
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
Nepal भारत के पांच प्रदेशों में हुए चुनाव परिणाम का असर नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टियों पर पड़ा है। पश्चिम बंगाल जो कभी कम्युनिस्ट का न केवल गढ़ था, वहां लंबे समय तक कम्युनिस्ट की सरकार रही है, इस चुनाव में तो उसका नामलेवा तक कोई नहीं बचा। जबकि बंगाल में लगातार 12 वर्षों तक उसकी सरकार रही है। त्रिपुरा में कम्युनिस्ट अब नहीं है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से उसका सफाया हो गया। ले देकर एक केरलम था, जहां कम्युनिस्ट की सरकार बची हुई थी। इस चुनाव में यहां से भी उसका सफाया हो गया।
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भारत के इन चुनाव परिणामों से नेपाल के कम्युनिस्ट दलों में बौखलाहट स्वाभाविक है, क्योंकि किसी न किसी रूप में नेपाली कम्युनिस्ट दलों को भारत के कम्युनिस्ट पार्टियों से खाद पानी मिलता रहता था। नेपाल के कम्युनिस्ट दलों की चिंता यह है कि एक तो नेपाल में भी वे कमजोर हो गए दूसरे उनकी हौसला अफजाई करने वाले भारत के कम्युनिस्ट दल भी हासिए पर आ गए। भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों का हश्र देख नेपाल के प्रमुख कम्युनिस्ट नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड नेपाल में कम्युनिस्ट विचारधारा को बचाने की कोशिशों में जुट गए हैं। उन्होंने टुकड़ों में बंटे कम्युनिस्ट दलों को एक मंच पर आने की जरूरत बताते हुए कहा कि दुनिया से कम्युनिस्ट विचारधारा को खत्म करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय साजिश रची जा रही है। इसे समझना होगा वरना हम सब मारे जाएंगे।
पिछले दिनों काठमांडू में 26 वे निर्मल लामा दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में अपने विचार रखते हुए प्रचंड ने कहा कि देश के भीतरी और बाहरी प्रतिक्रिया वादी ताकतें नेपाल के कम्युनिस्ट आंदोलन को नेस्तनाबूद करने की साजिश में लगी हुई है। ऐसा कहकर प्रचंड ने नेपाल की राजनीति में एक नई बहस की शुरुआत कर दी है। प्रचंड ने भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन कहा कि यदि नेपाल के कम्युनिस्ट दलों ने इस वास्तविकता को स्वीकार कर आत्ममंथन नहीं किया, तो यह श्रमिक वर्ग और उनकी आकांक्षाओं के साथ अन्याय होगा। प्रचंड ने श्रमिक वर्ग का जिक्र इसलिए किया ताकि इसका संदेश विश्व स्तरीय हो। उन्होंने कहा, “कम्युनिस्ट आंदोलन को नेपाल से समाप्त करने के लिए देशी-विदेशी प्रतिक्रियावादी शक्तियां बड़े डिजाइन के तहत काम कर रही हैं। यदि हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते, तो हम जान-बूझकर या अनजाने में श्रमजीवी वर्ग के साथ विश्वासघात करेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की मांग है कि सभी कम्युनिस्ट शक्तियां एकजुट होकर नए ढंग से आंदोलन को आगे बढ़ाएं।
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नेपाल के एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने क्या खूब कहा कि बालेन शाह नेपाल को एक नगर-निगम की भांति चला रहे हैं। नेपाल में लगभग गुम हो गई कम्युनिस्ट पार्टियां क्या फिर वापसी कर पाएंगी, इस बाबत कोई दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन नेपाल की जनता के मूड का भी कोई भरोसा नहीं। जब वह नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को एक झटके में खारिज कर सकती तो बालेन शाह क्या हैं? बतौर प्रधानमंत्री जब बालेन के अब तक के कार्यकाल की समीक्षा करें, तो इसमें आम जनता के लिए कुछ खास नहीं है। सुकुंबासी कहे जाने वाले एक बड़े वर्ग के घरों को उजाड़ कर उन्हें नाराज कर दिया गया है। ऐसे लोगों की आबादी करीब 20 लाख है। ये लोग कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाली कांग्रेस के वोटर हुआ करते थे। सुकुंबासी परिवारों का कोई न कोई सदस्य अमेरिका और अन्य देशों में रोजगार के सिलसिले में रहता है। इन सदस्यों के कहने पर इस बार सुकुंवासियों का वोट राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को झूम कर मिला। फिलहाल कम समय में ही इस समुदाय का मोह बालेन शाह सरकार से भंग हो गया, ऐसा जान पड़ रहा है। नेपाल के आर्थिक समृद्धि में मारवाड़ी समाज का भी योगदान कम नहीं है। इससे पूरे नेपाल के मारवाड़ी समुदाय सरकार से खफा है। खरीदारी पर सख्त प्रतिबंध से नेपाल के तराई वासी भी बालेन सरकार से नाराज हो गए।
बीते चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवारों को तराईवासियों ने भर-भर कर वोट दिया था। नेपाल उच्च न्यायालय ने बालेन सरकार के इस फैसले पर रोक लगा दी है, लेकिन राजनीतिक रूप से बालेन शाह का नुकसान तो हुआ ही। बालेन सरकार के इन फैसलों का विरोध नेपाली कांग्रेस ने भी किया और कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी। बालेन सरकार के हर उस कदम पर विपक्ष खासकर कम्युनिस्ट पार्टियों की नजर है, जो जनता के माफिक न हो। नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टियों की नजर बालेन सरकार के विदेश नीति पर भी और राजदूतों की संभावित नियुक्तियों पर भी टिकी हुई है। सरकार कई अंतर्राष्ट्रीय विषयों को लेकर कंफ्यूज दिख रही है। नेपाल राजनीति को अंदर तक समझने वाले विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियां यदि एक मंच पर आने में कामयाब हो गई तो अभी भले नहीं, आने वाले दिनों में बालेन सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती पेश कर पाने में सफल जरूर होंगी।
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One thought on “बालेन सरकार के हर फैसले पर नेपाल वासियों की है पैनी नजर”
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