
राजेश श्रीवास्तव
Election Commission इन दिनों देश में अगर किसी व्यक्ति की चर्चा हो रही है तो भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की। वह निर्वाचन आयोग की गतिविधियों को लेकर सवालों के घेरे में हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर विपक्ष उन पर निशाना साध रहा है। लेकिन भारत में चुनाव के इतिहास में यह पहली बार नहीं है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद विवादों के घेरे में हो। पहले भी कई मौकों पर सीईसी को लेकर विवाद हुए हैं। लेकिन समस्या यह है कि लोग पुरानी या यूं कहें कि अपने कार्यकाल की बातें भूल जाते हैं।
भारत के निर्वाचन आयोग का गठन 25 जनवरी 1950 को एक स्थायी और स्वतंत्र सांविधानिक निकाय के रूप में हुआ था। सुकुमार सेन भारत के पहल निर्वाचन आयुक्त थे। उस वक्त केवल एक चुनाव आयुक्त ही होते थे। एक जनवरी 1990 को दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों के पदों को खत्म कर दिया गया और आयोग को फिर से एकल-सदस्यीय निकाय में बदल दिया गया। एक अक्तूबर 1993 को राष्ट्रपति की ओर से एक बार फिर दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई। तब से लेकर आज तक निर्वाचन आयोग स्थायी रूप से तीन-सदस्यीय निकाय (एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त) के रूप में कार्य कर रहा है।
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चूंकि चुनाव आयोग में यह बदलाव अचानक हुए और इसके पीछे सियासी मकसद होने की आशंका थी, इसलिए उस दौरान राष्ट्रपति के फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई। इस केस को एसएस. धनोआ बनाम भारत संघ, 1991 के नाम से जाना जाता है। इस केस में चुनाव आयोग के दो आयुक्तों के पदों को हटाने के फैसले पर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले को वैध ठहराते हुए निर्णय दिया कि सीईसी और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का दर्ज़ा समान नहीं है। न्यायालय ने माना कि मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के प्रशासनिक प्रमुख हैं और संविधान में केवल सीईसी का पद अनिवार्य है, जबकि अन्य आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर यानी ऐच्छिक है। आयोग के किसी भी मामले या मतभेद की स्थिति में निर्णय ज्यादातर सर्वसम्मति या फिर बहुमत (2:1) के आधार पर अनिवार्य किया गया।
जब ये व्यवस्था लागू की गई तो उस वक्त के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की शक्तियों में बराबरी के इस नियम को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। टीएन शेषन बनाम भारत संघ, 1995 के मामले में तत्कालीन सीईसी टीएन. शेषन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश और अधिनियम को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि बहु-सदस्यीय आयोग में तीनों आयुक्तों की शक्तियां समान हैं और संस्थागत फैसले बहुमत के आधार पर ही होंगे। भारत में मुख्य निर्वाचन आयुक्तों और निर्वाचन आयोग के फैसलों को लेकर अतीत में कई प्रमुख विवाद सामने आए हैं। 1989 के आम चुनावों की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति ने दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की, जिसे पेरि शास्त्री की शक्तियों और स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के प्रयास के रूप में देखा गया। उन पर अपने कार्यकाल के दौरान सिर्फ एक उपचुनाव कराने और अन्य रिक्तियों को न भरने का आरोप लगा था।
इसके अलावा, 1987 में कानून-व्यवस्था के आधार पर हरियाणा के चुनाव टालने लेकिन मेघालय में चुनाव की अनुमति देने को लेकर भी विवाद हुआ था। इसी तरह 1991 में शेषन के समय जब केंद्र सरकार ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पर्याप्त सुरक्षा बल देने से इनकार कर दिया, तो शेषन ने आदेश जारी कर दिया कि जब तक उनके अधिकार तय नहीं होते, चुनाव नहीं कराए जाएंगे। उन्होंने 199० में वीपी. सिह सरकार की ओर से वीएस. रमादेवी को कार्यकारी CEC नियुक्त करने के फैसले को असांविधानिक बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की थी। अक्तूबर 1993 में जब सरकार ने दो नए आयुक्तों की नियुक्ति कर आयोग को बहु-सदस्यीय बनाया और शक्तियों को बराबर किया, तो शेषन ने इसे अपनी स्वायत्तता घटाने की दुर्भावनापूर्ण कोशिश बताते हुए उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी।
