अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘मनी, मनी, मनी स्वीटर दैन हनी एंड ग्रेटर दैन विक्टोरिया ।’ विक्टोरिया का मतलब विजय या जीत होता है। यह लैटिन लफ्ज है, जो कामयाबी को दर्शाता है। यह मशहूर ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया का नाम था, इसे विक्टोरियन एज से नवाजा जाता है। अभी युद्ध की आड़ में अमेरिका ने न सिर्फ दुनिया पर खासकर गल्फ मुल्कों पर जहां अपनी बादशाहत, अपनी सल्तनत फैलाना चाहता है। वहीं वहां के सनकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की गिद्ध दृष्टि अकूत काले धन पर टिकी हुई है, जिसे वह पूरी तरह से हजम करना चाहता है। कैसे और क्यों…? इस जारी जंग का वही एक मात्र कारण है।

जर्मनी का बड़ा तानाशाह हिटलर शाम को ‘ब्लैक मनी, ब्लैक मनी, ब्लैक मनी स्वीटर दैन हनी एंड ग्रेटर दैन विक्टोरिया। दुनिया की राजनीति में अक्सर युद्ध, प्रतिबंध और आर्थिक संकट दिखाई देते हैं, लेकिन इन सबके पीछे जो अदृश्य धागे होते हैं, वे अक्सर पैसा, सत्ता और संसाधनों की लालसा से बुने होते हैं। ईरान-इजरायल और अमेरिकी संघर्ष में जो तथ्य निकलकर सामने आ रहे हैं, वो बड़े चौंकाने वाले हैं। ईरान के कथित काले धन, तेल कारोबार और क्रिप्टो नेटवर्क की कहानियां अब निकलकर सामने आ रही हैं। हालांकि यह सिर्फ एक देश की कहानी नहीं है, यह उस वैश्विक व्यवस्था का आईना है जिसमें ताकतवर देश, कारोबारी और छाया में काम करने वाले वित्तीय नेटवर्क एकजुट होकर दुनिया की दिशा-दशा तय करते हैं।
बताया जाता है कि ईरान से जुड़े कथित धन को यूनाइटेड किंगडम (यूके) और कई खाड़ी देशों तक पहुंचाने के लिए क्रिप्टोकरेंसी कम्पनियों का जाल बुना गया। उसमें ‘जेडेक्स एक्सचेंज लिमिटेड और ‘जेडेक्सियल एक्सचेंज लि. जैसी दो कम्पनियां प्रमुख हैं। शुरुआत में इन कम्पनियों की मालकिन ब्रिटिश नागरिक एलिजाबेथ न्यूमैन बताई जाती थीं। लेकिन चार महीने बाद चुपचाप पासा उलटा हो गया। उन दोनों कम्पनियों का मालिक बाबक मुर्तजा नाम का एक शख्स बन गया, जो संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का पासपोर्ट धारक था। खुफिया एजेंसियों का दावा है कि यह बाबक मुर्तजा ही बाबक मोर्टेजा जंजानी है, जिसे दुनिया ‘तेल माफिया और ‘कालेधन का डॉन’ कहती है। इसी बाबक जंजानी को ईरान के गृह मंत्री एस्कंदर मोमेनी कालागारी के साथ अमेरिकी सरकार ने दुनिया भर में ‘ब्लैकलिस्ट’ किया था।
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अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार जंजानी उन पैसों का इस्तेमाल ईरानी सेना यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्र्स (IRGC) को वित्तीय सहायता देने, उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों और सैन्य क्षमताओं को मज़बूत करने के लिए करता था। जिसका सटीक इस्तेमाल एस्कंदर मोमेनी कालागारी किया करता था। गौरतलब है कि जंजानी कभी ईरान का बड़ा कारोबारी हुआ करता था, लेकिन बाद में उस पर तेल कारोबार में घपले और मनी लॉन्ड्रिंग के गम्भीर आरोप लगे। साल 2016 में ईरान की अदालत ने उसे मौत की सजा सुना दी, उस समय ईरान के रहबर यानी अयातुल्लाह अली हुसैनी खामनेई ही सर्वोच्च नेता थे। यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। यह उस जटिल वैश्विक तंत्र की कथा है, जिसमें तेल, प्रतिबंध, गुप्त सौदे और वित्तीय नेटवर्क एक-दूसरे से गुथे हुए हैं। दुनिया की कुछ बड़ी तेल कम्पनियों और अंतरराष्ट्रीय दबावों ने इस मामले को और जटिल बना दिया। बस क्या था? जंजानी के मौत की सजा माफ हो गई और उसे साल 2019 में ही चुपके से जेल से रिहा कर दिया गया। हालांकि आधिकारिक तौर पर उसी रिहाई वर्ष 2024 में हुई। लेकिन इस बीच वह दुनिया में ईरान के काले धन को खपाने और ऊंचे दर पर तेल बेचने का ताना-बाना बुनता रहा।
