मायावती और आकाश को सीख देने वाले अपने अतीत की ओर भी तो देख लें…
राजेश श्रीवास्तव
Mayawati and Akash : इन दिनों सूबे में अगर किसी राजनीतिक दल की चर्चा हो रही है या यूं कहें कि भाजपा से भी ज्यादा किसी दल की चर्चा है तो वह है बसपा की। जिसके पास न तो एक भी विधानसभा सदस्य है न विधान परिषद। यानि कि हाशिये पर चली गयी बसपा लेकिन चर्चा में इस कदर है कि पूछिये मत। कारण यह है कि उसके 1०-12 फीसद वोट बैंक को लूटने के चक्कर में सबसे उतावली समाजवादी पार्टी दिख रही है। हालांकि BJP भी पीछे नहीं है वह भी दलित वोट बैंक को चारा डालने में पीछे नहीं है। इस पर बात आगे बढ़ाऊं उसके पहले एक जिक्र करना बहुत जरूरी है।
इन दिनों समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकता बसपा को नसीहतें देते नजर आ रहे हैं कि परिवार में इस तरह का आचरण नहीं होना चाहिए। मायावती को आकाश और ईशान को नहीं निकालना चाहिए।
आकाश के लिए उन्होंने दरवाजे खोल दिया है मानो आकाश को लेकर वह दलितों की 1०-12 फीसद वोट बैंक को हासिल कर ही लेंगे। लेकिन समाजवादियों को आज से ठीक 1० साल पहले की घटना को भी नहीं भूलना चाहिए। इससे भी बड़ा वाकया 2०16 में यानि कि 1० साल पहले इन्हीं दिनों इनके परिवार में भी हुआ था, वह दिन शायद लोग भूल रहे हैं लेकिन हम खबरनवीसों को अच्छी तरह याद है, वैसा दिन तो आज तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज तक देखा ही नहीं गया। बात अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल की है जब चाचा शिवपाल से उनकी ठनी है। उनके कार्यकर्ताओं ने तो समाजवादी पार्टी कार्यालय में कालर तक पकड़ लिया था। मुख्यमंत्री आवास पर युवा दो खांचे में बंट गये थे एक वर्ग चाचा के साथ तो दूसरा अखिलेश के समर्थन में नारा लगा रहा था, ‘जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है’ और इसी ताकत के सहारे अखिलेश ने अपने चाचा से छुट्टी पा ली थी। इसका हश्र यह हुआ कि एक साल बाद 2०17 जब चुनाव हुए तो सपा साफ हो गयी।
यही हाल कमोवेश इन दिनों BSP में चल रहा है । जब चुनाव मात्र छह महीने दूर है जहां हर दल चुनाव की तैयारियों में जुटा है तब मायावती की पार्टी पर ग्रहण लगा हुआ है। दलित वोटों की एकमात्र हकदार मायावती अपने कुनबे की कलह में डूबी हुई हैं। भतीजों आकाश और ईशान से उन्होंने छुट्टी पा ली लेकिन लोग मायावती को जानते नहीं हैं। उन्होंने एक झटके में अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से सन्यास दिला दिया और आकाश से भी छुट्टी पा ली। अब साफ कर दिया है कि वह अपने भतीजों को अपनी विरासत नहीं सौपेंगी। अब मायावती के सामने यह चुनौती है कि आगामी विधानसभा चुनावों में दलित वोटों को किस तरह साधें। आकाश को मायावती ने जब बाहर कर दिया है तो उनको पाने के लिए सारे राजनीतिक दल बिछे जा रहे हैं। अखिलेश यादव ने उनके लिए दरवाजे खोल दिये हैं।
एक कार्यकता ने तो यहां तक कहा कि अगर आकाश आयें तो उनको Deputy CM का पद और अभी प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी जायेगी। खैर समाजवादी पार्टी का इसमें कोई जवाब नहीं है वह सरकार बनने से पहले ही मंत्री पद तक बांट लेते हैं। उन्हें तो बस वोट बैंक दिखना चाहिए।
