प्रेस फ्रीडम के बहाने ओस्लो में कैसे बना भारत की साख का वैश्विक तमाशा

Press Freedom
अजय कुमार                             
अजय कुमार

Press Freedom नॉर्वे सिर्फ अपने ठंडे, बर्फीले समुद्र तटों और मछलियों के निर्यात के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि उसकी एक सालाना वैश्विक आदत भी है पूरी दुनिया की क्लास लेना और यह बताना कि तुम सब लोकतंत्र का ककहरा गलत पढ़ रहे हो। इसे कूटनीतिक हलकों में ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ कहा जाता है। इस फेहरिस्त में भारत की रैंकिंग का हाल बहुत अच्छा नहीं रहा है और हम 157वें पायदान पर खड़े दिखते हैं। लेकिन इस बार ओस्लो से जो कहानी आई, वह सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी नहीं थी, बल्कि उसमें एक सनकी कूटनीति, सोशल मीडिया का उथलापन और हमारी अपनी पुरानी ‘गौरववादी’ ग्रंथियों का एक अजीब घालमेल था। पूरी कहानी की मुख्य किरदार बनीं सुनहरे बालों वाली पत्रकार हेल लिंग, जो वहां के एक ऐसे अखबार से जुड़ी हैं जिसे खुद नॉर्वे के बहुसंख्यक लोगों ने शायद ही कभी पढ़ा हो। वह एक ऐसे देश के मुखिया के सामने तीखे सुर में चिल्ला रही थीं, जहां के भूगोल और राजनीति का उन्हें बहुत सतही अंदाजा था।

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यह पूरा वाकया दोनों प्रधानमंत्रियों की एक संयुक्त मीडिया ब्रीफिंग के दौरान हुआ, जिसे कूटनीति की भाषा में ‘फोटो-ऑप’ कहा जाता है। दुनिया का हर मंझा हुआ पत्रकार जानता है कि यह जगह गंभीर या खोजी सवाल-जवाब के लिए नहीं, बल्कि आपसी समझौतों पर मुस्कुराते हुए हाथ मिलाने का एक कूटनीतिक थिएटर होती है। मगर हेल लिंग ने इसे अपने लिए ‘कंटेंट’ बनाने का सही मौका समझा। जब प्रधानमंत्री कमरे से बाहर जाने लगे, तो उन्होंने चिल्लाते हुए प्रेस की आजादी पर तंज कसा और फिर इतने पर ही नहीं थमीं, बल्कि लिफ्ट तक उनका पीछा किया। बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर इस बहाने भारत को कटघरे में खड़ा करते हुए कई पोस्ट दाग दिए। सामान्य स्थिति में इसे एक उतावली पत्रकार की बचकानी हरकत मानकर टाला जा सकता था, लेकिन हमारे राजनयिक तंत्र ने यहीं पर बड़ी नासमझी कर दी।

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भारतीय दूतावास ने अति-आत्मविश्वास में आकर उसी शाम हेल लिंग को एक औपचारिक प्रेस ब्रीफिंग में आमंत्रित कर लिया। लगा कि भारतीय पक्ष बड़ी दिलदारी और लोकतांत्रिक बड़प्पन दिखाना चाहता है, लेकिन वह कदम कूटनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हुआ। जब उस ब्रीफिंग में पत्रकार ने तीखे लहजे में पूछा कि दुनिया भारत पर भरोसा क्यों करे, तो हमारे विदेश मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों ने सीधे और तार्किक जवाब देने के बजाय एक लंबा-चौड़ा ऐतिहासिक व्याख्यान शुरू कर दिया। जवाबों में अचानक सरस्वती नदी की प्राचीन सभ्यता, शतरंज के खेल का आविष्कार, योग की महत्ता और कोरोना काल की वैक्सीन डिप्लोमेसी का जिक्र होने लगा। इसे कूटनीति नहीं कहते; यह तो ऐसा लगा जैसे कोई विदेश मंत्रालय किसी अंतरराष्ट्रीय प्रेस वार्ता को प्राचीन भारत के इतिहास पर स्कूल का कोई प्रोजेक्ट समझने की भूल कर बैठा हो। जब आप तीखे कूटनीतिक सवालों के जवाब में ‘प्राचीन गौरवासन’ का सहारा लेते हैं, तो आप एक ही समय में कमजोर और बड़बोले, दोनों नजर आने लगते हैं।