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जगजाहिर है कि जब भी खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, उसका असर सबसे पहले दुनिया भर के ऊर्जा बाजार पर दिखाई देता है। अबकी बार तबाही स्ट्रेट ऑफ हार्मोज के हिस्से आई। यानी वह संकरा समुद्री मार्ग, जहां से दुनिया भर के लिए तेल और गैस गुजरता है। यहां कई जहाजों पर मिसाइल गिरे और तेलयान धू-धू कर जल उठे। असुरक्षा के चलते कम्पनियों ने अपने-अपने क्रूज हटा लिए और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डगमगाती दिखने लगी। इसी कारण भारत समेत कई देशों में पेट्रोल, डीजल और गैस की आपूर्ति चिंताजनक रूप धारण कर चुकी है। पाकिस्तान का हाल भारत से भी बुरा है, वहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत करीब चार सौ रुपये के करीब पहुंच गई है।
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अभी कुछ दिनों पहले की बात है। एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। उस वीडियो में दुनिया में ऊर्जा प्रवाह लेकर जा रहे दो तेल कंटेनर आग की लपटों से भभक रहे थे। इसके अलावा कई और तेल जहाज़ों पर हमले दिखे। कई कंटेनरों को दुनिया ने धू-धू कर जलते हुए देखा। पश्चिम-एशिया में उठी युद्ध की यह लपटें भले ही हजारों किलोमीटर दूर हों, लेकिन उसका असर भारतीय रसोई तक पहुंच गया। गौरतलब है भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। जबकि कच्चे तेल के मामले में भारत 88 प्रतिशत दूसरों पर निर्भर है। लम्बे समय तक इस आयात का बड़ा हिस्सा उसी संवेदनशील समुद्री मार्ग से होकर आता रहा है, जिसे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ कहा जाता है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ है। इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धड़कन कहा जाता है। इसके उत्तरी तट पर ईरान और दक्षिण में ओमान तथा यूएई स्थित हैं। यह समुद्री गलियारा खाड़ी क्षेत्र को अरब सागर से जोड़ता है और अपने सबसे संकरे हिस्से में लगभग 33 किलोमीटर चौड़ा है।
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अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार वर्ष 2025 में प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल इसी जल मार्ग से होकर गुज़रा। यह वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत है, जिसकी वार्षिक कीमत करीब 600 अरब डॉलर आंकी जाती है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख ऊर्जा निर्यातक देश, सउदी अरब, ईराक, कुवैत, कतर और यूएई अपना अधिकांश तेल इसी मार्ग से दुनिया भर के बाजारों तक पहुंचाते हैं। ब्रिटेन की समुद्री सुरक्षा एजेंसी ‘यूनाइडेट किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस’ की मानें तो इरा$क के तट के पास दो तेल टैंकरों को ‘अज्ञात मिसाइल’ से निशाना बनाया गया। इसके अलावा यूएई के तट पर एक कंटेनर पर मिसाइल दागे गए। