कफ सिरप विवाद-सर्दी खांसी की दवा से पैदा हुआ राष्ट्रीय अलार्म और अंतरराष्ट्रीय चिंता

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लखनऊ। भारत में पिछले कुछ समय से दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में एक कफ सिरप को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है,उसने न केवल भारत के कई राज्यों को कार्रवाई के लिए मज़बूर किया है, बल्कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय भी बन गया है। तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र राजस्थान और केरल जैसे राज्यों ने इस सिरप पर प्रतिबंध लगा दिया है, जबकि गुजरात समेत कई अन्य राज्यों ने इसकी जांच के आदेश दिए हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हुँ कि यह पूरा प्रकरण भारत के औषधि नियंत्रण ढांचे,दवा उद्योग की पारदर्शिता,और बच्चों की सेहत से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे, कफ सिरप विवाद- खांसी की दवा से पैदा हुआ राष्ट्रीय अलार्म और अंतरराष्ट्रीय चिंता- स्वास्थ्य सुरक्षा,नियमन और जवाबदेही पर व्यापक विश्लेषण साथियों बात अगर हम एक कफ सिरप विवाद की पृष्ठभूमि, प्रतिबन्ध तथा एक साधारण खांसी की दवा से कैसे मचा हाहाकार इसको समझने की करें तो एक कफ सिरप एक ओवर- द-काउंटर (ओटीसी) दवा के रूप में बाजार में बेची जा रही थी।

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यह सामान्य तौर पर सर्दी, खांसी और जुकाम से राहत के लिए दी जाती थी। इस सिरप का निर्माण कई छोटी फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा किया जा रहा था, और यह विभिन्न ब्रांड नामों से ग्रामीण और शहरी बाजारों में उपलब्ध थी। विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ राज्यों में स्वास्थ्य विभागों को रिपोर्ट मिली कि बच्चों को यह सिरप देने के बाद उल्टी, सांस लेने में तकलीफ और लिवर फेल्योर जैसी लक्षण सामने आ रहे हैं।मध्य प्रदेश और राजस्थान में कफ सिरप से हुई बच्चों की मौत के बाद महाराष्ट्र एफडीए ने कोल्ड्रिफ सिरप (बैच एसआर -13) की बिक्री और उपयोग पर रोक लगा दी है।यूपी ड्रग्स विभाग ने मेडिकल स्टोर में रखे गए कफ सिरप के जांच के आदेश दे दिए हैं,इस सिरप से अब तक एमपी में 16 और राजस्थान में 3 बच्चों की मौत होने की जानकारी मीडिया में आ रही है,इसके बाद जब प्रयोगशाला में जांच की गई, तो पाया गया कि इस दवा में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल जैसे अत्यंत जहरीले रासायनिक तत्व मौजूद हैं।इन दोनों रसायनों का उपयोग सामान्यतः एंटीफ्रीज़ के रूप में औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है, और इनका मानव शरीर में प्रवेश घातक साबित होसकता है। यही वह बिंदु था जिसने उस कफ सिरप को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद के केंद्र में ला दिया।किन राज्यों ने की कार्रवाई-तमिलनाडु से केरल तक बैन की लहर-इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद कई राज्यों ने तुरंत कदम उठाए।(1)तमिलनाडु सरकार ने सबसे पहले इस सिरप की बिक्री और वितरण पर रोक लगाने की घोषणा की। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि बच्चों में विषाक्तता के कुछ मामले देखने के बाद एहतियाती कदम उठाना जरूरी था। (2) मध्य प्रदेश ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) को आदेश दिए कि वे इस सिरप के सभी बैचों को बाजार से वापस लें और जांच रिपोर्ट आने तक इसकी बिक्री बंद रखें।(3) महाराष्ट्र सरकार ने इसी दिशा में कदम उठाते हुए सभी सरकारी अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स को नोटिस जारी किया कि वे इस सिरप को अपने स्टॉक से हटा दें।(4)केरल ने भी इसके उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया और केंद्र से यह स्पष्ट करने की मांग की कि आखिर इस दवा को ड्रग कंट्रोलअथॉरिटी की मंजूरी कैसे मिली।(5)गुजरात और उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों ने जांच शुरू कर दी है कि कहीं बाजार में बिक रही अन्य कफ सिरप में भी ऐसे ही हानिकारक तत्व तो नहीं हैं।

