- इस बार सरकार ने प्याज की कीमत और भंडारण खुद करे को तैयार
- प्याज की कीमतों ने कई सरकारों की बदली किस्मत, जानिए पूरा इतिहास
आशीष द्विवेदी/ नया लुक संवाददाता
लखनऊ। भारत की राजनीति में प्याज सिर्फ एक सब्जी नहीं, बल्कि कई बार बड़ा चुनावी मुद्दा भी साबित हुआ है। बढ़ती कीमतों ने समय-समय पर सरकारों को मुश्किल में डाला और कई राजनीतिक समीकरण बदल दिए। ये एक बार नहीं रहा साल 1980 में प्याज के चलते जनता पार्टी की सरकार गई तो वर्ष 1998 में दिल्ली की मदन लाल खुराना सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में ‘शाइनिंग इंडिया’ के बड़े नारे के बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। जबकि स्वर्णित चतुर्भुज जैसी बड़ी सड़क परियोजना वह जमीन पर उतार चुके थे। इसके अलावा दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार भी प्याज के चक्कर में चली गई थी।
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साल 1980: जनता पार्टी की सरकार के दौरान प्याज की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई। विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। इंदिरा गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान प्याज की माला पहनकर जनता के बीच संदेश दिया कि सरकार महंगाई नियंत्रित करने में असफल रही है। उस समय नारा दिया गया- ‘जिस सरकार का कीमतों पर जोर नहीं, उसे देश चलाने का अधिकार नहीं।’ वर्ष 1980 के आम चुनाव में जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस सत्ता में लौट आई। राजनीतिक विश्लेषकों ने माना कि बढ़ती प्याज कीमतें हार की बड़ी वजह बनीं।
वर्ष 1998: दिल्ली में भाजपा सरकार पर पड़ा असर
दिल्ली में भाजपा की सरकार थी और मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री थे। प्याज की बढ़ती कीमतों को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू किया। दबाव बढ़ने पर भाजपा ने पहले मदन लाल खुराना की जगह साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन कीमतों पर नियंत्रण नहीं हो सका। इसके बाद सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने प्याज के दाम कम करने के लिए कई कदम उठाए, लेकिन राहत नहीं मिली। आखिरकार विधानसभा चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
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महाराष्ट्र में मिठाई के डिब्बे में भेजी गई प्याज
वहीं साल 1998 की दिवाली के दौरान महाराष्ट्र में प्याज की भारी किल्लत और महंगाई देखने को मिली। कांग्रेस नेता छगन भुजबल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को तंज कसते हुए मिठाई के डिब्बे में प्याज भेजी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने राशन कार्ड धारकों को 45 रुपये किलो बिक रही प्याज 15 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराई।
राजस्थान में भी बना बड़ा चुनावी मुद्दा
साल 1998 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी प्याज चर्चा के केंद्र में रहा। चुनाव हारने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने कहा था- ‘प्याज हमारे पीछे पड़ गया था।’ इसी दौर में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार भी महंगाई और प्याज की कीमतों को लेकर विपक्ष के निशाने पर रही। वाजपेयी ने तंज कसते हुए कहा था कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में नहीं होती, प्याज की कीमतें बढ़ जाती हैं।
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वर्ष 2010 : महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्याज उत्पादक इलाकों में भारी बारिश के कारण फसल खराब हो गई थी। दिल्ली में एक सप्ताह के भीतर प्याज के दाम 35 रुपये से बढ़कर 80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए।
साल 2013: दिल्ली में 15 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस सरकार को भी प्याज की महंगाई भारी पड़ी। 2013 विधानसभा चुनाव से पहले प्याज के दाम तेजी से बढ़े। तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भावुक होकर कहा था- ‘हफ्तों बाद मैंने भिंडी के साथ प्याज खाई है।’ भाजपा ने महंगाई को बड़ा मुद्दा बनाया और दिसंबर 2013 के चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
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One thought on “जब प्याज बना चुनावी हथियार, भारतीय जनता पार्टी गई थी हार”
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