
High Court लाहौर मोटरवे केस: DNA सबूतों के आधार पर बरकरार रही मौत की सजा
पाकिस्तान के चर्चित लाहौर मोटरवे गैंगरेप मामले में लाहौर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दो दोषियों की फांसी की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने आबिद अली और शफकत अली द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसके बाद वर्ष 2021 में आतंकवाद निरोधी अदालत (ATC) द्वारा सुनाई गई मौत की सजा यथावत रहेगी। यह मामला सितंबर 2020 में सामने आया था, जिसने पूरे पाकिस्तान को झकझोर कर रख दिया था। घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे थे।
क्या था पूरा मामला?
नौ सितंबर 2020 को पाकिस्तानी मूल की एक फ्रांसीसी महिला अपने तीन बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे पर यात्रा कर रही थी। रास्ते में उनकी कार का ईंधन खत्म हो गया, जिससे परिवार सुनसान इलाके में फंस गया। आरोप है कि इसी दौरान दो हमलावरों ने महिला को कार से बाहर निकालकर उसके बच्चों के सामने दुष्कर्म किया और परिवार से नकदी, गहने तथा अन्य सामान भी लूट लिया। इस घटना ने पाकिस्तान समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रिया पैदा की थी।
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कैसे पकड़े गए आरोपी?
घटना के बाद पुलिस ने विशेष जांच अभियान चलाया। जांच में मोबाइल फोन डेटा, लोकेशन ट्रैकिंग और DNA साक्ष्यों की मदद से आरोपियों तक पहुंचा गया। पीड़िता ने भी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दोनों आरोपियों की पहचान की थी। मार्च 2021 में आतंकवाद निरोधी अदालत ने दोनों को दुष्कर्म, अपहरण, डकैती और अन्य गंभीर अपराधों का दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की अपील?
अपील के दौरान दोषियों की ओर से साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए। हालांकि सरकारी पक्ष ने अदालत के समक्ष DNA रिपोर्ट, तकनीकी साक्ष्य और जांच से जुड़े तथ्यों को मजबूती से रखा। अदालत ने पाया कि निचली अदालत का फैसला पर्याप्त और ठोस साक्ष्यों पर आधारित था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषियों की अपील खारिज कर दी और मौत की सजा को बरकरार रखा।
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फैसले पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
इस फैसले पर कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने प्रतिक्रिया दी है। ब्रिटेन के सांसद रुपर्ट लो ने इसे सकारात्मक कदम बताया। वहीं एलन मस्क ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान के न्यायिक फैसले की सराहना की और हिंसक अपराधों के खिलाफ कड़ी सजा की आवश्यकता पर जोर दिया।
महिलाओं की सुरक्षा पर फिर छिड़ी बहस
इस मामले ने एक बार फिर महिलाओं की सुरक्षा, न्याय व्यवस्था और गंभीर अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत पर बहस तेज कर दी है। मानवाधिकार संगठनों और महिला अधिकार समूहों का कहना है कि ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष न्याय समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करता है।
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