सोशल मीडिया के ’एंड टू एंड एन्क्रिप्टेड’ ऐप का सहारा ले रहे आतंकी संगठन

कटिहार की घटना ने किया पर्दाफाश,

युवाओं को बरगला कर उन्हें कट्टरपंथी बनाने का बना सबसे शक्तिशाली हथियार

INTERPOL, UNESCO, FTF ने वैश्विक सहयोग बढ़ाने की अपील की,

रंजन कुमार सिंह

UNESCO : सोशल मीडिया आधुनिक युग में आतंकवाद के प्रचार-प्रसार, युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें बरगलाने का एक सबसे शक्तिशाली हथियार बन गया है। आतंकवादी संगठन फेसबुक, एक्स (X), इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल अपनी विचारधारा फैलाने, नए रंगरूटों (भर्ती) की तलाश करने और गुप्त रूप से हमले की योजना बनाने के लिए कर रहे हैं। इसका खुलासा अभी बिहार के कटिहार में पकड़े गए संदिग्ध आतंकी के मोबाइल से हुआ है। आतंकी समूह भड़काऊ वीडियो, ऑनलाइन प्रचार सामग्री और डीपफेक का उपयोग करके युवाओं को निशाना बनाते हैं और उनका ब्रेनवॉश करते हैं।

एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग : टेलीग्राम और सिग्नल जैसे एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड ऐप्स का उपयोग सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचने और गुप्त रूप से संवाद करने के लिए किया जाता है।

ग्लोबल रीच और फंड जुटाना : बिना किसी भौगोलिक सीमा के, आतंकवादी इंटरनेट के माध्यम से एक साथ दुनिया भर के लोगों से जुड़ सकते हैं और धन (क्रिप्टोकरेंसी आदि) जुटा सकते हैं।

कड़े आईटी नियम : विभिन्न देशों की सरकारें सोशल मीडिया कंपनियों पर दबाव बना रही हैं कि वे अपने प्लेटफॉर्म से आतंकवादी और चरमपंथी सामग्री को तुरंत हटाएं। सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई: भारत में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण  (NIA) और अन्य एजेंसियां सोशल मीडिया के जरिए कट्टरपंथ फैलाने वाले नेटवर्कों का लगातार भंडाफोड़ कर रही हैं।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग : Interpol और संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाएं आतंकवादी सामग्री का पता लगाने और ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी करने के लिए सदस्य देशों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं और माता-पिता के लिए यह बेहद आवश्यक है कि वे ऑनलाइन संदिग्ध गतिविधियों के प्रति सतर्क रहें और UNESCO द्वारा सुझाई गई मीडिया साक्षरता का पालन करते हुए केवल प्रमाणित और विश्वसनीय स्रोतों पर ही विश्वास करें। आतंकी संगठन सोशल मीडिया, मैसेजिंग एप्लिकेशन और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आतंकी फंडिंग के लिए कर रहे। अंतरराष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट में ये बात कही। एफएटीएफ ने चिंता जताते हुए वैश्विक सहयोग बढ़ाने की अपील की है।

FATF की अध्यक्ष एलिसा डे आंदा माद्राजो ने कहा कि आतंकवाद के वित्तपोषण का स्वरूप अब तेजी से बदल रहा है। इससे आतंकी संगठनों की वैश्विक स्तर पर लोगों तक पहुंच काफी बढ़ गई है। आतंकवादी वित्तपोषण अब डिजिटल हो गया है और इसके साथ अरबों लोगों तक पहुंचने तथा हमलों के प्रभाव को कई गुना बढ़ाने की क्षमता पहले से कहीं अधिक हो गई है। एफएटीएफ ने कहा कि डिजिटल तकनीकों से पैदा हो रहे नए खतरों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को और मजबूत करना होगा। रिपोर्ट के अनुसार आतंकी संगठन इन तंत्रों का इस्तेमाल सिर्फ प्रचार और धन जुटाने के लिए ही नहीं, बल्कि फर्जी मानवीय सहायता, क्राउडफंडिंग अभियानों, क्रिएटर इकोनॉमी से जुड़ी सुविधाओं, वर्चुअल एसेट्स के जरिए फंड जुटाने के लिए भी कर रहे हैं। बीते एक दशक में सोशल मीडिया, मैसेजिंग और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ऐसे जटिल डिजिटल इकोसिस्टम हो गए हैं जिनमें एकीकृत भुगतान प्रणाली, वर्चुअल एसेट्स, कंटेंट क्रिएटर्स के लिए कमाई के साधन और सीमा-पार वित्तीय सेवा उपलब्ध हैं। इससे आतंकवादी संगठनों को वित्त ताकज जुटाने का नया अवसर मिल गया है। एफएटीएफ वैश्विक स्तर पर धन शोधन और आतंकी वित्तपोषण पर नजर रखती है।

