आपके बच्चे का स्वास्थ्य और विकास आपके हाथों में है। जन्म के बाद शुरुआती सालों में बच्चे की विशेष देखभाल अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इस दौरान आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से शिशु की अभ्यंग मालिश या तेल मालिश करने से उसके शारीरिक और मानसिक विकास में मदद मिलती है। जब आप अपने बच्चे की सही तरीके से मालिश करते हैं, तो यह केवल उसकी मांसपेशियों और हड्डियों को मजबूत नहीं करता, बल्कि उसे भावनात्मक रूप से भी सुरक्षित महसूस कराता है। तेल मालिश से वात दोष संतुलित रहता है।
जन्म के समय शिशु के शरीर में वात की मात्रा अधिक होती है, जिससे बच्चे में बेचैनी और कमजोरी महसूस हो सकती है। नियमित मालिश से बच्चे को आराम मिलता है और वात दोष कम होता है। इसके साथ ही तेल मालिश हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत करती है। आप तिल, सरसों या नारियल तेल का उपयोग कर सकते हैं। इससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और पोषक तत्व अंगों तक पहुंचते हैं। मालिश के बाद बच्चे को गहरी नींद आती है। नींद पूरी होने से मस्तिष्क का विकास बेहतर होता है और बच्चा मानसिक रूप से शांत रहता है। इसका लाभ भावनात्मक विकास में भी मिलता है। इसके अलावा पाचन प्रणाली भी मजबूत होती है, जिससे पेट दर्द, कब्ज और एसिडिटी जैसी परेशानियों से राहत मिलती है। नियमित मालिश रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है, जिससे बच्चे बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनते हैं।
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मालिश करते समय ध्यान रखें कि बच्चे की त्वचा बहुत नाजुक होती है। अधिक दबाव न डालें और मौसम के अनुसार तेल का चयन करें – सर्दियों में सरसों या तिल, गर्मियों में नारियल तेल। मालिश के बाद बच्चे को गुनगुने पानी से नहलाएं। शिशु की मालिश शुरू करने का सही समय जन्म के 2-3 सप्ताह बाद है। एक महीने का होने पर हल्की मालिश शुरू कर सकते हैं। जन्म के तुरंत बाद मालिश न करें क्योंकि त्वचा अत्यंत संवेदनशील होती है।
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