UP में भी मुस्लिम लीग के साथ चुनाव लड़ सकती कांग्रेस

UP

संजय सक्सेना

UP केरल में कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार बन चुकी है। इस गठबंधन में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि बहुमत के लिए कांग्रेस को उसके सहयोग पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ेगा। दक्षिण भारत के एक राज्य की इस जीत ने जहाँ कांग्रेस के लिए राहत की साँस दी है, वहीं मुस्लिम लीग के हौसले इतने बुलंद हो गये हैं कि उसकी नजर अब उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी टिक गई है।

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केरल में सरकार बनने के बाद इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग केरल से बाहर भी अपनी भूमिका की तलाश में जुट गई है और उसके द्वारा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाएँ तलाशी जा रही हैं। मुस्लिम लीग के इस कदम का राज्य की राजनीति पर गहरा असर पड़ना शुरू हो गया है। यह स्थिति सिर्फ केरल तक सीमित नहीं है, इसके प्रभाव की लहरें उत्तर प्रदेश और आगे चलकर अन्य रात्यों के चुनाव तक पहुँच सकती है। इसके लिये जहाँ 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों को लेकर सियासी बिसात बिछनी शुरू कर दी है,वहीं बसपा से भी कांग्रेस हाथ मिला सकती है।

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गौरतलब हो, मुस्लिम लीग की यूपी में संभावित चुनावी रणनीति अभी तक मुख्य रूप से सीट-आधारित और गठबंधन-आधारित दिखती है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार केरल में जीत के बाद कांग्रेस अपने लंबे समय के सहयोगी इंडियन मुस्लिम लीग  को दक्षिण के बाहर भी इस्तेमाल करने की रणनीति बना रही है, और उसका सबसे बड़ा टारगेट 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव माना जा रहा है । कांग्रेस द्वारा यूपी की मुस्लिम बहुल सीटों पर तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर अखिलेश यादव से गठबंधन नहीं होता, तो कांग्रेस इंडियन मुस्लिम लीग का यूपी में भरपूर इस्तेमाल कर सकती है।

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यानी कांग्रेस के मुस्लिम बहुल सीटों पर उम्मीदवार उतारने या समर्थन-आधारित दांव की संभावना है। यूपी में लीग का साथ लेकर कांग्रेस इससे सीधे बड़े राज्यव्यापी अभियान की शुरूआत कर कर सकती है, यह गठबंधन किसी बड़े गठबंधन के भीतर सीट-दर-सीट प्रभाव बनाने के लिए हो सकता है । यह रणनीति मुस्लिम मतदाताओं को यह संकेत देने के लिए भी हो सकती है कि पार्टी उनके प्रतिनिधित्व को गंभीरता से ले रही है।सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस आगे चलकर इंडियन मुस्लिम लीग का बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में भी उपयोग कर सकती है। फिलहाल, यूपी को  सबसे बड़ा लक्ष्य बताया गया है ।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट को लेकर सभी दलों की प्रतिस्पर्धा बढ़ी हुई है, और विश्लेषणों में कहा गया है कि 2027 में मुस्लिम वोट फिर से अहम भूमिका निभा सकता है । इसी कारण कोई भी दल अब केवल प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि सीधे राजनीतिक लाभ देने वाली रणनीति तलाश रहा है । बता दें, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम वोटों को लेकर राजनीतिक दलों में होड़ मची हुई है। समाजवादी पार्टी अपने कोर वोट बैंक को बचाने के लिए सक्रिय है, जबकि कांग्रेस, एआईएमआईएम और कुछ हद तक भाजपा भी मुस्लिम मतदाताओं तक पहुँचने की कोशिश कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। सूबे की कुल 143 सीटों पर मुस्लिम मतदाता अपना असर रखते हैं, जिनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसदी के बीच है, जबकि 73 सीटों पर यह 30 फीसदी से अधिक है। इंडियन मुस्लिम लीग के यूपी में चुनाव लड़ने की बात कहे जाने के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की प्रमुख विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है, जिससे प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छिड़ गई है। मुस्लिम लीग और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम यदि मिलकर मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर उतरती हैं तो यह समीकरण यूपी की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है। एआईएमआईएम ने बिहार और महाराष्ट्र में मुस्लिम बाहुल्य इलाकों पर फोकस किया और स्थानीय मुद्दों के साथ आक्रामक संगठन विस्तार किया, जिससे पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा है। हालाँकि 2022 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी, क्योंकि यूपी में मुस्लिम वोटर परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी के साथ जाता है।

