बस्तर में अजब संजोग: यहां की बड़ी घटनाओ में हर बार मरे 12 लोग ही

  • सरकारी आंकड़ों को वषों से झुठला रहे बस्तरवासी

31मार्च 1961 को लोहंडीगुड़ा में गोलीकांड

1876 में राजा भैरमदेव के शासनकाल में हुए बलवा की घटना से लेकर वर्ष 1978 में हुई किरंदूल गोलीकाण्ड में हर बार शासन की रिपोर्ट के अनुसार 12-12 लोग मारे गये।  वर्तमान नक्सली वारदातों में शहीद होने वाले जवानों  के आंकड़ों को छोड़ दिया जाए ये तो 121 वर्ष के पुराने बस्तर के इतिहास में पांच प्रमुख घटनाएं हुई और इन घटनाओं में हर बार सैंकड़ों लोगों की मृत्यु हुई है। ऐसा बस्तर के बुजूर्गों का मानना, परन्तु बस्तर के सरकारी दस्तावेजों में यह अंकित है कि कथित पांचों घटनाओं में बार 12-12 लोगों की ही मृत्यु हुई है।

1876 में हुआ था पहला विद्रोह

वर्ष 1876 में राजा भैरमदेव के शासनकाल में बलवा हुआ था इस घटना में लोग मारे गये थे और कई विद्रोही गिरफ्तार किये गये थे, लेकिन यहां का सरकारी रिकार्ड कहता है कि उक्त बलवा में 12 लोगों की मृत्यु हुई थी।

भूमकाल के भी 12 बताए

उक्त  घटना के 14 वर्ष महाराजा रुद्रदेव प्रताप के शासन काल में भूमकाल नामक विद्रोह हुआ था और विद्रोह का नेतृत्व गुण्डाधूर  ने किया था। इस विद्रोह में काफी लोगों के मारे जाने की बात बस्तर में चर्चित लोकगीतों और कहानियों में कही गई है परन्तु इस घटना के संबंध में बस्तर का सरकारी रिकार्ड कहता है कि भूम काल विद्रोह में 12 लोगों की मौत हुई थी।

लोहंडीगुड़ा में भी 12 बताया 

देश में  तीसरी बार आम चुनाव सम्पन्न होने वाले थे। इस समय राजनीतिक पार्टियां चाहती थी कि बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव उनकी पार्टी में शामिल हो जाएं लेकिन उन्होने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इससे नाराज तत्कालीन सरकार ने प्रवीरचंद भंजदेव को महाराजा पद से हटाकर इनके भाई विजयचंद्र भंजदेव को महाराजा बना दिया था और प्रवीर को जेल में कैद कर दिया गया था। इस घटना  की उपज है वर्ष 1961 का लोहंडीगुड़ा गोलीकांड। लोहण्डीगुड़ा में आदिवासियों ने विद्रोह कर दिया था जिससे दबाने के लिए पुलिस ने गोली चलाई थी। जिसमें कई लोग मारे गए। कई लाशें इंद्रावती में बहा दी गई थी, परन्तु इस घटना के संबंध में भी बस्तर का सरकारी दस्तावेज कहता है कि लोहण्डीगुड़ा गोली कांड में कुल 12 लोगों की मृत्यु हुई थी।

राजमहल कांड में भी 12 मारे

वर्ष 1966 में बस्तर स्टेट और मध्यप्रदेश शासन के बीच विवाद हुआ था। 25 मार्च 1966 को हुई इस गोलीबारी में सैंकड़ों आदिवासियों के मारे जाने की खबर थी। यहां के बुजूर्गों का कहना है कि राजमहल परिसर में या इसके आस पास मारे गये आदिवासियों की लाशें माचकोट जंगल में जला दी गईं और कई लाशें चित्रकोट की खाई में फेंक दी गई थीं लेकिन इस घटना के संबंध में भी बस्तर का सरकारी रिकार्ड बताता है कि राजमहल में हुई गोलीबारी के समय 12 लोग मारे गये थे।

किरंदुल भी मारे 12

बैलाड़ीला की खदानों में विश्व स्तरीय लोहे का भंडार है। सितम्बर 1978 में खदान प्रशासन और मजदूरों के मध्य विवाद हुआ था। जिसके चलते किरंदूल गोलीकांड हुआ। जिसमें काफी मजदूर मारे गये लेकिन इस घटना में भी मरने वालों की संख्या बस्तर का सरकारी रिकार्ड 12 ही बताया है। 121 वर्ष के बस्तर के खूनी इतिहास में हजारों लोग मारे गये लेकिन बस्तर के घटित पांच प्रमुख घटनाओं में सरकारी रिकार्ड के अनुसार मरने वालों की संख्या कुल 60 बताई गई है। यहां के बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जिस तरह बाढ़, भूकम्प या रेल दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या को सरकार कम कर के बताती आई है ठीक उसी तरह बस्तर की घटनाओं में मरने वालों की संख्या को कम करके बताया गया है।

 

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