
होर्मुज पर तनाव बरकरार, अब अमेरिका ने मढ़ा ईरान पर यह बड़ा आरोप
मार्को रूबियो ने कहा- ‘गम्भीर नहीं है ईरान’, सुधर जाएं नहीं तो कुछ भी सकता है
अपनी वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूती देने में जुटा है ईरान, सस्पेंस बरकरार
राकेश तिवारी
दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में मची खलबली उस समय और बढ़ गई जब ईरान के खतम अल-अंबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर ने बड़ी गर्जना की। उन्होंने अमेरिका को दो टूक लहजे में चेतावनी दी है। कहा कि यदि अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करता है तो वह इलाके में मौजूद अमेरिकी एवं उसके सहयोगी देशों के ‘हितों’ पर हमला करेगा। कमांड ने एक बयान में कहा कि हम यह साफ़ करते हैं कि अगर हमलावर सेना इस हद तक आगे बढ़ती है, तो हम इसे इलाके में युद्ध को और बढ़ाने वाला कदम मानेंगे और इलाके में मौजूद सभी अमेरिकी और सहयोगी हितों को हमारी सेना के ज़बरदस्त हमले का निशाना बनाया जाएगा। इसका प्रमाण इसी से मिलता है कि ईरान दिनों-दिन अपनी वायु रक्षा प्रणाली को मजबूत कर रहा है।
बताते चलें कि फारस की खाड़ी में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अपने सबसे संकरे बिंदु पर मात्र 20 मील चौड़ा है, जिसके कारण यह ईरान, इराक, कुवैत और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों से प्रतिदिन दो करोड़ बैरल तेल ले जाने वाले टैंकरों के लिए एक भौगोलिक “चोक पॉइंट” बन जाता है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर जिसका भी नियंत्रण होता है, वह वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग 25 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करता है। इससे पहले ईरानी सेना के प्रवक्ता मोहम्मद अकरमिनिया ने कहा था कि सेना को नयी वायु रक्षा प्रणाली मिली हैं। अकरमिनिया ने कहा कि इन नए वायु रक्षा प्रणाली ने हमारी रक्षा क्षमताओं को बहुत बढ़ा दिया है। अब हम दुश्मन के विमानों का मुकाबला करने में कहीं ज़्यादा सक्षम हैं। उन्होंने आगे कहा कि ईरान अमेरिका के साथ संघर्ष के दौरान क्षतिग्रस्त हुई वायु रक्षा प्रणाली को ठीक करने में कामयाब रहा है। गौरतलब है कि अमेरिकी सेना ने गत आठ जुलाई से ईरान पर कई बार हमले किए हैं।
दूसरी ओर अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दावा किया कि ये हमले होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले व्यापारिक जहाज़ों के ख़िलाफ़ ईरान की कार्रवाई के जवाब में किए गए थे। ईरानी सेना ने कई मध्य-पूर्वी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमले करके जवाब दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गत नौ जुलाई को कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम अब लागू नहीं है। यानी दोनों पक्ष अब एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। मामला ठंडा नहीं पड़ा तो एक बार फिर दुनिया में ऊर्जा संकट बढ़ सकता है। बताते चलें कि दोनों के बीच बढ़ती तनातनी के कारण दुनिया भर में ऊर्जा संकट अभी भी जारी है।
अमेरिका ने ईरान पर लगाया गम्भीर आरोप
फिलीपींस की राजधानी मनीला में चल रही आसियान विदेश मंत्रियों की बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि इस वक्त हमारी समस्या यह है कि वे बातचीत को लेकर गंभीर नहीं हैं। अगर वे गंभीर हैं, तो हम भी गंभीर हैं। अगर वे गंभीर नहीं हैं, तो हम अपने और अपने सहयोगियों के हितों की रक्षा के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करेंगे। कतर, मिस्र, पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय मध्यस्थों ने अमेरिका और ईरान के समक्ष 10 दिनों के युद्धविराम का प्रस्ताव रखा है।
इजरायल के कदम की भी हो रही है समीक्षा
एक्सियोस की सोमवार रात की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इस प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है और उसने इजरायल से ऐसे कदम उठाने से बचने का आग्रह किया है, जो कूटनीति के रास्ते बंद कर सकते हैं। इसके साथ ही बातचीत के विफल होने की आशंका के मद्देनजर अमेरिका तैयारियां भी कर रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इजरायली सेना को ‘हाई अलर्ट’ पर रखा गया है और वह कुछ ही दिनों में युद्ध के पूर्ण समन्वित अभियान में बदलने की आशंका के मद्देनजर तैयारियां कर रही है। रिपोर्टों के मुताबिक इस नये युद्धविराम प्रस्ताव में दुश्मनी रोकने, होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये जहाजों की आवाजाही फिर शुरू करने और अमेरिका-ईरान के लिए सहमति पत्र (MOU) को बचाने का अवसर देने की बात शामिल है।
स्वेज संकट की आने लगी याद
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान की नाकेबंदी और अमेरिकी-इजरायल संघर्ष की वजह से दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़े संकट का सामना करना पड़ रहा है। होर्मुज की नाकेबंदी ने वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल ला दिया है। इस नाकेबंदी ने ऐसे ही एक संकट की बुरी यादें ताजा कर दी हैं जिसने दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के करीब एक दशक बाद पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया था। तब स्वेज नहर पर कब्जा करने के बावजूद ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल को सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र की ओर से भारी राजनीतिक दबाव पड़ा। इसी के चलते उन्हें मिस्र से अपनी सेनाएं वापस बुलानी पड़ीं। तब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति आइजनहावर ने स्वेज संकट के दौरान शांतिदूत की भूमिका निभाई थी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में उस प्रस्ताव को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई, जिसने मिस्र में तत्काल युद्धविराम लागू करने का आह्वान किया गया था।
पहले भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दे चुका है टेंशन
साल 1507 में पहली बार पुर्तगाल ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जा किया। इस पर कब्जा करने का उन्हें खूब फायदा भी मिला। पुर्तगालियों ने एक सदी तक होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से व्यापार करके खूब धन कमाया, लेकिन 1622 में फारस के शक्तिशाली सफाविद राजवंश के शाह अब्बास प्रथम (1588 से 1629 तक) और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए गठबंधन द्वारा उन्हें खदेड़ दिया गया। अंग्रेजों ने सफाविदों के साथ लाभकारी व्यापारिक अनुबंधों के बदले नौसैनिक शक्ति प्रदान की। उसके बाद वर्ष 1951 में ईरान पर दबाव बनाने के लिए अंग्रेजों ने जलडमरूमध्य की नाकाबंदी कर दी।
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