तेजी से बढ़ रही चुनौती : एफएटीएफ ने कहा कि एआई आधारित कंटेंट, एन्क्रिप्टेड संचार, वर्चुअल एसेट्स और प्लेटफॉर्म में मौजूद भुगतान सुविधाओं के कारण आतंकी वित्तपोषण के तरीकें और अधिक जटिल हो गयाा है। इससे निपटने के लिए सरकारों, वित्तीय संस्थानों और प्रौद्योगिकी कंपनियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी हो गया है।

रिपोर्टिंग का दायरा कम: FATF  ने बताया कि इसकी रिपोर्टिंग करने वाले 30 फीसदी से भी कम देशों ने अपने राष्ट्रीय जोखिम आकलन में इन माध्यमों से होने वाले आतंकी वित्तपोषण के जोखिमों को शामिल किया है। इसलिए इस विकसित होते खतरे की पहचान और उससे निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों को तेज करना जरूरी है। एक विशाल नेटवर्क ने विश्व भर में सूचना साझा करने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है। इसने संचार को पहले से कहीं अधिक तेज़, आसान और सुलभ बना दिया है, जिससे महाद्वीपों के लोग एक क्लिक से जुड़ जाते हैं।

फिर भी, इसके अपार लाभों के बावजूद, डिजिटल दुनिया काफी हद तक आभासी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत जीवन, समाचार और चित्र अक्सर फ़िल्टर किए जाते हैं, संपादित किए जाते हैं और कृत्रिम रूप से निर्मित होते हैं, जिससे एक ऐसा भ्रम पैदा होता है जो अक्सर वास्तविकता से बहुत दूर होता है। यह आभासी वातावरण, जो असत्यापित और भ्रामक सामग्री से भरा हुआ है, युवाओं पर लगातार नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। सोशल मीडिया की लत चिंता, आत्मसम्मान में कमी और बहुमूल्य समय की बर्बादी का कारण बनती है। धार्मिक और वैचारिक दृष्टिकोण से, चुनौती और भी गंभीर है। ऑनलाइन उपलब्ध भ्रामक जानकारी और विकृत कथाएँ आसानी से संवेदनशील मन को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे युवाओं की दृढ़ आस्था और नैतिक मूल्यों को गंभीर खतरा हो सकता है।

इक्कीसवीं सदी में उग्रवाद का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अतीत में, उग्रवादी विचारधाराएँ सीमित समूहों, गुप्त बैठकों या प्रतिबंधित साहित्य के माध्यम से फैलती थीं। लेकिन आज, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इनके प्रसार को त्वरित और वैश्विक बना दिया है। स्मार्टफोन स्क्रीन वैचारिक संघर्ष के नए युद्धक्षेत्र बन गए हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म अब शक्तिशाली माध्यमों के रूप में काम करते हैं जिनके द्वारा भड़काऊ विचार, धार्मिक उग्रवाद और घृणास्पद प्रचार अभूतपूर्व गति से युवा दर्शकों तक पहुँचते हैं।

ऑनलाइन नेटवर्क जो विशेष रूप से मुस्लिम युवाओं को लक्षित करते हैं, अक्सर उनकी सोच को प्रभावित करने के लिए भावनात्मक अपील और धार्मिक भाषा का उपयोग करते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण, बहुधार्मिक समाज में यह मुद्दा विशेष रूप से संवेदनशील हो जाता है। भारतीय मुसलमानों की ऐतिहासिक पहचान लंबे समय से आपसी सहअस्तित्व, आध्यात्मिक परंपराओं, शिक्षा और रचनात्मक सामाजिक भागीदारी से जुड़ी रही है। इसी कारण, ऑनलाइन प्रसारित हो रही चरमपंथी विचारधाराओं को समझना न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है,

