
प्रणय विक्रम सिंह
RAM नदियां अचानक नहीं बनतीं। वे पहले किसी पर्वत की निस्तब्धता में जन्म लेती हैं, फिर चट्टानों से टकराती हैं, घाटियों से गुजरती हैं, मैदानों को सींचती हैं और अंततः करोड़ों लोगों के जीवन का आधार बन जाती हैं। कुछ व्यक्तित्व भी ऐसे ही होते हैं। उन्हें केवल उनके वर्तमान से नहीं समझा जा सकता। उन्हें समझने के लिए उनके स्रोत तक जाना पड़ता है। राम और राष्ट्र के आराधक, मर्यादा और मातृभूमि के साधक योगी आदित्यनाथ को समझने के लिए भी हिमालय की शरण में जाना होगा। क्योंकि यह दास्तान गढ़वाल की उन वादियों से शुरू होती है, जहां प्रकृति मनुष्य को मौन रहकर भी बहुत कुछ सिखाती है। जहां पर्वत स्थिर रहकर धैर्य का पाठ पढ़ाते हैं। जहां नदियां बहकर समर्पण का अर्थ समझाती हैं। जहां आकाश की विराटता मनुष्य को उसके छोटे होने का बोध कराती है।
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उसी भूमि पर जन्मे एक बालक का गोरक्षपीठ की परंपरा में दीक्षित होकर उत्तर भारत के सबसे बड़े जनसमूह की आशाओं का प्रतिनिधि बनना कोई सामान्य राजनीतिक यात्रा नहीं है। इसके पीछे भारतीय परंपरा का वह अदृश्य सूत्र है जिसमें तप, त्याग और लोकमंगल एक-दूसरे से अलग नहीं होते। पावन गोरक्षपीठ ने उन्हें केवल दीक्षा नहीं दी, दृष्टि भी दी। दृष्टि केवल धर्म की नहीं बल्कि उस भारतीय परंपरा की, जो मानती है कि तपस्या का सर्वोच्च फल लोकमंगल है। भारतीय परंपरा में संन्यासी संसार से विमुख नहीं होते, वे स्वयं को संसार के लिए समर्पित करते हैं। इसी कारण हमारे यहां ऋषि, राजाओं के मार्गदर्शक भी बने और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं समाज का नेतृत्व भी किया। योगी आदित्यनाथ उसी परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जिसमें धर्म का अर्थ पलायन नहीं, दायित्व होता है। उनके व्यक्तित्व को समझना हो तो राजनीति से पहले उनकी साधना को समझना होगा क्योंकि योगी आदित्यनाथ के भीतर बैठा संन्यासी ही उनके भीतर के प्रशासक को दिशा देता है।
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जब साधना व्यक्ति से बड़ी हो जाती है, तब जीवन का केंद्र भी बदल जाता है। मनुष्य तब अपने लिए नहीं, किसी बड़े उद्देश्य के लिए जीने लगता है। यहीं से धीरे-धीरे योगी आदित्यनाथ का सृजन होने लगा। उनका जीवन अब निजी सीमाओं में नहीं रहा। संन्यास ने उनके व्यक्तित्व को परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से लोकमंगल के व्यापक आयाम से जोड़ दिया। इसलिए वे घर से मठ, मठ से समाज और समाज से राष्ट्र के सुपंथ के पथिक बन गए। योगी आदित्यनाथ के सार्वजनिक जीवन को देखते हुए श्रीरामचरितमानस की पंक्ति ‘हम चाकर रघुबीर के…’ बार-बार स्मरण हो आती है, क्योंकि उनके लिए राम केवल आराध्य नहीं हैं। वे मर्यादा हैं। वे दायित्व हैं। वह अदृश्य कसौटी हैं, जिस पर वे स्वयं को बार-बार परखते दिखाई देते हैं। शायद इसी कारण उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत द्वंद्व साथ-साथ चलता है। एक ओर कठोर निर्णय लेने वाला प्रशासक। दूसरी ओर किसी पीड़ित की व्यथा सुनकर द्रवित हो जाने वाला मनुष्य। एक ओर अपराध के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस का संकल्प। दूसरी ओर जनता दर्शन में घंटों खड़े रहकर लोगों की बातें सुनने का धैर्य।