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साथियों बात अगर हम स्वास्थ्य मंत्रालय की चेतावनी, बच्चों को ‘कफ सिरप’ देने से पहले सोचें सौ बार इसको समझने की करें तो,केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक राष्ट्रीय एडवाइजरी जारी की है। इस एडवाइजरी में स्पष्ट कहा गया है कि दो साल से छोटे बच्चों को किसी भी प्रकार का कफ सिरप बिल्कुल नहीं दिया जाना चाहिए।”मंत्रालय ने डॉक्टरों, पैरेंट्स और फार्मासिस्टों से आग्रह किया है कि वे बच्चों के लिए ओटीसी (ओवर-द-काउंटर) दवाओं का उपयोग सोच- समझकर करें, क्योंकि कई बार इन दवाओं में मौजूद रासायनिक घटक बच्चे के शरीर के मेटाबॉलिज़्म के अनुरूप नहीं होते।यह सलाह ऐसे समय पर आई है जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहले भी भारत निर्मित कफ सिरपों से जुड़े मौतों पर चिंता जताई थी।2022-23 मेंगाम्बिया, उज्बेकिस्तान और कैमरून में कई बच्चों की मौत भारत में बनी कुछ खांसी की दवाओं के कारण हुई थी। यह नया मामला उसी चिंता को फिर से ताजा कर देता है।

साथियों बात अगर हमखतरनाक तत्व,डाइएथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल की घातकता को समझने की करें तो,अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह तत्व इतनाखतरनाक क्यों है।डाइएथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल दोनों ही औद्योगिक उपयोग के लिए बनाए जाते हैं। ये तरल पदार्थ गंधहीन, रंगहीन और मीठे स्वाद वाले होते हैं, जिसके कारण कई बार सिरप में सॉल्वेंट के रूप में गलती से या लापरवाही से मिल जाते हैं।लेकिन जब ये शरीर में जाते हैं, तो लिवर और किडनी इन्हें प्रोसेस नहीं कर पाती, और इनके टूटने से बनने वाले रासायनिक यौगिक शरीर के नर्वस सिस्टम, किडनी और ब्रेन को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्टों के अनुसार, डीईजी से हुई विषाक्तता किडनी फेल्योर, दृष्टि हानि, सांस लेने में रुकावट और अंततः मृत्यु तक का कारण बन सकती है।भारत में यह कोई पहली घटना नहीं है,1998 में दिल्ली में, और 2020 में जम्मू-कश्मीर में भी डीईजी  विषाक्तता से बच्चों की मौतें हो चुकी हैं।

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साथियों बात अगर हम दवा नियामक प्रणाली पर सवाल, जांच, जिम्मेदारी और जवाबदेही को समझने की करें तो, कफ सिरप प्रकरण ने भारत की ड्रग रेगुलेटरी सिस्टम की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।भारत दुनियाँ का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा निर्माता है और 200 से अधिक देशों को दवाएं निर्यात करता है। ऐसे में बार-बार भारतीय दवाओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तरपरसवाल उठना देश की छवि को भी प्रभावित करता है।यह मामला यह भी दिखाता है कि-(1)राज्य स्तरीय ड्रग टेस्टिंग लैब्स अक्सर ओवरलोड रहती हैं।(2)सैंपलिंग और क्वालिटी कंट्रोल में असमानता है। (3) कई बार लाइसेंसिंग अथॉरिटी स्थानीय राजनीतिक या औद्योगिक दबावों के कारण उदार रवैया अपनाती हैं।ऐसी स्थितियों में सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन की भूमिका और मजबूत करने की जरूरत है ताकि किसी भी बैच को बाजार में आने से पहले अनिवार्य रूप से कफ सिरप लॉजिकल टेस्टिंग से गुजारा जा सके। साथियों बात अगर हम जनता में भय और भ्रम की स्थिति को समझने की करें तो सोशल मीडिया के द्वारा आग़ और हवा से भी तेज गति से कफ सिरप के संबंध में स्वास्थ्य सुरक्षा का संकट फैलने की करें तो, सिरप पर बैन की खबरें फैलीं, लोगों में व्यापक भय और भ्रम फैल गया। कई जगह माता-पिता ने घरों में रखी सभी कफ सिरप की बोतलें फेंक दीं। मेडिकल दुकानों ने बिक्री बंद कर दी।डॉक्टरों के पास बड़ी संख्या में लोग यह पूछने पहुंचे कि कौन सी खांसी की दवा सुरक्षित है।यह परिदृश्य बताता है कि भारत में स्वास्थ्य संचार (हेल्थ कम्युनिकेशन) की प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत है।सरकार को ऐसे मामलों में तत्काल हेल्पलाइन, वेबसाइट और सूचना अभियान चलाने चाहिए ताकि अफवाहों से बचा जा सके और सहीजानकारी जनता तक पहुँच सके।

