विपक्षी एकता की नई रणनीति में राहुल और अखिलेश बने केंद्र

New Strategy
अजय कुमार                             
अजय कुमार

New Strategy 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जब देश ने विपक्षी गोलबंदी का एक महा-प्रयोग देखा था, तब उसका नाम था ‘इंडिया गठबंधन’ ।

यह प्रयोग बिना संदेह बड़ा था। 26 प्रमुख विपक्षी दलों को एक छत के नीचे लाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। लेकिन इसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि इसे कभी कोई सर्वमान्य चेहरा या नेतृत्व नहीं मिल सका। ‘विपक्ष का दूल्हा कौन बनेगा?’

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यह अंतहीन कलह गठबंधन की बुनियाद को ही खोखला करती रही। नीतीश कुमार को संयोजक बनाया जाए तो ममता बनर्जी वीटो लगा देती हैं, राहुल गांधी के नाम पर सहमति बनती ही नहीं। नतीजा यह निकला कि बिखरा हुआ विपक्ष अपने-अपने राज्यों के किलों में सिमटकर रह गया, जिन्हें BJP एक-एक करके ढहा रही है। आज जैसे-जैसे विपक्षी धुरंधर बारी-बारी चुनावी बिसात पर धराशायी हो रहे हैं, राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस का ‘डिफॉल्ट’ दावा एक बार फिर पूरी ताकत से जिंदा हो गया है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का हालिया बयान इसी नैरेटिव की बानगी है। उन्होंने राहुल गांधी को 2029 का ‘प्राइम-चैलेंजर’ घोषित कर दिया है और कहा कि कांग्रेस सबसे पहले अपने सहयोगियों से इस बात पर सहमति बनाएगी। रेवंत की थ्योरी दिलचस्प है। वे लेफ्ट और क्षेत्रीय क्षत्रपों की हार में कांग्रेस की जीत देख रहे हैं। विडंबना यह है कि ये वही दल हैं जो कल तक ‘इंडिया गठबंधन’ में कांग्रेस के साझेदार थे और आज अपने-अपने राज्यों में BJP के चक्रव्यूह में फंसकर दम तोड़ रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है। लोकसभा में टीएमसी ने किला बचा लिया था, लेकिन विधानसभा चुनाव की चौखट पर आते ही BJP की सोशल इंजीनियरिंग के सामने उनकी सारी रणनीतियां धरी की धरी रह गईं। BJP ने यहां 206 सीटें जीतीं, जबकि टीएमसी 100 से नीचे लुढ़क गई। ममता बनर्जी खुद भवानीपुर सीट से 15 हजार से ज्यादा वोटों से हार गईं। हाशिए पर खड़ी कांग्रेस को भले वहां दो सीटें मिलीं, लेकिन उसे इस बात का सुकून है कि बंगाल में अब टीएमसी का एकाधिकार खत्म हो चुका है।

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दिल्ली और पंजाब से कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने वाले अरविंद केजरीवाल का सपना ‘तीसरा विकल्प’ बनने का था।  फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में BJP ने 27 साल बाद सत्ता में वापसी करते हुए आम आदमी पार्टी को करारी शिकस्त दी। 70 सदस्यीय विधानसभा में BJP ने 48 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि आप 22 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस आज इस गणित पर खुश हो सकती है कि जो भी जमीन आप खोएगी, वह आखिरकार कांग्रेस की झोली में ही गिरेगी। नीतीश कुमार ने 2024 से पहले विपक्ष को एक धागे में पिरोने के लिए देशव्यापी दौरे किए थे, लेकिन केंद्रीय राजनीति में उनका नेतृत्व स्थापित होने से पहले ही सहयोगियों के अविश्वास ने उनकी जमीन खिसका दी। 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला और BJP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

अब रह गई केवल एक दीवार  अखिलेश यादव। वे राहुल गांधी के लिए एक जटिल पहेली हैं। चुनौती इसलिए हैं क्योंकि वे देश के सबसे बड़े सियासी सूबे, उत्तर प्रदेश, के निर्विवाद नायक हैं। यह वही यूपी है जिसने 2024 में BJP के रथ को रोककर उसे बहुमत से दूर कर दिया था। अखिलेश आज विपक्ष के इकलौते ऐसे नेता हैं जिनके पास कोर ‘मुस्लिम-यादव’ वोटबैंक की अचूक ताकत है, एक मजबूत संगठन है और वे सीधे योगी-मोदी की जोड़ी की आंखों में आंखें डालकर लड़ रहे हैं। 2024 में कांग्रेस को यूपी में जो भी संजीवनी मिली, उसका पूरा श्रेय अखिलेश के खाते में जाता है।