सूत्रों की मानें तो अशोक सिद्धार्थ आकाश आनंद के साथ मिलकर BSP में टिकटों के वितरण को लेकर खासा खोल कर रहे थे जिसकी भनक मायावती को लग गयी और उन्होंने दोनों को अपने दांव से चित कर दिया। मायावती के पास भले ही कोई विधायक न हो लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वही मायावती हैं जिन्होंने मुलायम सिंह यादव को चित किया भाजपा से दो-दो हाथ किये। जब चरखा दांव के माहिर मुलायम को उन्होंने चित किया और उत्तर प्रदेश में तीन-तीन बार सरकार बनायी तो अखिलेश के दांव उनके सामने कुछ नहीं है। आकाश को लेने के लिए आतुर समाजवादी पार्टी और भाजपा दोनों को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।
क्योंकि आकाश के पिता आनंद यानि कि मायावती के भाई दृढ़ निश्चय के साथ मायावती के साथ खड़े हैं और राजनीतिक विरासत से भले ही आकाश बाहर हो गये हैं लेकिन मायावती के आर्थिक विरासत के इकलौते हकदार उनके भाई आनंद ही हैं, यह किसी को नहीं भूलना चाहिए। ऐसे में तय है कि आकाश आनंद बगावत नहीं करेंगे और देर-सबेर माफी मांगकर बसपा में ही राजनीति करेंगे और मायावती भी बुआ हैं, मान ही जायेंगी। मायावती ने राजनीति का नया कार्ड चला है उन्होंने भतीजी दीपिका को लाकर जेन-जी समेत महिला कार्ड खेला है जो किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है। मायावती ने बहुत सफाई से दलित-जेनजी-महिला इंजीनियरिंग करने की कोशिश की है।
लेकिन उत्तर प्रदेश की जनता यह देख रही है कि दलितों के हितैषी कौन से राजनीतिक दल हैं। सपा को लगता है कि अगर आकाश उसके साथ आ गये तो पाँच – छह फीसद दलित वोट उसके साथ आ ही जायेगा। इसी 4-5 फीसद वोट के लिए ही समाजवादी पार्टी ने रंग बदल लिया। छात्र इकाई की ड्रेस नीली कर दी। गांव-गांव डा. अंबेडकर की जयंती मना ली। अब सिफ समाजवादी के पहले बहुजन लगाना ही बाकी है। अगर यह भी हो जाये तो बड़ी बात नहीं होगी। जिसने रंग बदल लिया हो वह नाम बदलने में कितना देर लगायेगा। और नाम तो रोज अखिलेश पीडीए का बदल ही रहे हैं।
फिलहाल आकाश आनंद के बूते खुद को सियासत के आकाश में छाने की उम्मीद पर पलीता लगना तय है कि क्योंकि आकाश का आनंद यानि कि उनके पिता तो मायावती के साथ ही है। और आकाश के लिए अब बुआ और पिता दोनों को छोड़ना आसान नहीं होगा क्योंकि उनके ससुर की राजनीतिक हैसियत इतनी नहीं है कि वह BSP से इतर कुछ कर सकें। हां इतना जरूर है कि मायावती के दलित वोट में सेंध तो लगी है अब देखना यह है कि मायावती इस डेंट से कैसे निजात पायेंगी। फिलहाल सियासत है तो इसके अपने रंग हैं और अब कितना समय बचा है सब कुछ बहुत जन्द सामने आ जायेगा।
नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews
ये भी पढें
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों एवं पशु क्रूरता प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया
गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत के नियम
संडे को टीम इंडिया का डबल धमाल, एक दिन में खेलेगी दो बड़े मुकाबले
नीली ड्रेस को लेकर केशव मौर्य ने सपा पर साधा निशाना
चीनी मिल संघ के रिटायर प्रधान प्रबंधक ने किया करोड़ों का गोलमाल!
नहर में डूब रही महिला के लिए ‘देवदूत’ बने दो छात्र, जान की परवाह किए बिना बचाया जीवन
वंदे मातरम पर कांग्रेस से भिड़े उमर अब्दुल्ला, बोले- क्या कश्मीरियों को जेल भेजना है?

2 thoughts on “मायावती और आकाश को नसीहत देने से पहले सपा अपने अतीत में झांके”
Comments are closed.