
प्रापर्टी डीलर संदीप सिंह की हत्या से उपजे सवाल
पुलिस की नाक के नीचे हुई संदीप की हत्या
विजय श्रीवास्तव
Property Dealer Sandeep Singh प्रदेश के विभिन्न जनपदों में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट पर जिन अपराधियों को “जिला बदर” किया जाता है, क्या वे राजधानी लखनऊ में आकर राजनीतिक संरक्षण के बीच पनाह ले रहे हैं? क्या राजधानी का विशाल भू-भाग ऐसे अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है, जहां वे किसी बड़े माफिया गिरोह के लिए शूटर या सुपारी किलर जैसे जघन्य अपराधों में शामिल हो जाते हैं?
राजधानी में पिछले कुछ वर्षों में हुई कई सनसनीखेज हत्याएं ऐसे ही सवाल खड़े करती हैं। आखिर ये अपराधी कौन हैं और कहां से आते हैं? 27 मई को पीजीआई थाना क्षेत्र में दिनदहाड़े प्रॉपर्टी डीलर संदीप सिंह की हत्या ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि यह वारदात पुलिस चौकी के बिल्कुल पास फिल्मी अंदाज में अंजाम दी गई और अपराधी मौके से फरार हो गए। इस घटना ने मुख्यमंत्री के “जीरो टॉलरेंस” दावों पर भी सवालिया निशान लगा दिया है।
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संदीप सिंह हत्याकांड की तरह पहले भी राजधानी में कई दुस्साहसी वारदातें हो चुकी हैं। वर्ष 2023 में कैसरबाग कोर्ट परिसर के कोर्ट रूम नंबर-3 में वकील के भेष में पहुंचे शूटरों ने गैंगस्टर संजीव माहेश्वरी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। इसी प्रकार कुछ वर्ष पहले गोरखपुर के बाहुबली पूर्व विधायक वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या भी लखनऊ में हुई थी। उस हत्याकांड में कुख्यात माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम तेजी से उभरा था। माना जाता है कि उसी दौर में अपराध पर लगाम लगाने के लिए STF का गठन किया गया था, जो आज भी सक्रिय है।
संदीप सिंह की हत्या के बाद STF और पुलिस एजेंसियां भी सतर्क हो गई हैं। पुलिस विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दबी जुबान में स्वीकार किया कि इस प्रकार की दुस्साहसी घटनाएं पहले बिहार, बंगाल और नेपाल में अधिक देखने को मिलती थीं। लेकिन वहां अपराधियों पर सख्ती बढ़ने के बाद यह संभावना जताई जा रही है कि कई पेशेवर शूटर अब लखनऊ की ओर रुख कर रहे हैं। पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त कई अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जिला बदर किए जाने के बाद प्रशासन अक्सर यह जानने की कोशिश नहीं करता कि अपराधी आखिर कहां गया। वह अपराध छोड़ चुका है या किसी बड़े आपराधिक गिरोह का हिस्सा बन गया है, इसकी निगरानी लगभग नहीं के बराबर होती है।
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अपराध जगत से जुड़े कुछ पुराने नामी अपराधियों का भी कहना है कि इस तरह की दुस्साहसी घटनाओं को अंजाम देने वाले अपराधी अक्सर बिहार या फिर यूपी के आजमगढ़, जौनपुर, मिर्जापुर, मेरठ और बागपत जैसे इलाकों से जुड़े होते हैं। ये पेशेवर शूटर एक बड़ी वारदात को अंजाम देकर वर्षों तक भूमिगत हो जाते हैं। बताया जाता है कि ऐसे शूटर साल में एक-दो बड़ी घटनाओं को अंजाम देकर लाखों रुपये कमाते हैं और वारदात के बाद मोबाइल तक गंगा में फेंक देते हैं ताकि कोई सबूत न बचे। हालांकि अपराध कितना भी शातिर तरीके से किया जाए, कानून और वक्त के शिकंजे से बच पाना हमेशा संभव नहीं होता।
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