- कहीं सरेराह तो कहीं पर सरे शाम या भरी दोपहरी में वारदात करने वाले बने चुनौती
- भले ही कातिल कोई करीबी हो, पर नहीं है खाकी का अंकुश
ए अहमद सौदागर
लखनऊ। राजधानी लखनऊ को कमिश्नरेट लागू हुए करीब पांच साल हो गए। राजधानी वासियों को उम्मीद थी कि अब अपराधों गिरावट आएगी और बहू बेटियां सुरक्षित रहेंगी, लेकिन जिस तरह से पीजीआई क्षेत्र स्थित बाबू खेड़ा गांव निवासी 45 वर्षीय रेनू यादव को बदमाशों ने निशाना बनाया तो इस सनसनीखेज वारदात ने मानो कमिश्नरेट पुलिस की धज्जियां उड़ाकर रख दी।
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भले इस घटना को अंजाम देने वाला कोई जानने शामिल हो, लेकिन अपराध तो अपराध। खास बात यह है कि घटना उस समय हुई जब दशहरा पर्व और दूसरे दिन जगह-जगह भरत मिलाप का आयोजन चल रहा था और इस दौरान सुरक्षा को भारी संख्या में पुलिस तैनात किया गया था, लेकिन इसी सुरक्षा के बीच बदमाश रेनू यादव की बेरहमी से हत्या कर फुर्र हो गए।

सवाल है कि राजधानी में पुलिस कमिश्नरेट लागू होने के बाद भी अपराधो पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। बेख़ौफ़ अपराधी वारदात पर वारदात कर पुलिस को चुनौती दे रहे हैं। हत्या, लूट, छेड़छाड़ व मारपीट की घटनाएं आम हो गई है। कमिश्नरेट में खाकी के खौफ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बेख़ौफ़ बदमाशों पिछले कुछ दिनों में कई वारदातों को अंजाम दे डाला है। यही नहीं बदमाशों ने पीजीआई क्षेत्र स्थित बाबू खेड़ा गांव निवासी दूध कारोबारी रमेश यादव की पत्नी रेनू यादव की दिनदहाड़े हत्या कर दुस्साहस का परिचय दे डाला और पुलिस जगह-जगह सुरक्षा किए जाने का डंका बजाती रह गई।

गौर करें तो पुलिस कमिश्नरेट लागू होने से पहले जिले में लोगों की सुरक्षा के लिए एसएसपी के पद पर एक आईपीएस अफसर की तैनाती की जाती थी। उसके मातहत छह से सात हजार पुलिसकर्मी तैनात रहते थे। अपराध की रोकथाम और लोगों की सुरक्षा के मद्देनजर राजधानी लखनऊ में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू की गई ढेरों पुलिस बल तैनात किया गया, इसके बावजूद अपराधी कहीं न कहीं संगीन घटनाओं को अंजाम देने में पीछे नहीं हैं। यही नहीं कमिश्नरेट में आईपीएस अफसरों की लंबी फौज है और अनगिनत पुलिसकर्मी भी तैनात हैं, लेकिन अपराधियों का आतंक बरकरार है। नतीजतन खूनी लुटेरों से लेकर जालसाजों का जाल जगह-जगह जकड़ चुका है। आए दिन जालसाज किसी न किसी की गाढ़ी कमाई बटोर पुलिस को खुली चुनौती दे रहे हैं।