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने लोकसभा में भले ही चिग्घाड़-चिग्घाड़ कर कहा कि देश में कच्चे तेल के पर्याप्त भंडार है। लेकिन उसका असर देश की जनता के जेहन पर नहीं पड़ा। लोग घरेलू गैस, डीजल और पेट्रोल के लिए न केवल चिंतित हैं, बल्कि उसे ‘स्टोरÓ करने की जुगत भी भिड़ा रहे हैं। पूरे देश में सिलेंडर को लेकर चिल्ल-पों मचा हुआ है। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इसी मुद्दे को लेकर यूपी की राजधानी लखनऊ में बवाल काटा। वहीं जेल से छूटकर बाहर आए दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस मुद्दे पर न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गरजे, बल्कि उनकी काबीना पर भी जोर से बरस पड़े।
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अब सवाल यह कि यह युद्ध तेल के लिए हो रहा है या फिर काले धन के लिए? इसका सटीक जवाब भले ही न मिले, लेकिन यह आईने की तरह साफ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी निजी तिजोरी भरने के लिए ईरान के कालेधन पर वार करने को आतुर हैं। और कहीं ईरान पर कब्जा हो गया तो वह अमेरिका के लिए हजारों करोड़ की रकम ‘ईरानी तेल’ बेचकर कमा लेंगे। कूटनीति के जानकार कहते हैं कि अमेरिका अपने संघीय बजट का करीब 15 फीसदी हिस्सा राष्ट्रीय रक्षा के मुद्दे पर खर्च करता है। यदि वह दुनिया के देशों से युद्ध का ताना-बाना न तैयार करे तो वो अपने देश की जनता को कैसे ‘जस्टिफाई’ करेगा कि रक्षा खर्च सही है। ‘वॉटसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एवं पब्लिक अफेयर्स’ की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका अपनी जीडीपी की 3.5 फीसदी रकम रक्षा बजट पर खर्चती है। फ्रिकॉनोमैट्रिक्स की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका साल 1776 में अपनी स्थापना के बाद से करीब 90 फीसदी समय तक युद्ध या संघर्ष की स्थिति में रहा। यानी 240 वर्षों के इतिहास में वह 220 से अधिक साल तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी युद्ध या विदेशी सैन्य हस्तक्षेप में शामिल रहा है। विकीपीडिया की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में सैन्य हथियारों की सप्लाई का करीब-करीब आधा हिस्सा (42 प्रतिशत) अमेरिका अकेले पूरी करता है। अमेरिकी रक्षा कम्पनियां लॉकहीड मार्टिन, बोइंग और रेथियॉन दुनिया भर में फाइटर जेट, मिसाइल सिस्टम और उन्नत हथियार आपूर्ति करती हैं। इसके बाद के देशों में फ्रांस 9.8 फीसद, रूस 6.8 प्रतिशत और जर्मनी 5.7 परसेंट शामिल हैं।
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सवाल यह है कि आखिर इन वैश्विक खेलों (युद्ध) की कीमत कौन चुका रहा है? दुनिया के बड़े कारोबारी? विश्व की बड़ी-बड़ी राजनीतिक शक्तियां? दुनिया की नामचीन हस्तियां? इन सबका दो टूक लहजे में जवाब होगा-नहीं। इसकी कीमत चुकाता है केवल और केवल आम नागरिक। वह व्यक्ति जो अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए गैस सिलेंडर खरीदता है। जो रोज डीजल, पेट्रोल भरवाकर काम पर जाता है। जो महंगाई के हर नए झटके को चुपचाप सहता है। दुनिया में ऊर्जा और धन की यह राजनीति अगर इसी तरह चलती रही, तो आने वाले दिनों में संकट और गहरा हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र अधिक पारदर्शी बने, प्रतिबंधों और युद्ध की राजनीति के बजाय सहयोग और जवाबदेही की संस्कृति विकसित हो। दुनिया के पॉवरफुल देश अपने निजी हितों के लिए दुनिया पर युद्ध जैसा कारोबार न थोपें।
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