बालसाहित्य में गीतिका की अनूठी पहल: डॉ. दवे

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Poem आज के परिवेश में जहाँ अन्य विमर्श एक स्तरीय आयाम पर हैं, वहीं बालसाहित्य का क्षितिज एक विशेष विमर्श की माँग कर रहा है। बहुधा जब हम बालसाहित्य की बात करते हैं तो पाठ्यपुस्तक की कविता-कहानी सुनाकर इसे इतिश्री मान लेते हैं, लेकिन बालकों का साहित्य और उनकी जिज्ञासा किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के बारे में बता देना मात्र ही समाधान नहीं है। तब न केवल बालमन की कल्पना को तृप्त करना बल्कि उन्हें ऐतिहासिक, पौराणिक, राष्ट्रधार्मिक और शौर्यताओं से जोड़कर उनका चरित्रोन्मुखी विकास करना और उनमें पर्यावरण, रिश्तों के साथ-साथ नीति, ज्ञान व मनोरंजन से भरा साहित्य सृजन करना बालसाहित्य की परम आवश्यकता है।

ऐसा विचार कर साहित्यकार व अभिनेत्री गीतिका वेदिका ने समर्पयामि फ़ाउण्डेशन टीकमगढ़ (एमपी) के तत्वावधान में ‘बाल साहित्य गोष्ठी व विमर्श’ का आयोजन मई के प्रथम सप्ताह किया और बालगोपाल की अध्यक्षता में इसे नाम दिया ‘अम्मा की बगिया। इस भव्य बाल-सांस्कृतिक आयोजन के मुख्य अतिथि डॉ. विकास दवे, निदेशक साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन रहे। टीकमगढ़ के स्थानीय साहित्यकारगण आर पी तिवारी, गुलाब सिंह भाऊ, राजीव नामदेव राना, प्रमोद गुप्ता मृदुल, मुन्नालाल मिश्रा, सत्यनारायण तिवारी, एस आर सरल, स्वप्निल तिवारी, रविंद्र यादव, विशाल कड़ा, अनवर साहिल, एम एस श्रीवास्तव, लीना कुलथिया, रश्मि गोयल, मीनू गुप्ता, प्रीति सिंह परमार, अजीत श्रीवास्तव, पूरनचन्द्र गुप्ता, कौशल किशोर भट्ट, पं महेंद्र दिवेदी, शीलचन्द्र जैन, विजय मेहता, राम गोपाल रैकवार एवं चाँद मुहम्मद आख़िर (ज़िला समन्वय मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी) रहे सहित बाल-बालिकाएँ भी उपस्थित रहे।

डॉ. विकास दवे
डॉ. विकास दवे

गीतिका की माताजी उमा देवी पाराशर के जन्मदिवस पर आयोजित यह गोष्ठी एक बालसाहित्य कार्यशाला थी। स्वयं उमा देवी युवावस्था में सरस्वती शिशु मंदिर में संगीत पर बच्चों को बालगीत सिखाया करती थीं। उनसे प्रेरणा पाकर गीतिका वेदिका ने साहित्य में हस्तक्षेप किया। दीपप्रज्ज्वलन से ‘या कुंदेंदु तुषारहार धवला’ सरस्वती वंदना से प्रारंभ समारोह में मुख्यअतिथि डॉ. दवे का स्वागत तिलक लगाकर, शाल-श्रीफल और समर्पयामि का शुभंकर-चिन्ह ज्योतिदीप प्रदान कर गीतिका वेदिका और सरस्वती शिशु मंदिर के पूर्वविद्यार्थी योगेश्वर पाराशर ने स्वागत किया। ‘अतिथि पुस्तकार्पण सत्र’ में साहित्यकारों ने स्वरचित कृतियाँ उन्हें अर्पित की। मुख्य अतिथि डॉ. दवे ने कहा कि उमा देवी, मेरी पूर्ववर्ती आचार्या रहीं हैं, इस नाते मैं उनको प्रणाम करने आया हूँ। अब वे पन्नों पर लिखे बाल साहित्य के स्फुट गीत समेटें और संग्रह करें।

