
Anant Chaturdashi 2026: अनंत चतुर्दशी (जिसे अनंत चौदस भी कहा जाता है) सनातन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है, जो मुख्य रूप से भगवान विष्णु के अनंत (शाश्वत) रूप को समर्पित है। यह हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चौदहवें दिन (चतुर्दशी तिथि) को मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व हिंदू और जैन दोनों ही धर्मों में बहुत अधिक है।
भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु के ‘अनंत शयन’ (क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हुए) रूप की ध्यान और आराधना करते हैं। ‘अनंत’ का अर्थ है जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत, अर्थात स्वयं श्री नारायण माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजन करने से जीवन के सभी दुखों और पापों से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
ये भी पढें
जमीन कब्जे की शिकायत पर सख्त हुए CM योगी, दबंगों पर कार्रवाई के निर्देश
14 गांठों वाला ‘अनंत सूत्र’ इस व्रत का सबसे मुख्य नियम अनंत सूत्र (या अनंत का डोरा) बांधना है। यह रेशम या सूती धागा होता है जिसमें 14 गांठें लगाई जाती हैं। ये 14 गांठें भगवान विष्णु द्वारा बनाए गए 14 लोकों (भूर, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यः, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल) का प्रतीक मानी जाती हैं। पूजा के बाद पुरुष इसे अपने दाहिने हाथ पर और महिलाएं इसे अपने बाएं हाथ पर बांधती हैं।
गणेश विसर्जन का अंतिम दिन यह दिन उत्सव के लिहाज से भी बहुत बड़ा है क्योंकि इसी दिन 10 दिनों से चले आ रहे गणेशोत्सव का समापन होता है। श्रद्धालु पूरे गाजे-बाजे के साथ ‘गणपति बप्पा’ की मूर्तियों का पवित्र जलाशयों या समुद्र में विसर्जन (गणपति विसर्जन) करते हैं।

जैन समुदाय (विशेषकर दिगंबर जैन) के लिए यह दिन बेहद आध्यात्मिक होता है। इस दिन उनके सबसे महत्वपूर्ण 10-दिवसीय पर्व ‘पर्युषण पर्व’ का समापन होता है। साथ ही, जैन मान्यता के अनुसार 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य ने इसी दिन निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था।
अनंत चतुर्दशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाठ हारकर वन में कष्ट सह रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए। तब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से इस दुःख भरे सागर से निकलने और अपना राज्य पुनः पाने का उपाय पूछा। श्रीकृष्ण ने उन्हें सभी पापों का नाश करने वाला अनंत व्रत करने की सलाह दी और एक कथा सुनाई।
प्राचीन काल में सुमंत नाम के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। उनकी पुत्री का नाम सुशीला था, जिनका विवाह कौंडिन्य ऋषि के साथ हुआ था। एक बार विदाई के बाद आश्रम लौटते समय रास्ते में शाम हो जाने पर वे यमुना नदी के तट पर रुके। वहां सुशीला ने कुछ महिलाओं को सुंदर वस्त्र पहनकर भगवान अनंत की पूजा करते देखा।
ये भी पढें
सुशीला के पूछने पर महिलाओं ने उन्हें अनंत व्रत का महत्व बताया। सुशीला ने उसी समय रेशमी धागे में चौदह (14) गांठें लगाकर भगवान अनंत का वह डोरा अपने हाथ में बांध लिया। जब कौंडिन्य ऋषि को इसके बारे में पता चला, तो उन्होंने इसे भगवान का अपमान मानकर उस डोरे को गुस्से में निकालकर आग में जला दिया।
इस अनादर के कारण कौंडिन्य ऋषि का सारा धन और वैभव नष्ट हो गया। अपनी इस दुर्दशा का कारण समझने के बाद ऋषि पश्चाताप करते हुए भगवान अनंत की खोज में वन में निकल पड़े। बहुत भटकने और कष्ट सहने के बाद, जब ऋषि बेहोश होकर गिर पड़े, तब भगवान अनंत प्रकट हुए और उन्हें अपनी गलती का अहसास कराया। भगवान ने ऋषि से कहा कि यदि वे घर लौटकर विधि-विधान से 14 वर्षों तक इस अनंत व्रत को करें, तो उनके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। कौंडिन्य ऋषि ने वैसा ही किया और उन्हें फिर से सुख-समृद्धि की प्राप्ति हुई। श्रीकृष्ण की प्रेरणा से युधिष्ठिर ने भी यह व्रत किया, जिसके परिणामस्वरूप पांडवों को महाभारत के युद्ध में विजयश्री और खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ।
नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews
बाराबंकी में 1.50 करोड़ की हेरोइन के साथ तस्कर गिरफ्तार
राष्ट्रीय सेवा योजना दिवस पर अभिमुखीकरण कार्यक्रम आयोजित
शादीशुदा महिला को दूसरे युवक संग देख आया तैश, पुराने आशिक ने हंसिए से किया वार

