम और सीता की सुरक्षा के लिए लगातार प्रहरी की भूमिका निभाते थे। जंगल में मौजूद हिंसक जीवों और अन्य खतरों के कारण माता सीता को उनकी सुरक्षा की चिंता रहती थी।
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लक्ष्मण को पुत्र समान मानती थीं सीता
लोक कथा के अनुसार, माता सीता लक्ष्मण को अपने पुत्र के समान मानती थीं। उनकी सुरक्षा और दीर्घायु की कामना से उन्होंने भगवान शिव की आराधना करते हुए व्रत और पूजा की थी। पूजा में जंगल से प्राप्त होने वाले कंद-मूल, फल और देवधान का इस्तेमाल किया गया था।
मान्यता है कि समय के साथ यही परंपरा हलषष्ठी या कमरछठ व्रत के रूप में प्रसिद्ध हुई। इस पर्व पर महिलाएं संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए व्रत रखती हैं। व्रत से जुड़ी परंपराओं में ऐसी खाद्य वस्तुओं के उपयोग को महत्व दिया जाता है, जिनकी खेती हल चलाकर नहीं की गई हो।
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बस्तर के जंगलों में दुर्लभ है देवधान
स्थानीय जानकारी के मुताबिक, औषधीय गुणों वाला माना जाने वाला देवधान अब बेहद दुर्लभ हो चुका है। बस्तर क्षेत्र में इसके कोलेंग और माचकोट के जंगलों में पाए जाने की जानकारी सामने आती है। देवधान को लेकर स्थानीय समाज में कई मान्यताएं और पारंपरिक ज्ञान आज भी मौजूद हैं।
कहा जाता है कि समय के साथ जंगलों में देवधान की उपलब्धता कम होने लगी। इसके चलते हलषष्ठी व्रत के दौरान कई स्थानों पर महिलाएं दूसरे जंगली धान पसहर का उपयोग करने लगीं। हालांकि, देवधान को लेकर स्थानीय स्तर पर धार्मिक और औषधीय दोनों तरह की मान्यताएं बनी हुई हैं।
देवधान पर चल रहा वैज्ञानिक शोध
देवधान की विशेषताओं को समझने के लिए इस पारंपरिक धान पर वैज्ञानिक स्तर पर भी अध्ययन किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के माध्यम से मेडिसिनल राइस रिसर्च सेंटर, दिल्ली और लखनऊ में देवधान पर शोध जारी है। बताया जाता है कि इस धान पर पिछले करीब चार वर्षों से अध्ययन किया जा रहा है।
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