
कभी कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड जैसे सबसे बड़े विवाद की सुर्खियों में रहे अमर मणि त्रिपाठी
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
Uttar Pradesh : के महाराजगंज की जमीन से निकले पूर्वांचल के सबसे बड़े बाहुबली नेता अमर मणि त्रिपाठी का जन्म 14 जुलाई सन् 1956 में हुआ। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने राजनीति में ऐसा सफर तय किया, जहां हर कदम के साथ उनका कद भी बढ़ता गया और चर्चा भी।
1980 के दशक में उन्होंने स्थानीय राजनीति से शुरुआत की और 1989 में पहली बार 190 लक्ष्मीपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने और विधानसभा लखनऊ पहुंचे। इसके बाद 1991, 1993 को छोड़कर 1996, 2002 और 2007 में लगातार जीत दर्ज कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनका जनाधार मजबूत है और क्षेत्र में उनकी पकड़ गहरी है। इस तरह विधानसभा चुनाव में उन्होंने पहली हैट्रिक मारी थी।
उनकी राजनीति की सबसे अलग बात रही – दल बदलते हुए भी सत्ता के केंद्र में बने रहना। कांग्रेस, जनता दल और फिर बहुजन समाज पार्टी के साथ जुड़कर उन्होंने हर दौर में खुद को प्रासंगिक बनाए रखा, जो उनकी रणनीतिक समझ को दिखाता है।
1997 में कल्याण सिंह सरकार में मंत्री बनकर उन्होंने प्रशासनिक स्तर पर अपनी पकड़ दिखाई। इसके बाद 2001 में राजनाथ सिंह सरकार में भी मंत्री बने और उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक मजबूत चेहरा बनकर उभरे।
2002 में एक बार फिर विधायक बने और इस बार मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद संभाला। यह उनका राजनीतिक पीक माना जाता है, जब पूर्वांचल की राजनीति में उनका प्रभाव सबसे ज्यादा था।
लेकिन 9 मई 2003 को कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड ने उनके पूरे कैरियर को तगड़ा झटका दे दिया। इस मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उन्हें सजा हुई और उनका सक्रिय राजनीतिक जीवन लगभग रुक गया।
फिर भी राजनीति से उनका नाम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। उनके परिवार ने इस विरासत को आगे बढ़ाया और उनके बेटे अमन मणि त्रिपाठी साल 2017 विधायक बने जिससे उनका प्रभाव बना रहा।
अमर मणि त्रिपाठी का सफर सिर्फ जीत और सत्ता की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि राजनीति में एक फैसला या एक घटना किस तरह पूरे कैरियर की दिशा बदल सकती है।
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