एक ओर सत्ता। दूसरी ओर सेवा। एक ओर शासन। दूसरी ओर साधना। यही वह बिंदु है जहां योगी आदित्यनाथ एक राजनीतिक व्यक्तित्व भर नहीं रह जाते। एक प्रतीक बन जाते हैं। एक प्रवृत्ति बन जाते हैं। शायद इसी कारण उनके व्यक्तित्व में रामभक्ति और राष्ट्रभक्ति एक ही दीप की दो ज्योतियां प्रतीत होती हैं। इसीलिए वैदिक ऋषियों का उद्घोष ‘इदं राष्ट्राय, इदं न मम’ भी उनके जीवन-दर्शन के निकट प्रतीत होता है। जिस समय उन्हें उत्तर प्रदेश की बागडोर संभाली, यह प्रदेश अपनी अपार संभावनाओं के बावजूद अपनी चुनौतियों से जूझ रहा था। उस समय उत्तर प्रदेश का नाम सुनते ही लोगों की स्मृति में अपराध आता था। अपराध से भय आता था। भय से अविश्वास जन्म लेता था और अविश्वास से विकास की हर संभावना सिकुड़ जाती थी।
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लेकिन इतिहास का नियम है कि किसी भी समाज का पुनर्जागरण पहले उसके आत्मविश्वास में होता है। सड़कें बाद में बनती हैं। इमारतें बाद में बनती हैं। आर्थिक आंकड़े बाद में बदलते हैं। सबसे पहले मनुष्य का विश्वास बदलता है। पिछले साढ़े नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने इसी विश्वास की वापसी देखी है। योगी के नेतृत्व में व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास हुआ। व्यवस्था से विश्वास लौटा। विश्वास से निवेश आया। निवेश से अवसर पैदा हुए और अवसरों ने युवाओं की आंखों में फिर से सपने बो दिए। आज जब उत्तर प्रदेश की धरती विकास के वंदनवारों से सुसज्जित दिखाई देती है, जब निवेश के नए नक्षत्र इसके आकाश में चमकते हैं, जब एक्सप्रेसवे इसकी धमनियों में दौड़ते रक्त की तरह गति का संचार करते हैं, तब यह स्मरण करना आवश्यक हो जाता है कि परिवर्तन का यह परिदृश्य किसी संयोग का परिणाम नहीं है। इसके पीछे एक ऐसी इच्छाशक्ति है जिसने चुनौतियों को चुनौती दी, अव्यवस्थाओं को ललकारा और संभावनाओं को साकार किया।
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आज एक्सप्रेस-वे केवल सड़कें नहीं हैं, वे गति के नए गीत हैं। एयरपोर्ट केवल इमारतें नहीं हैं, वे संभावनाओं के आकाशद्वार हैं। मेडिकल कॉलेज केवल संस्थान नहीं हैं, वे जनविश्वास की जीवनरेखाएं हैं। उन लाखों परिवारों की राहत लगते हैं, जिनकी उम्मीदें कभी संसाधनों की कमी में दम तोड़ देती थीं। लेकिन योगी आदित्यनाथ की कथा यहां भी पूरी नहीं होती। क्योंकि उत्तर प्रदेश केवल भूगोल नहीं है। यह स्मृतियों का प्रदेश भी है। जो समाज अपनी स्मृतियां खो देता है, वह अपनी दिशा भी खो देता है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने केवल विकास का नया व्याकरण नहीं लिखा, उसने अपनी स्मृतियों से पुनः संवाद भी स्थापित किया है। अयोध्या आज केवल एक नगर नहीं, राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन चुकी है। काशी केवल एक तीर्थ नहीं, परंपरा और आधुनिकता के समन्वय का जीवंत उदाहरण बन गई है। प्रयागराज का महाकुंभ केवल आयोजन नहीं, भारतीय आत्मा का महासंगम बनकर उभरा है। यह वही सांस्कृतिक प्रवाह है जिसमें विरासत और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक दिखाई देते हैं।