डॉ. दवे ने कहा कि गीतिका वेदिका ने नया प्रयोग यह कर लिया कि बालसाहित्य की गोष्ठी में लड्डूगोपाल से अध्यक्षता करायी है। इस तरह के नवाचार बालसाहित्य की आवश्यकता हैं। डॉ. दवे ने कहा कि उनका जीवनवृत्त हायरसेकेण्डरी करते ही सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य हो जाना रहा फिर वे प्रधानाचार्य हुये। कालांतर में वे विद्याभारती की बालसाहित्य पत्रिका ‘देवपुत्र’ के संपादक रहे। उन्होंने बताया कि जब पत्रपत्रिकाओं की लोकप्रियता घट रही थी तब देवपुत्र पत्रिका ने अपनी प्रसार संख्या 3 लाख, 71 हज़ार प्रतिमान कर विश्वकीर्तिमान स्थापित किया था। पराग और नंदन जैसी बाल पत्रिकाओं के स्तंभ ढह जाने पर चिंता व्यक्त करते हुये डॉ. दवे ने गीतिका वेदिका के बालसाहित्य आयोजन की आवश्यकता बतायी। उन्होंने गीतिका वेदिका रचित सरस और मनोवैज्ञानिक बालसाहित्य पर सबका ध्यान खींचा और बाल रचनाएँ रचने वाली गीतिका को दायित्व निर्वाह करते रहने को कहा।
अपने जीवनकाल में सात से आठ लाख बच्चों से सीधा संवाद करने वाले डॉ. दवे ने कहा कि कॉमिक्स आदि में जो महापुरुष बताये गये हैं, वे वास्तव में काल्पनिक हैं। वे आदर्श हो ही नहीं सकते। वीर शिवाजी, वीर सावरकर और महाराणा प्रताप जैसे महानायक हमारे पास हैं। हम उनके आदर्शों को अंगीकार करें और अपने जीवनसंघर्ष में नीति और साहस का पालन कर अपनी लड़ाई कर सकें।

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मेवाड़ की रक्षा करने वाले, हल्दीघाटी में अपनी वीरता प्रदर्शन कर अपने राष्ट्र का सम्मान रखने वाले महान योद्धा महाराणा प्रताप अस्सी किलो का भाला उठाते थे। उनकी रक्षा-जंजीर, कवच और शिरस्त्राण भारी लोहे के बने होते थे। उनका नाम इतिहास में शौर्य, साहस, पराक्रम और दृढ़त्याग के लिए अमर है। वे बच्चों के आदर्श होने चाहिए। साबू और चाचा चौधरी जैसे काल्पनिक पात्र नहीं| हम बालकों को वामपन्थ और पाश्चात्य प्रभाव से बचाकर ऐतिहासिक शौर्यताओं से अवगत करायें। अंत में उन्होंने कहा कि आज वे मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निर्देशक बनकर नहीं अपितु बालसाहित्य पर आवश्यक कार्य कर रहीं गीतिका वेदिका के आमंत्रण पर बाल-साहित्य की गोष्ठी में अपनी पूर्ववर्ती आचार्या बालकों को राष्ट्रधर्म के गीत सिखाने वाली उमादेवी पाराशर को प्रणाम कर शुभकामनाएँ देने आयें हैं। उन्होंने गीतिका वेदिका के इस विचार की सराहना की कि अपने माता-पिता के जन्मसमारोह आदि उनके सामने मनाना चाहिए, जिससे माता-पिता सुख पाएँ।

आयोजन के स्वल्पाहार घर में बनी व्यंजन गोरस सामग्री के साथ दोना पत्तल में परस पर पर्यावरण-मित्रता साथ ही दूषित पदार्थ थर्मोकोल आदि का निषेध करना सचमुच अम्मा की बगिया को सार्थक सिद्ध कर गया। आभारज्ञापन का विदाई-पाथेय प्रदान करते हुये संचालिका गीतिका वेदिका ने भावविभोर होते कहा कि बालसाहित्य के चिंतन पर परखदृष्टि रखने वाले डॉ. दवे ने आज हमारे घर आकर हमारे समर्पयामि-परिवार के आयोजन को कल्पना से भी अधिक सुंदर बना दिया। उपस्थित सभी साहित्यकार, बालक-बालिकाएँ और सहयोगी जन का आभार व्यक्त करते हुये कहा कि अब से ‘अम्मा की बगिया’ में ऐसी रचनात्मक गोष्ठी नियमित हुआ करेंगी। जिन्हें वे ‘बालसभा’ कहती हैं। वास्तव में टीकमगढ़ नगर में बाल-साहित्य की ऐसी गोष्ठी समर्पयामि जैसी नन्ही संस्था द्वारा किया जाना सराहनीय पहल है।

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