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फिर 2002 में गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार जल्द चुनाव कराना चाहती थी। राज्यपाल एसएस भंडारी ने जुलाई 2002 में विधानसभा को उसका कार्यकाल पूरा होने से नौ महीने पहले ही भंग कर दिया। हालांकि, विपक्ष ने इस पर आपत्ति जताई। विपक्ष का आरोप था कि मोदी सरकार ऐसा करके संविधान का उल्लंघन कर रही है और छह महीने के अंदर दो विधानसभा सत्र के कराने की सांविधानिक जिम्मेदारी से बच रही है। तत्कालीन चुनाव आयुक्त जेएम. लिगदोह के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग ने भी राज्य में हुई सांप्रदायिक हिसा के मद्देनजर विधानसभा भंग करने के फैसले का सार्वजनिक तौर पर विरोध किया था। यहां तक कि लिगदोह के नेतृत्व वाले आयोग ने स्थिति का जायजा लेकर चुनाव टाल दिए।
चुनाव में हुई इस देरी को लेकर बाद में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिगदोह पर निशाना साधा था। इस पर लिगदोह ने कड़ा ऐतराज जताया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के गुजरात का चुनाव टालने के फैसले को सही ठहराया था। जनवरी 2009 में तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश कर दी। उन्होंने आरोप लगाया कि चावला सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ गुप्त रूप से संपर्क में रहकर पक्षपातपूर्ण काम कर रहे हैं। हालांकि, सरकार और राष्ट्रपति ने इस सिफारिश को खारिज कर दिया था।
साल 2017 में हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों के कार्यक्रमों की अलग-अलग घोषणा को लेकर ज्योति विवादों में आए। उन्होंने गुजरात में देरी का कारण बाढ़ राहत कार्य बताया, लेकिन खबरों में दावा किया गया कि राहत कार्य पहले ही पूरा हो चुका था। गुजरात चुनाव के दौरान विपक्षी दल की ओर से आयोग पर सत्तारूढ़ नेताओं के आचार संहिता उल्लंघन की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया। 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान, सत्तारूढ़ भाजपा के शीर्ष नेताओं को आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघनों के मामलों में दी गई क्लीन चिट पर तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने असहमति जताई थी। लवासा ने यह मांग रखी थी कि आयोग द्बारा जारी किए जाने वाले अंतिम प्रकाशित आदेशों और निर्णयों में उनके असहमति नोटों को भी आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किया जाए।
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सुनील अरोड़ा की अध्यक्षता वाले निर्वाचन आयोग ने लवासा की इस मांग को खारिज कर दिया। आयोग का तर्क था कि चुनाव आयोग के कार्यकारी आदेशों में अंतिम निर्णयों के साथ असहमति नोट संलग्न करने का कोई कानूनी या प्रशासनिक प्रावधान नहीं है। इसके बाद अशोक लवासा ने चुनाव आयोग से इस्तीफा दे दिया था। मई 2022 से फरवरी 2025 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे राजीव कुमार पर अपने कार्यकाल के दौरान विपक्षी दलों की ओर से निष्पक्ष न रहने के आरोप लगाए गए। विपक्ष का आरोप था कि राजीव कुमार सत्तारूढ़ दल के प्रति झुकाव रखते हैं।
मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी और EC में आंतरिक मतभेद: मई 2021 में, मद्रास हाईकोर्ट ने विधानसभा चुनावों के संचालन को लेकर टिप्पणी की थी कि निर्वाचन आयोग कोविड-19 की दूसरी लहर के लिए अकेले जिम्मेदार है। राजीव कुमार इस टिप्पणी के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एक अलग हलफनामा दायर करके आयोग का बचाव करना चाहते थे। हालांकि, तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा इस हलफनामे के खिलाफ थे। दोनों के बीच का यह मतभेद सार्वजनिक हो गया था। यानि कि चुनाव आयोग से विवाद नया नहीं है। पहले भी इसी तरह के विवाद देश की जनता ने देखे हैं।
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