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साथियों बात कर हमअंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण,विश्व स्वास्थ्य संगठन और वैश्विक नियामक एजेंसियों की भूमिका को समझने की करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत के दवा नियामक निकायों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इसके अलावा यूएस एफडीए यूके, एमएचआरए और यूरोपीय औषधि एजेंसी जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भी भारत में बने फार्मास्युटिकल प्रोडक्ट्स पर नज़र रखे हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने बयान में कहा कि बच्चों की दवाओं में कोई भी ग्लाइकॉल बेस्ड टॉक्सिन की मौजूदगी वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है।”इस मामले का असर भारत की फार्मास्युटिकल एक्सपोर्ट इंडस्ट्री पर भी पड़ सकता है,विदेशी खरीदार भारतीय दवाओं की क्वालिटी सर्टिफिकेशन को लेकर ज्यादा सतर्कता बरतने लगे हैं, जिससे भारत की दवा कंपनियों की विश्वसनीयता और बाजार हिस्सेदारी पर असर पड़ सकता है। साथियों बात अगर हम कानूनी और प्रशासनिककार्यवाही तथा क्या दोषियों को सजा मिलेगी? को समझने की करें तो, स्वास्थ्य मंत्रालय और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने इस मामले की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गठित की है। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वेसंबंधित निर्माताओं,डिस्ट्रीब्यूटर्स और डीलरों के खिलाफ कार्रवाई करें। अगर जांच में यह सिद्ध होता है कि इन कंपनियों ने जानबूझकर या लापरवाही से खतरनाक तत्वों का प्रयोग किया है, तो ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट,1940 के तहत उन पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसमें तीन साल तक की जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है।

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साथियों बात अगर हमवैकल्पिक समाधान व बच्चों के लिए सुरक्षित दवा नीति की जरूर की करें तो,भारत को तत्काल एक नेशनल पेडिअट्रिक ड्रग सेफ्टी पालिसी की आवश्यकता है।इस नीति में शामिल होना चाहिए:- (1) बच्चों की उम्र के अनुसार दवाओं की सुरक्षित डोजिंग गाइडलाइन(2) टॉक्सिकोलॉजिकल टेस्टिंग के लिए अलग मानक (3) फार्मासिस्ट और डॉक्टरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम (4) ओटीसी (बिना पर्ची की दवा) बिक्री पर नियंत्रण (5) डिजिटल ट्रेसिंग सिस्टम ताकि हर दवा के बैच की जानकारी सार्वजनिक हो सके। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि स्वास्थ्य सुरक्षा में जवाबदेही का समय आ गया है, कफ सिरप विवाद सिर्फ एक दवा का मामला नहीं है, यह भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य शासन का आईना है। यह हमें याद दिलाता है कि दवा उद्योग में लाभ और लापरवाही के बीच बहुत बारीक रेखा है, और जब वह रेखा पार होती है, तो उसकी कीमत समाज को बच्चों की जान से चुकानी पड़ती है। भारत के लिए यह एक निर्णायक क्षण है,या तो वह अपनी दवा नियामक प्रणाली को पारदर्शी,वैज्ञानिक और जवाबदेह बनाए,या फिर ऐसी घटनाएं बार-बार देश की छवि और नागरिकों की सुरक्षा दोनों को नुकसान पहुँचाती रहेंगी।अंततः इस विवाद ने एक बड़ा संदेश दिया है,“हर खांसी का इलाज सिरप नहीं, बल्कि सतर्कता है। “स्वास्थ्य में विश्वास तभी संभव है जब दवा में पारदर्शिता हो।(BNE)

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