इस कड़वे सच के बावजूद, राहुल गांधी के लिए राहत की बात यह है कि समाजवादी पार्टी ने उनके साथ कभी वह ‘अहंकार और तिरस्कार’ का रवैया नहीं अपनाया, जो ममता बनर्जी ने बंगाल में दिखाया। अखिलेश खुद यूपी की सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए वे दिल्ली की रेस के लिए कांग्रेस से फिलहाल कोई नया मोर्चा नहीं खोलना चाहते। असल परीक्षा 2027 में होगी। यदि अखिलेश 2027 में यूपी फतह कर लेते हैं, तो वे राष्ट्रीय क्षितिज पर राहुल गांधी से कहीं बड़े कद के नेता बनकर उभरेंगे। वे 2027 की तैयारी कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि यूपी में अगले वर्ष समाजवादी सरकार बनने जा रही है। लेकिन यदि वे नाकाम रहे, तो राहुल गांधी 2029 के लिए ‘निर्विरोध चैलेंजर’ बन जाएंगे।

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क्षेत्रीय दलों की त्रासदी यह है कि उनकी प्रासंगिकता सिर्फ उनके राज्य की सत्ता से है, जबकि कांग्रेस के लिए ‘ब्रांड राहुल’ राज्यों की हार-जीत के नफे-नुकसान से बहुत ऊपर है। 2024 में 99 सीटें जीतकर कांग्रेस ने ऐसा जश्न मनाया था, मानो देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने पुराने वैभव में लौट आई हो। लेकिन यह भ्रम जल्द ही टूट गया। हरियाणा में जीत का हलवा तैयार था, पर कांग्रेस की आपसी गुटबाजी और BJP की माइक्रो-प्लानिंग ने बाजी पलट दी। इसके बाद पराजय का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया। महाराष्ट्र और बिहार में कांग्रेस सबसे निचले पायदान पर खिसक गई। गनीमत बस इतनी रही कि उसके मजबूत सहयोगी राजद, उद्धव शिवसेना और शरद पवार की NCP भी खुद को बचा नहीं पाए।

तमिलनाडु में जब डीएमके का जहाज डूबने लगा, तो चतुर कांग्रेस ने समय रहते पाला बदलकर पांच विधायकों के साथ सत्ता के नए जहाज पर छलांग लगा दी। हाल ही में डीएमके ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने की घोषणा की है और लोकसभा में अलग बैठने की मांग की है। डीएमके और कांग्रेस का 20 साल पुराना रिश्ता पूरी तरह खत्म हो गया। पूरी तस्वीर का सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी पहलू यही है कि देशभर में स्थितियां कांग्रेस के अनुकूल हो रही हैं, लेकिन इस खेल में कांग्रेस का अपना कोई पराक्रम नहीं है।

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मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी क्षेत्रीय दलों और वामपंथ के जिस सफाए पर संतोष जता रहे हैं, वह जमीन कांग्रेस ने नहीं, बल्कि BJP ने जीती है। बिहार में नीतीश, बंगाल में ममता, दिल्ली में केजरीवाल और अगर स्थितियां ऐसी ही रहीं, तो 2027 में उत्तर प्रदेश में अखिलेश BJP एक-एक करके राहुल के सभी आंतरिक प्रतिद्वंदियों को रास्ते से हटा रही है। लब्बोलुआब यह है कि यदि राहुल गांधी की उम्मीदें अपने संगठन की ताकत से ज्यादा BJP की आक्रामक विस्तारवादी नीति पर टिकी हैं, तो यह बहुत खतरनाक है। राहुल गांधी की राह के कांटे खुद PM  मोदी ही दूर कर रहे हैं। यानी राहुल गांधी को विपक्ष का इकलौता सुल्तान बनाने का सेहरा, अनजाने में ही सही, BJP के सिर ही सजेगा। विपक्ष का भविष्य अब अखिलेश यादव और 2027 के यूपी चुनाव पर टिका है  यही राजनीति का चक्रव्यूह है।

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