महिला आरक्षण को लेकर मायावती का विरोधियों तीखा प्रहार

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संजय सक्सेना

महिला आरक्षण अधिनियम के लागू होने के बाद देश की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई सीटें आरक्षित करने वाले इस कानून ने सभी दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया है। इसी सिलसिले में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबा पोस्ट लिखकर भाजपा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर सीधी चोट की है।

उन्होंने कांग्रेस को गिरगिट तक कह डाला है। मायावती का कहना है कि कांग्रेस दलित पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के मुद्दों पर दोहरा चरित्र अपनाती रही है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि देश के अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक अधिकारों के मामले में कांग्रेस का रिकॉर्ड कभी भरोसेमंद नहीं रहा।

मायावती ने आरोप लगाया कि जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तब इन वर्गों को आरक्षण का पूरा लाभ दिलाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। आज महिला आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस इन वर्गों की बात कर रही है लेकिन यह महज राजनीतिक मजबूरी है।

मायावती ने अपने पोस्ट में भाजपा पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भाजपा सत्ता में रहते हुए दलितों और पिछड़ों के हितों की अनदेखी करती रही है।

समाजवादी पार्टी को भी उन्होंने पिछड़े वर्गों के प्रति उदासीन बताया। बसपा प्रमुख ने चेतावनी दी कि महिला आरक्षण कानून का लाभ एससी एसटी और ओबीसी महिलाओं को मिलना चाहिए अन्यथा यह कानून मात्र दिखावा साबित होगा।

उन्होंने सभी दलों से अपील की कि वे इन वर्गों की महिलाओं के लिए वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें। यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

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इस खबर को गहराई से समझने के लिए हमें पहले महिला आरक्षण अधिनियम के संदर्भ को देखना होगा। यह कानून 128 संशोधन विधेयक के रूप में 2023 में पारित हुआ था। लोकसभा राज्यसभा और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान इसमें है। लेकिन इसका पूर्ण कार्यान्वयन 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद होगा जब परिसीमन होगा। इसी बीच मायावती का यह बयान राजनीतिक दलों के बीच आरक्षण के लाभार्थियों को लेकर हो रही बहस को तेज कर रहा है। बसपा हमेशा से दलित पिछड़े और अल्पसंख्यक वोट बैंक पर निर्भर रही है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां जातिगत समीकरण निर्णायक होते हैं वहां यह बयान बसपा की रणनीति का हिस्सा लगता है।

मायावती का कांग्रेस पर गिरगिट कहना कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद आरक्षण नीतियों को लागू तो किया लेकिन कई बार इसे कमजोर करने की कोशिश भी की। उदाहरण के तौर पर 1990 के मंडल आयोग की सिफारिशों के समय कांग्रेस ने विरोध किया था। वी पी सिंह की सरकार ने ओबीसी आरक्षण लागू किया तो कांग्रेस ने इसे अदालत में चुनौती दी। मायावती का इशारा इसी ओर है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सत्ता में रहते हुए एससी एसटी को प्रमोशन में आरक्षण देने से कतरा गई। 2006 में प्रमोशन में आरक्षण बिल लाने की कोशिश हुई लेकिन कांग्रेस सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। आज जब महिला आरक्षण आया तो कांग्रेस एससी एसटी ओबीसी महिलाओं के कोटे की बात कर रही है जो पहले कभी नहीं उठाई। यह राजनीतिक उलटफेर मायावती को चुभ रहा है।

भाजपा पर मायावती का हमला भी कम तीखा नहीं है। भाजपा ने महिला आरक्षण बिल पास कराया लेकिन इसमें एससी एसटी ओबीसी के उप कोटा का जिक्र नहीं है। विपक्ष ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी। मायावती का कहना है कि भाजपा सत्ता का दुरुपयोग कर दलितों के खिलाफ अत्याचारों को नजरअंदाज करती है। उत्तर प्रदेश में बसपा शासनकाल में मायावती ने दलितों के लिए कई योजनाएं चलाईं लेकिन अब वे कहती हैं कि भाजपा ने उन सबको उलट दिया। समाजवादी पार्टी पर भी उन्होंने चोट की जो यादव और मुस्लिम वोट पर केंद्रित है। सपा को पिछड़ों का ठेकेदार बताते हुए मायावती ने कहा कि यह दल अन्य पिछड़ों की अनदेखी करता है।

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इस बयान का राजनीतिक संदर्भ गहरा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में झटका लगा था। नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद सपा और कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं। बसपा मात्र एक सीट पर सिमट गई। अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। मायावती जानती हैं कि महिला आरक्षण बहस में दलित महिलाओं का मुद्दा उठाकर वे अपना वोट बैंक मजबूत कर सकती हैं। बसपा का कोर वोटर जाटव समुदाय है जो एससी का बड़ा हिस्सा है। मायावती का यह पोस्ट दलित युवाओं को लामबंद करने का प्रयास है।