राजनयिकों के दिमाग में यह साधारण सी बात नहीं आई कि इस तीखेपन का रुख मोड़ा जा सकता था। उस पत्रकार से पूछा जाना चाहिए था कि अगर भारत भरोसे के लायक नहीं है, तो आपकी अपनी नॉर्वेजियन सरकार ठीक उसी समय हमारे साथ अरबों डॉलर की व्यापारिक डील क्यों साइन कर रही थी? वहां के राजा ने भारतीय प्रधानमंत्री से हाथ क्यों मिलाया और वहां की संसद ने इन समझौतों पर सहमति क्यों जताई? मगर कड़े और हुआ कि माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया और पत्रकार एक बार गुस्से में कमरे से बाहर भी संक्षिप्त कूटनीतिक जवाब की जगह इतिहास का पाठ पढ़ाया गया, जिसका नतीजा यह चली गईं। इस कूटनीतिक रायते को और फैलाने का काम हमारे घरेलू इंटरनेट और सोशल मीडिया ब्रिगेड ने किया।

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सोशल मीडिया पर यूजर्स दो धड़ों में बंट गए। एक वर्ग ने हेल लिंग के पुराने चीनी झुकाव वाले लेखों और अमेरिकी प्रशासन की आलोचनाओं को ढूंढ निकाला और उन्हें ‘विदेशी एजेंट’ या ‘चीनी प्रॉक्सी’ करार दिया। उनकी चुप्पी और अचानक एक्स पर आए ‘ब्लू टिक’ को एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश के सबूत के तौर पर पेश किया गया। हालांकि पत्रकार ने बाद में सफाई दी कि उन्होंने सिर्फ अपनी एक स्पेलिंग मिस्टेक को सुधारने के लिए पैसे देकर वह सब्सक्रिप्शन लिया था और वह इंस्टाग्राम पर ज्यादा एक्टिव रहती हैं। इंटरनेट ने इस सफाई को दरकिनार कर दिया, लेकिन इस पूरी ट्रोलिंग का उलटा असर यह हुआ कि सोमवार तक महज 800 फॉलोअर्स वाली एक साधारण कमेंटेटर अचानक 17 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘प्रेस फ्रीडम’ का नया चेहरा बन गई।

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भारतीय राजनीति ने भी इस बहती गंगा में हाथ धोने में देर नहीं लगाई। विपक्ष के शीर्ष नेताओं ने इस घटना के वीडियो को साझा करते हुए सरकार की छवि पर सवाल उठाए और पूछा कि जब प्रधानमंत्री दुनिया के सामने सवालों से बचते हैं, तो देश की साख का क्या होता है। हालांकि, विपक्ष का यह तर्क भी थोड़ा कमजोर था, क्योंकि दुनिया के किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री किसी विदेशी नेता के साथ जॉइंट फोटो सेशन के शोर में इस तरह चिल्लाकर पूछे गए असंगत सवालों का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं होता। असली समस्या प्रधानमंत्री का उस शोर में जवाब न देना नहीं था; असली समस्या भारत के भीतर पिछले 11 सालों से बनी वह व्यवस्था है जहां कोई औपचारिक, बिना स्क्रिप्ट वाली ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती जहां मीडिया खुलकर कोई भी सवाल पूछ सके। हमारे पास सैकड़ों टीवी चैनल जरूर हैं, लेकिन उनके पास पूछने के लिए सीधे सवाल नहीं हैं। इसी चुप्पी और कूटनीतिक तंत्र की बड़बोली घबराहट ने विदेशी मीडिया को भारत पर उंगली उठाने का एक आसान मौका दे दिया।

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तमाशा यहीं खत्म नहीं हुआ। इस पूरे विवाद के बाद नॉर्वे के एक प्रमुख अखबार ने नस्लवाद की सारी हदें पार करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री का एक बेहद आपत्तिजनक कार्टून छाप दिया, जिसमें भारत को फिर से ‘सांप-सपेरों’ के पुराने औपनिवेशिक चश्मे से देखने की कुंठा साफ नजर आई। खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का मसीहा बताने वाले देश के मीडिया एथिक्स वहां आकर दम तोड़ गए। जो देश तकनीक, डिजिटल यूपीआई क्रांति और जीवन रक्षक दवाओं के लिए भारत पर निर्भर है, उसका मीडिया आज भी 140 करोड़ की आबादी वाले देश को उसी पुरानी सामंती सोच से आंक रहा है। लब्बोलुआब यह है कि न तो फोटो-ऑप के दौरान उस विदेशी पत्रकार का वह ड्रामा पत्रकारिता था, न हमारी सभ्यता वाला वह लंबा व्याख्यान कूटनीति था, और न ही इंटरनेट की वह अंधी ट्रोलिंग देश का सम्मान बचा रही थी। इस पूरे प्रकरण में सबने सिर्फ अपने हिस्से की राजनीतिक और डिजिटल रोटियां सेंकीं, और जो सच कड़वे सवाल के रूप में लिफ्ट के बंद दरवाजों के पीछे छूट गया था, वह आज भी वहीं खड़ा है।

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