बस्तर का सबसे पुराना शिवधाम है पाथरी

Pathri Shivdham

यहां जंगल में हर टीला के नीचे मिलते हैं शिवलिंग

अब तक हो पाई है सिर्फ नौ टीलों की खुदाई

हेमंत कश्यप

Pathri Shivdham Bastar: वनांचल बस्तर के पाथरी गांव में सैकड़ों टीले है। जिस टीले की खुदाई की जाती है। एक शिवलिंग जरूर मिलता है। भारत की सबसे विलक्षण और दुर्लभ जलहरी मध्य खड़ी मां पार्वती की प्रतिमा पाथरी में ही मिली है। यह प्रतिमा अपने आप में अद्वितीय और दर्शनीय है। इस दुर्लभ प्रतिमा को जिला पुरातत्व संग्रहालय जगदलपुर में संरक्षित किया गया है।

5 वीं शताब्दी से 13 वीं शताब्दी के मध्य तक बस्तर में नागवंशी राजाओं का साम्राज्य रहा है। यह शैव उपासक थे, इसलिए बस्तर में दो दर्जन से अधिक स्थानों में शिव, गणेश आदि मन्दिरों का निर्माण करवाए हैं, इसलिए बस्तर में उमा-महेश्वर के अलावा शिवलिंग, नंदीराज, नाग, गणेश, कार्तिकय, गंगा की मूर्तियां सर्वाधिक है।

महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल

छिंदक नागवंशी युग में बस्तर में सर्वाधिक शिवधाम का निर्माण कराया गया। यहां के पुरातात्विक स्थलों में करपावंड के पास स्थित ग्राम पाथरी काफी महत्वपूर्ण है। जगदलपुर से 62 किमी दूर पाथरी नामक गांव है। इस गांव को शिवगढ़ कहा जाता है।

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यहां के जंगल में 21 टीले हैं। इनमें से नौ टीलों की खुदाई अब तक हो पाई है। इनसे शिव परिवार की कई प्रतिमाएं मिली हैं। यहीं के एक टीले से ही जलहरी के मध्य खड़ी माता पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा भी है। खुदाई के दौरान मिली इस प्रतिमा को वर्ष 2003 में जिला पुरातत्व संग्रहालय जगदलपुर में लाकर संरक्षित किया गया है।

अनभिज्ञ है बस्तरवासी ही

22 साल पहले पाथरी जंगल से लाई गई यह प्रतिमा जगदलपुर में सिरहासार भवन के समीप जिला पुरातत्व संग्रहालय में भी उपेक्षित पड़ी है। देश की एकमात्र जलहरी युक्त पार्वती मूर्ति होने के बावजूद इसकी महत्ता से लोगों को रूबरू कराने का प्रयास विभाग ने नहीं किया। इस विलक्षण प्रतिमा के संदर्भ में पुरातत्व विभाग द्वारा कोई विशेष फोल्डर जारी नहीं किया गया है। इस दुर्लभ मूर्ति के बारे में जो कुछ लोग जानते है। वे अपने परिचितों को जलहरी मध्य खड़ी माता पार्वती का दर्शन कराने संग्रहालय जरूर ले जाते हैं।

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