CBSE BOARD : ये खबर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को सताएगी। हिंदी मीडियम से पढ़ने वाले छात्र अक्सर तीन भाषाओं में निपुण होते हैं। हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी को मिलाकर वो तीन भाषा बना लेते हैं। लेकिन इंग्लिश मीडियम से पढ़ने वाले छात्र अंग्रेजी में चुस्त-दुरुस्त तो होते हैं, लेकिन हिंदी में उनका ज्ञान बड़ा कमजोर होता है। कमजोर हिंदी वाले छात्र संस्कृत से ऐसा पीछा छुड़ाते हैं, जैसा बचपन में स्कूल छोड़ने वाले गार्जियन का हाथ हो। सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर अगले हफ्ते सुनवाई की तारीख मुकर्रर कर चुकी है। CBSE की कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्रों के लिए 3 भाषाओं को अनिवार्य करने वाली नई नीति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस मामले पर अब अगले हफ्ते सुनवाई होने की संभावना है, जिससे शिक्षा नीति को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
CBSE की नई नीति के तहत कक्षा 9वीं में छात्रों को तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया गया है, जिनमें दो अतिरिक्त भाषाएं शामिल हैं। इसी नियम को लेकर जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।
याचिकाकर्ता की आपत्ति
वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को उठाते हुए कहा कि—
छात्र अचानक नई भाषाएं कैसे सीखेंगे?
कक्षा 10 की परीक्षा में इसका बोझ कैसे संभालेंगे?
इससे शिक्षा व्यवस्था में “अराजकता” फैल सकती है
उनका कहना है कि यह नीति छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों सभी के लिए कठिनाई पैदा करेगी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए कहा कि इसे अगले सप्ताह सूचीबद्ध किया जाएगा, यानी अब इस पर जल्द सुनवाई होगी।
याचिका में क्या दावा किया गया है?
याचिका में कहा गया है कि CBSE की यह नई नीति छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव डाल सकती है। खासकर उन छात्रों के लिए यह चुनौतीपूर्ण है जिन्हें अचानक नई भाषाएं सीखनी पड़ेंगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
यह मामला देश की शिक्षा नीति और छात्रों के पाठ्यक्रम भार से जुड़ा हुआ है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस पर हस्तक्षेप करता है, तो CBSE की नई भाषा नीति में बदलाव संभव है।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है, जहां यह तय होगा कि CBSE की यह नई नीति जारी रहेगी या इसमें संशोधन होगा।
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