बल्कि एक बौद्धिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है।डिजिटल प्लेटफॉर्म की प्रमुख विशेषताओं में से एक है उपयोगकर्ताओं की प्राथमिकताओं के अनुसार सामग्री को वैयक्तिकृत करने की उनकी क्षमता। इससे सुविधा तो बढ़ती है, लेकिन साथ ही यह “इको चैंबर्स” नामक बंद वातावरण भी बना सकती है, जहां व्यक्तियों को बार-बार समान विचारों का सामना करना पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति लगातार किसी विशेष प्रकार की राजनीतिक या धार्मिक सामग्री का उपभोग करता है, तो एल्गोरिदम उसे उसी तरह से दोहराते रहते हैं।


नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

खबरों में अपडेट रहना हमारी आदत है और सबसे आगे रहना मेरा जुनून। अब नया लुक ऐप भी ले आया है। आप सभी से अनुरोध है कि आप इसे अपना प्यार, दुलार और आशीर्वाद दें। आप सभी से निवेदन है कि मेरा न्यूज ऐप अपने अपने फोन में इंस्टॉल कर लीजिए। मैं आप सभी का आभारी रहूंगा…https://play।google।com/store/apps/details?id=com।app।nayalooknews

ये भी पढ़े

भारत पर फिर 100% अमेरिकी टैरिफ का खतरा

प्रेग्नेंसी, फिर भी डोसा खाने पहुंची दीपिका पादुकोण

कनेक्शन नहीं है, मत घबराइये, मिलेगा LPG सिलेंडर , चंद मिनटों में बुकिंग और डिलीवरी

आगरा से कोलकाता तक ग्रीनफील्ड एलिवेटेड कॉरिडोर

 

 

Spread the love

One thought on “सोशल मीडिया के ’एंड टू एंड एन्क्रिप्टेड’ ऐप का सहारा ले रहे आतंकी संगठन”

Comments are closed.

EV Battery
Technology

अब सस्ते होंगे मोबाइल और स्मार्ट टीवी

सरकार ने स्पेयर पार्ट्स पर कस्टम ड्यूटी हटाई EV Battery : भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा ऐतिहासिक निर्णय लिया है। वित्त मंत्रालय ने स्मार्टफोन, लैपटॉप और स्मार्ट टीवी के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले अनिवार्य स्पेयर पार्ट्स—जैसे डिस्प्ले असेंबली, लिथियम-आयन सेल और इंडक्टर कॉइल मॉड्यूल […]

Spread the love
Read More
BSNL
Technology

BSNL सैटेलाइट फोन लॉन्च, बिना सिम-नेटवर्क के होगी बात

BSNL  : सरकारी टेलीकॉम कंपनी BSNL ने भारत में नया सैटेलाइट फोन लॉन्च किया है। इसकी कीमत टैक्स मिलाकर 1,34,166 रुपए रखी गई है। यह रेगुलर स्मार्टफोन से बिल्कुल अलग है, जो बिना सिम और नेटवर्क के बजाय सीधे सैटेलाइट की मदद से काम करता है। फोन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि नेटवर्क […]

Spread the love
Read More
Smartphone Price Cut
Business Technology

सस्ते हो सकते हैं स्मार्टफोन और लैपटॉप

लीथियम-आयन सेल और डिस्प्ले पर कस्टम ड्यूटी माफ Smartphone Price Cut : केंद्र सरकार ने देश में स्मार्टफोन, लैपटॉप, वियरेबल्स (स्मार्टवॉच, फिटनेस बैंड) और स्मार्ट टीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज बनाने में इस्तेमाल होने वाले सामान से बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) हटा दी है। इससे स्मार्टफोन, लैपटॉप और स्मार्ट टीवी सस्ते हो सकते हैं। अब डिस्प्ले […]

Spread the love
Read More