
URBAN CHASLLENGE FUND के तहत 31 हजार 000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी
Urban Challenge Fund : आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अर्बन चैलेंज फंड के दिशा-निर्देश अंतिम रूप दिए जाने के महज 20 से 25 दिनों के भीतर 31 हजार 000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई है। यह जानकारी मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव डी. थारा ने उद्योग मंडल फिक्की के नौवें अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इनोवेशन समिट के दौरान यहां मंगलवार को दी। थारा ने बताया कि अब तक स्वीकृत परियोजनाओं के वित्तपोषण में 44 प्रतिशत हिस्सा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) का है, जबकि 22 प्रतिशत निवेश सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से आ रहा है। इसके अलावा पांच से सात प्रतिशत धनराशि बॉन्ड्स के जरिए जुटाई जा रही है, जबकि शेष वित्तपोषण वाणिज्यिक बैंकों द्वारा किया जा रहा है।
क्या है अर्बन चैलेंज फंड
अर्बन चैलेंज फंड (UCF) आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) की एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसके लिए वित्तीय वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक ₹एक लाख करोड़ की केंद्रीय सहायता निर्धारित की गई है और इसे लागू करने की अवधि वित्तीय वर्ष 2033–34 तक बढ़ाई जा सकती है। इसका उद्देश्य चैलेंज-आधारित शहरी अवसंरचना परियोजनाओं का समर्थन करना है, जिससे पाँच वर्षों में लगभग ₹चार लाख करोड़ के निवेश को उत्प्रेरित किया जा सके। यह योजना अनुदान-आधारित वित्तपोषण से बाज़ार-संबंधित, सुधार-प्रधान और परिणाम-केंद्रित शहरी विकास की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है, यह स्वीकार करते हुए कि केवल सार्वजनिक वित्त शहरी अवसंरचना की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता।
कैसे करता है यह कार्य
यह मूल रूप से तीन विभागों में बंटकर कार्य करता है। पहला विकास केंद्र के रूप में शहर: यह ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD), ग्रीनफील्ड टाउनशिप और आर्थिक गलियारों पर केंद्रित है, ताकि प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाई जा सके। वहीं दूसरा सृजनात्मक पुनर्विकास: इसमें भीड़भाड़ वाले शहर के केंद्र, सांस्कृतिक धरोहर स्थल और ब्राउनफील्ड पुनरुज्जीवन यानी परित्यक्त औद्योगिक भूमि का पुन: उपयोग शामिल है। जबकि तीसरा पार्ट जल और स्वच्छता: इसमें पेयजल आपूर्ति में सेवा पूर्णता हासिल करना तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का आधुनिकीकरण, साथ ही पुराने अपशिष्ट का निवारण शामिल है।
भारत के आर्थिक भविष्य के लिये शहर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्पादकता केंद्र: शहर बड़े इंजन के रूप में कार्य करते हैं जो आर्थिक गतिविधियों को छोटे, प्रभावी भौगोलिक क्षेत्रों में संकुचित करते हैं। जबकि केवल तीन प्रतिशत भूमि शहरी है, शहर भारत की GDP में लगभग 60% से 70% का योगदान देते हैं। केवल 15 शहर (जिनमें मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद शामिल हैं) राष्ट्रीय GDP का 30% हिस्सा बनाते हैं। इनसे 2047 तक वार्षिक GDP वृद्धि में अतिरिक्त 1.5% योगदान की आशा है।
शहर भारत को विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने में केंद्र भूमिका निभा रहा है। वर्ष 2030 तक भारत की कुल उपभोक्ता खपत लगभग दोगुनी होकर 3.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होने की संभावना है, जिसमें शहरी मध्यम वर्ग इस वृद्धि का लगभग 60% हिस्सा देगा। शहरी आय ग्रामीण आय से चार गुना तक अधिक है, जो इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर प्रीमियम सेवाओं तक की मांग को बढ़ावा देती है। गौरतलब है कि भारत में लगभग 90% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रमुख शहरी क्षेत्रों में केंद्रित होता है। मेट्रो नेटवर्क, हाई-स्पीड इंटरनेट और स्थिर विद्युत जैसी प्रभावी शहरी अवसंरचना भारत के 2026 तक पांच ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर और 2047 तक 40 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के लिये आवश्यक है।
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