
Religious Traditions of Bastar : बस्तर की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता और जनजातीय संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की धार्मिक आस्थाएं भी अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण पूरे देश में अलग स्थान रखती हैं। बस्तर के वनांचल में भगवान शिव और शक्ति की आराधना ग्रामदेव के रूप में सदियों से होती आ रही है। यहां के आदिवासी समाज ने शिव और शक्ति को स्थानीय संस्कृति और लोकजीवन के साथ इस तरह आत्मसात किया है कि वे अलग-अलग नामों और स्वरूपों में आज भी गांव-गांव पूजे जाते हैं।
बस्तर के वनवासी समाज में भगवान शिव को भैरम और भंगाराम जैसे नामों से जाना जाता है। भैरम के भी अनेक स्वरूप प्रचलित हैं, जिनमें पाट भैरम, घाट भैरम, जटा भैरम, लिंगा भैरम, वन भैरम, चौना भैरम, चोखा भैरम और टुंडाल भैरम प्रमुख हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ये सभी रूप शिव के ही विभिन्न स्वरूप माने जाते हैं, जिनकी पूजा ग्राम देवता के रूप में की जाती है।
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बस्तर में भैरम और भंगाराम के कई देवस्थल मौजूद हैं, लेकिन बीजापुर जिले का भैरमगढ़ विशेष धार्मिक महत्व रखता है। माना जाता है कि यह क्षेत्र भैरम की प्रमुख आराधना स्थली है। यहां स्थित भैरमगुड़ी में दो भैरम देव प्रतिष्ठित हैं। इसके साथ ही शिव परिवार की अनेक प्रतिमाएं और शिवलिंग भी स्थापित हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपरा का प्रमाण माने जाते हैं।
पाटदेव और आँगादेव को मिलता है विशेष सम्मान
बस्तर अंचल में पाटदेव और आँगादेव सबसे अधिक पूजनीय ग्रामदेव माने जाते हैं। इनका प्रतीक विशेष विधि-विधान के साथ बेल की लकड़ी से तैयार किया जाता है। प्रतीक के ऊपरी भाग में चांदी या तांबे से बना नाग स्थापित किया जाता है, जो शिव की उपस्थिति और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।

पाटदेव को पूरे अंचल का प्रमुख देव माना जाता है, जबकि आँगादेव की स्थापना माता गुड़ी सहित कई धार्मिक स्थलों पर की जाती है। कई स्थानों पर आँगादेव शिवलिंग के साथ भी प्रतिष्ठित रहते हैं। ग्रामीण समाज में इन दोनों देवों के प्रति गहरी आस्था देखने को मिलती है।
घोटुल की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े हैं लिंगोपेन
बस्तर के मुरिया समाज की सांस्कृतिक पहचान घोटुल केवल सामाजिक और सांस्कृतिक शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आस्था का भी प्रमुख स्थल है। घोटुल की आराधना के केंद्र में लिंगोपेन की मान्यता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार लिंगोपेन भगवान लिंगराज अथवा नटराज का ही स्वरूप हैं।
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विशेष बात यह है कि घोटुल में लिंगोपेन की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती। उन्हें निराकार शक्ति के रूप में पूजा जाता है। यह परंपरा बस्तर की उस आध्यात्मिक सोच को दर्शाती है, जिसमें ईश्वर को मूर्ति से अधिक आस्था और चेतना के रूप में स्वीकार किया जाता है।
लोक संस्कृति और आस्था का अद्भुत संगम
बस्तर की धार्मिक परंपराएं इस बात का प्रमाण हैं कि यहां शिव और शक्ति की उपासना भारतीय सनातन परंपरा तथा जनजातीय संस्कृति के सुंदर समन्वय के रूप में विकसित हुई है। ग्रामदेव, भैरम, पाटदेव, आँगादेव और लिंगोपेन आज भी बस्तर के सामाजिक जीवन, लोकविश्वास और सांस्कृतिक पहचान के अभिन्न अंग बने हुए हैं।
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