आय और लाभ के लिए मजबूत करें जन्मकुंडली में ग्यारहवां भाव

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आचार्य डॉ धनंजय मणि त्रिपाठी

  • ग्यारहवां भाव : जो तय करता है कि जातक के जीवन में किस तरीके से और कितना धन आएगा,

ज्योतिष में ग्यारहवां भाव केवल लाभ का नहीं बल्कि आपकी प्राप्ति का सबसे संवेदनशील बिंदु है। आम तौर पर कुंडली देखते समय हम राशि स्वामी पर अटक जाते हैं जैसे ग्यारहवें में मकर राशि देखी तो मान लिया कि शनि धन देगा, लेकिन सूक्ष्म ज्योतिष का अनुभव यह कहता है कि राशि तो केवल ऊपर का आवरण है असली प्राण उस नक्षत्र में बसता है जिसके ऊपर ग्यारहवां भाव उदय हो रहा है। ग्यारहवें भाव का जो आरंभ बिंदु है वह जिस नक्षत्र में पड़ता है वही तय करता है कि आपके जीवन में धन किस रास्ते से, किस रूप में और कितनी सरलता या कठिनाई से आएगा। यह नक्षत्र ही आपके धन का सोर्स होगा ​इसे देखने का तरीका बहुत बारीक है। आप अपनी भाव चलित कुंडली उठाइए और देखिये कि 11वें भाव का आरंभ विंदू किस डिग्री पर है।

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मान लीजिये 11वां भाव 18 डिग्री पर शुरू हो रहा है तो पंचांग में देखिये कि उस राशि में 18 डिग्री पर कौन सा नक्षत्र है। बस वही नक्षत्र स्वामी और उसका स्वभाव आपकी आय का असली मालिक होगा। ​अब इसके गहरे अर्थ को समझिये। यदि वहां केतु के नक्षत्र (अश्विनी, मघा, मूल) का अधिकार है तो यह मान लीजिये कि सीधा-साधा व्यापार या नौकरी आपको संतुष्टि और बड़ा धन नहीं देगी। केतु ध्वजा भी है और मोक्ष भी इसलिए यहाँ धन तब आता है जब आप किसी जड़ पर काम करते हैं चाहे वह प्राचीन विद्या हो, कोडिंग की गहराई हो या रिसर्च हो। यहाँ पैसा भीड़ से हटकर एकांत में किए गए काम से बनता है। वहीं अगर शुक्र या चंद्रमा के नक्षत्र (भरणी, रोहिणी, श्रवण आदि) वहां बैठे हैं तो धन का संबंध लोग और कला से है। यहाँ रूखी-सूखी मेहनत काम नहीं आती। आपके काम में लोगों की सेवा, खान-पान, वस्त्र, या किसी भी प्रकार का आकर्षण होना अनिवार्य है। ऐसे जातक जब तक अपने काम में सौंदर्य या जन-संपर्क नहीं जोड़ते तब तक बड़ी आय नहीं होती।

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​बात अगर सूर्य और मंगल के नक्षत्रों (कृत्तिका, मृगशिरा, चित्रा आदि) की करें तो यह ऊर्जा स्वाभिमान और तकनीक की है। अनुभव बताता है कि ऐसे जातक अगर किसी की जी-हुजूरी में लग जाएं तो आय सीमित हो जाती है। 11वें भाव में यह नक्षत्र मांग करते हैं कि आप कमान अपने हाथ में लें। चाहे आप ठेकेदारी करें, ज़मीन का काम करें या प्रशासन में हों धन आपके रुतबे और आपकी भागदौड़ के अनुपात में ही आएगा। यहाँ धन बैठे-बिठाए नहीं, पसीने की चमक से आता है। इसके विपरीत यदि वहां गुरु या बुध का नक्षत्र (पुनर्वसु, विशाखा, अश्लेषा आदि) है तो आपकी सबसे बड़ी पूंजी आपकी जुबान और आपकी बुद्धि है। यहाँ शारीरिक मेहनत मज़दूरी बन जाती है लेकिन सलाह, व्यापार और शिक्षा कुबेर का द्वार खोलती है। आप जितना सीखेंगे और सिखाएंगे धन का प्रवाह उतना ही वेगवान होगा।

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​अंत में अगर शनि या राहु का प्रभाव (पुष्य, स्वाति, शतभिषा आदि) वहां है तो मामला थोड़ा पेचीदा लेकिन बड़ा होता है। शनि का नक्षत्र मांग करता है धैर्य और संरचना की। यहाँ जवानी में पैसा नहीं टिकता लेकिन जैसे-जैसे बाल सफेद होते हैं जातक साम्राज्य खड़ा कर देता है बशर्ते वह काम निर्माण, लोहे या जनता से जुड़ा हो। राहु का नक्षत्र है तो समझिये धन किसी विदेशी विचार या आधुनिक तकनीक (जैसे इंटरनेट, शेयर बाज़ार की बारीकियां) में छुपा है। कुल मिलाकर ​सार यह है कि आप केवल काम मत कीजिये अपने 11वें भाव के नक्षत्र के नेचर को अपने काम में उतार लीजिये। जिस दिन आपका कर्म उस नक्षत्र के स्वभाव के साथ एक लय में आ जाएगा उस दिन से धन उपार्जन के लिए संघर्ष समाप्त हो जाएगा और वह सहज रूप से जीवन में प्रवाहित होने लगेगा।

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