किन्तु किसी भी शासन की पहली शर्त व्यवस्था होती है। भारतीय चिंतन में राजधर्म का अर्थ केवल प्रशासन नहीं, लोकमंगल की रक्षा भी है। श्रीरामचरितमानस में श्रीराम द्वारा की गई ‘निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह’ प्रतिज्ञा राजधर्म की उद्घोषणा थी। यह उस शासन-दृष्टि का विधान था जिसमें सज्जनों की सुरक्षा और दुष्टों का दमन, दोनों समान रूप से आवश्यक माने गए। पिछले वर्षों में उत्तर प्रदेश ने कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में जो परिवर्तन देखा, उसे इसी राजधर्म की आधुनिक अभिव्यक्ति के रूप में समझा जा सकता है। व्यवस्था का इकबाल पुनः स्थापित हुआ, कानून के प्रति विश्वास मजबूत हुआ और शासन की मंशा को लेकर समाज में स्पष्ट संदेश गया कि अपराध और अराजकता किसी भी सभ्य समाज की नियति नहीं हो सकते।
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यहीं आकर योगी आदित्यनाथ का व्यक्तित्व अपने पूर्ण अर्थ में समझ आता है। वे केवल सड़कें बनाने वाले प्रशासक नहीं हैं। वे केवल चुनाव जीतने वाले राजनेता भी नहीं हैं। वे उस मनःस्थिति के शिल्पकार हैं, जिसने उत्तर प्रदेश को अपनी शक्ति पहचानना सिखाया। उन्होंने केवल प्रदेश का भूगोल नहीं बदला। उन्होंने उसके मानस को भी बदलने का प्रयास किया और जब किसी प्रदेश का मानस बदलता है, तब उसका भविष्य भी बदलने लगता है। यही कारण है कि आज योगी आदित्यनाथ केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं। वे करोड़ों युवाओं की आकांक्षाओं में उपस्थित हैं। वे उन किसानों की आशाओं में उपस्थित हैं जो अपने श्रम का सम्मान चाहते हैं। वे उन माताओं की प्रार्थनाओं में उपस्थित हैं जो अपने बच्चों के लिए सुरक्षित और समृद्ध भविष्य चाहती हैं।
वे उस भारत की कल्पना में उपस्थित हैं जो अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिकता के शिखर तक पहुंचना चाहता है। इसलिए उनका जन्मदिन केवल एक व्यक्ति का जन्मदिन नहीं लगता। वह एक यात्रा का उत्सव लगता है। एक ऐसे संन्यासी की यात्रा का, जिसने स्वयं को समाज में विसर्जित कर दिया। एक ऐसे नेतृत्व की यात्रा का, जिसने उत्तर प्रदेश को निराशा से संभावना की ओर मोड़ने का प्रयास किया। एक ऐसे विश्वास की यात्रा का, जो आज भी करोड़ों लोगों के हृदय में जीवित है। यह उस साधना की स्मृति है, जिसने सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया। उस संकल्प का अभिनंदन है, जिसने शासन को उत्तरदायित्व का पर्याय बनाने का प्रयास किया और उस चेतना का सम्मान है, जिसने उत्तर प्रदेश को अपने सामर्थ्य का पुनः बोध कराया। अंततः कुछ लोग पदों से बड़े हो जाते हैं। कुछ लोग समय से बड़े हो जाते हैं। कुछ लोग इतिहास में दर्ज होते हैं, कुछ स्मृतियों में। किंतु विरले ही ऐसे होते हैं जो अपने समय की आशाओं में बस जाते हैं। योगी आदित्यनाथ उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं। जन्मदिन के पावन अवसर पर प्रार्थना केवल उनके दीर्घ जीवन की नहीं, उस विश्वास के दीर्घ जीवन की भी है, जो आज करोड़ों लोगों के हृदय में उनके नाम के साथ स्पंदित होता है।
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