कांग्रेस की स्थिति भी कमजोर नहीं है। राहुल गांधी ने हाल ही में जाति जनगणना की मांग उठाई है। वे कहते हैं कि महिला आरक्षण में एससी एसटी ओबीसी का उपकोटा जरूरी है। लेकिन मायावती इसे दिखावा मानती हैं। कांग्रेस का इतिहास देखें तो नेहरू काल में आरक्षण को अस्थायी बताया गया था। इंदिरा गांधी ने इसे मजबूत किया लेकिन सोनिया राज में भी प्रमोशन आरक्षण टला रहा। आज प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में सक्रिय हैं और दलित मुद्दों पर बोलती हैं लेकिन मायावती को भरोसा नहीं। गिरगिट वाली टिप्पणी इसी अविश्वास को दर्शाती है।भाजपा का पक्ष भी देखा जाए तो उन्होंने आरक्षण को संवैधानिक दर्जा दिया। मोदी सरकार ने एससी एसटी एक्ट को मजबूत किया। लेकिन मायावती के आरोप सत्ता के दुरुपयोग के हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार पर दलित अत्याचार के मामले बढ़ने का इल्जाम लगता है। बसपा इसे भुनाने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने भी महिला आरक्षण पर उपकोटा की बात की लेकिन मायावती उन्हें भी निशाने पर ले रही हैं।

महिला आरक्षण का असली सवाल लाभार्थी कौन होंगे। कुल सीटों का एक तिहाई महिलाओं को मिलेगा लेकिन एससी एसटी ओबीसी का अनुपात क्या होगा। संविधान में एससी के लिए 15 प्रतिशत एसटी के लिए 7.5 और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण है। लेकिन विधानसभाओं में यह लागू नहीं होता। लोकसभा में एससी एसटी सीटें आरक्षित हैं लेकिन ओबीसी नहीं। महिला आरक्षण में उपकोटा न होने से सामान्य वर्ग की महिलाओं को फायदा हो सकता है। मायावती इसी डर से चिंतित हैं। वे चाहती हैं कि दलित पिछड़ी महिलाओं को अलग कोटा मिले। इस बहस से देशव्यापी प्रभाव पड़ेगा। बिहार झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जातिगत समीकरण उलट सकते हैं। बिहार में नीतीश कुमार ने ओबीसी सर्वे कराया जो कांग्रेस भाजपा को असहज कर रहा है। मायावती का बयान बहुजन समाज को एकजुट करने का संदेश दे रहा है। बसपा अकेली पार्टी है जो दलित पिछड़े अल्पसंख्यकों को एक मंच देती है।

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मायावती की राजनीति हमेशा आक्रामक रही है। 1995 में वे पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं। 2007 में बसपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल किया। लेकिन उसके बाद पार्टी का ग्राफ गिरा। 2019 और 2024 में हार ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया। अब वे सोशल मीडिया का सहारा ले रही हैं। एक्स पर उनका पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंचा। यह डिजिटल युग की राजनीति का उदाहरण है। कांग्रेस का जवाब क्या होगा। पार्टी ने अभी चुप्पी साधी है लेकिन जल्द बयान आएगा। भाजपा प्रवक्ता भी इसे खारिज करेंगे। सपा ने भी प्रतिक्रिया दी होगी। लेकिन मूल मुद्दा वही है आरक्षण का विस्तार। क्या संसद में संशोधन होगा। क्या ओबीसी को विधानसभा में आरक्षण मिलेगा। ये सवाल 2029 तक गरमाएंगे।

मायावती का यह प्रहार सियासी दलों को आईना दिखाता है। वे कहती हैं कि वोट के लिए बहुजन समाज का इस्तेमाल होता है लेकिन हितों की रक्षा नहीं। दलित महिलाएं देश की आधी आबादी का हिस्सा हैं। शिक्षा रोजगार और राजनीति में उनकी भागीदारी कम है। महिला आरक्षण इसे बदल सकता है लेकिन उपकोटा जरूरी है। इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि महिला आरक्षण मात्र कानून नहीं बल्कि सियासी हथियार बन गया है। मायावती ने इसे बहुजन आंदोलन से जोड़ दिया। उत्तर प्रदेश में जहां 80 लोकसभा सीटें हैं वहां यह बहस चुनावी परिणाम बदल सकती है। बसपा फिर से उभरने की कोशिश में है। क्या वे सफल होंगी समय बताएगा। लेकिन यह बयान निश्चित रूप से राजनीति को नई दिशा देगा।

 

 

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