नहीं रहे बद्र, अब कौन कहेगा– ‘चराग़ों को आंखों में महफ़ूज़ रखना, बड़ी दूर तक रात ही रात होगी’

Poet Bashir Badr

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा
कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा!

Poet Bashir Badr मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र ने आज कुर्बानी के लिए मशहूर ईद-उल-अजहा के दिन दुनिया को अलविदा कहा। बशीर का नाम साहित्य की दुनिया में बड़े ही अदब और लिहाज से लिया जाता था। आज उन्होंने दुनिया से बेवफाई कर दी और इस जहां को छोड़कर अल्लाह के जन्नत की ओर रुख मोड़ लिया। बद्र को उर्दू जुबां का मसीहा यूं ही नहीं कहा जाता था। जब किसी मुशायरे में वो खड़े हो जाएं तो महफिल गुलजार हो जाया करती थीं। उन्होंने गुरुवार के दिन भोपाल में अंतिम सांस ली। वे 91 वर्ष के थे और लम्बे समय से डिमेंशिया जैसी खतरनाक बीमारी से पीड़ित थे।

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मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी/ किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी। जैसी शायरी को अपने जीवन में उतारने वाले बद्र साहब ने परिवारीजनों के अनुसार दोपहर लगभग 12 बजे दुनिया छोड़ी। उनके परिवार में पत्नी राहत और पुत्र तैयब हैं। पिछले काफी समय से उनकी स्मरण शक्ति कमजोर हो गई थी और वे लोगों को पहचानने में भी असमर्थ हो गए थे। बशीर बद्र ने उर्दू गजल को नया अंदाज और सरल भाषा दी। उनकी शायरी में मोहब्बत, जिंदगी, दर्द और सामाजिक संवेदनाओं की झलक दिखाई देती थी। उनके कई शेर देश भर में लोकप्रिय हुए।

‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’

और ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’ जैसे शेर आज भी लोगों की जुबां पर हैं। उन्होंने वर्ष 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी। बाद में वे मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में व्याख्याता रहे। वर्ष 1974 से 1990 के बीच उनकी शायरी को देश और विदेश में व्यापक पहचान मिली। परिजनों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार आज शाम भोपाल में किए जाने की संभावना है।

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दुनिया में तमाम ऊंचा मक़ाम हासिल करने के बाद एक बीमारी ने उनसे उनकी सबसे बड़ी ताक़त छीन ली थी। बशीर को भारत सरकार ने पदमश्री से सम्मानित किया और उनको साहित्य अकादमी के अलावा विभिन्न प्रादेशिक उर्दू एकेडमियों ने भी सम्मानित किया। बद्र अपनी बातों को बेहद सरल शब्दों में पिरोया करते थे और यही उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत रही। वे अपने पीछे जो कलाम छोड़ गए हैं उसकी एक बानगी और बातें फिर कभी…

न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।


नया लुक संवाददाता/लखनऊ


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