फिर भी राजनीतिक पंडितों का मानना है कि केरल में मुस्लिम लीग की बढ़ती ताकत देखकर यूपी के मुस्लिम समुदाय में एक नई जागृति आ सकती है। यदि मुस्लिम लीग और ओवैसी की पार्टी मिलकर मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर एकजुट होकर लड़ती हैं, तो समाजवादी पार्टी का परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक टूट सकता है। अखिलेश यादव ने इस खतरे को भाँपते हुए मुस्लिम नेताओं की बैठक बुलाई है।उधर, पिछले कुछ समय से कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच जिस तरह की बयानबाजी देखने को मिली है, उसके बाद सपा-कांग्रेस गठबंधन को लेकर अटकलें लगती रहती हैं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने तो यहाँ तक कह दिया कि यूपी में कांग्रेस को किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है। यह बयान सीधे समाजवादी पार्टी पर चोट करने वाला था और इसने दोनों दलों के बीच खटास को और बढ़ा दिया।

बहरहाल,इतिहास गवाह है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन अक्सर कागज पर मजबूत गणित दिखाते हैं, लेकिन असल में दलों के बीच विश्वास और कार्यकर्ताओं का तालमेल बहुत जरूरी होता है। 2017 और 2019 के अनुभव बताते हैं कि सपा को इन गठबंधनों से फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ और दोनों दलों के वोट बैंक एक-दूसरे में अच्छी तरह स्थानांतरित नहीं हो पाए। ऐसे में कांग्रेस अब बसपा के साथ गठबंधन की संभावनाएं टटोल रही है। सियासी जानकारों का मानना है कि सपा से कांग्रेस की दूरी का फायदा मायावती को हो सकता है। यह समीकरण यदि बनता है तो यूपी की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हो सकता है।

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कांग्रेस का दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं पर जोर और बसपा का दलित आधार मिलकर एक नई शक्ति बन सकता है। बात बीजेपी की कि जाये तो उत्तर प्रदेश में भाजपा लगातार तीसरी बार बड़े बहुमत के साथ सत्ता में आने की तैयारी में है, जबकि समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव के नेतृत्व में विपक्षी दल का तमगा हटाकर सत्ताधारी दल बनने के लिए मैदान में उतर गई है। इन दोनों के अलावा कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी पर भी सबकी नजर होगी। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने मिशन-2027 का आगाज कर दिया है और मुसलमानों को जोड़ने का खास योजना बनाया है। यदि मुस्लिम लीग और AIMIM मिलकर यूपी की मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर उतरते हैं तो विपक्षी मतों का बिखराव भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। इतिहास यह भी बताता है कि जब-जब मुस्लिम मतदाता बँटे हैं, तब-तब भाजपा ने उसका लाभ उठाया है। ऐसा लगता है कि केरल में मुस्लिम लीग की बढ़ी ताकत, यूपी में ओवैसी का विस्तार, कांग्रेस-सपा में दरार और बसपा से नये गठबंधन की संभावना। ये सभी मुद्दे मिलकर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देश का सबसे जटिल और रोचक चुनावी मैदान बनाने वाले हैं। यूपी की 403 सीटों पर जो भी समीकरण बनेगा, वह न केवल प्रदेश की, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करेगा। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि मुस्लिम वोट का बिखराव किसको फायदा पहुँचाएगा और किसका सियासी किला ढहाएगा।


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