
राजेश श्रीवास्तव
UP Politics 2027 : कहते हैं कि भेड़िया कितना भी शेर की खाल ओढ़ ले लेकिन वह भेड़िया ही रहता है। कुछ इसी तरह का हाल इन दिनों समाजवादी पार्टी का है। हर रोज PDA का नारा जपने के बाद अखिलेश यादव अब मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए नतमस्तक हैं। आजम खां को वोटों की खातिर सहेजने के लिए वह सीतापुर जेल में मुलाकात करने के बाद रामपुर में उनके घर पर भी हाजिरी लगा कर आ गये। आजम खां की भाषण शैली कितनी भी अच्छी क्यों न हो लेकिन आज भी लोग उनका कार्यकाल नहीं भूले हैं।
हम लोगों को अच्छी तरह याद है कि आजम खां किस तरह का व्यवहार अपने अधिकारियों और मातहतों के साथ करते थे। आजम का व्यवहार शायद ही किसी को पंसद आता हो । न उनका व्यवहार अच्छा था और न ही उनका बोलने का तरीका। उन्होंने अधिकारियों को तनखईया बताया तो जया प्रदा के अंर्तवस्त्रों का रंग बताने का करतब भी मंच से कर डाला। अब उन्हीं आजम के पैरों में गिरकर SP अध्यक्ष पता नहीं किस समाज का वोट सहेजने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही आजम के भी कई छोटे मुकदमे दर्ज कर दिये गये हों, उन पर ज्यादती लोगों को महसूस हो रही हो लेकिन आजम इतने सरल नहीं थे। उनकी भ्रष्टाचार की कहानी आपको रामपुर ही नहीं पूरे प्रदेश में पसरी मिल जायेंगे। लेकिन SP अभी भी उनका मोह नहीं छोड़ पा रही है। शायद इसीलिए समाजवादी पार्टी से आम हिंदू जो सामान्य वर्ग का है, वह अपने को जोड़कर सहज नहीं महसूस करता है।

आजम खां
इन दिनों उत्तर प्रदेश के 15 जिलों में अखिलेश यादव के खिलाफ माफिया और दंगों के आरोपों वाले पोस्टर सामने आए हैं। वहीं, 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम वोट बैंक साधने के लिए अखिलेश ने रामपुर जेल में आजम खान से मुलाकात की। यह मुलाकात SP के PDA फॉर्मूले और सियासी समीकरणों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। उत्तर प्रदेश के 15 जिलों में समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव को निशाना बनाने वाले पोस्टर सामने आए हैं। इन जिलों में लखनऊ, बलिया, मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, वाराणसी, बस्ती, हरदोई और सीतापुर शामिल हैं।
अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और आजम खान की तस्वीरों वाले इन पोस्टरों पर लिखा है – क्या आप SP पर भरोसा कर सकते हैं? सभी माफिया भाई-भाई हैं। 2013 की UPPSC भर्ती परीक्षा का जिक्र करते हुए, पोस्टरों में दावा किया गया है कि 86 चयनित उम्मीदवारों में से 56 एक विशेष जाति से थे। कुछ पोस्टरों में मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर अखिलेश यादव की आलोचना की गई है, जिसमें लिखा है – दंगे, इफ्तार और बिरयानी – यही है SP शासन की असली कहानी। इसके अलावा, अखिलेश सरकार के दौरान कब्रिस्तानों की चारदीवारी बनाने के लिए 200 करोड़ रुपये आवंटित किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। पोस्टर पर लिखा है – खैनी और बनारसी पान- बजट तो कब्रिस्तान में चला गया।
मुख्तार अंसारी
अखिलेश ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश की रामपुर जेल में पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान से मुलाकात के बाद कहा, आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे। यादव, खान से मिलने रामपुर गए थे, जो पिछले साल 17 नवंबर से जेल में बंद हैं। इन दोनों नेताओं की पिछली मुलाकात सात नवंबर को लखनऊ में हुई थी, जो खान के जेल जाने से ठीक 10 दिन पहले की बात है। गुरुवार को हुई यह मुलाकात लगभग एक साल के अंतराल के बाद हुई है और इसे राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है। 20027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह मुलाकात काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। साफ है कि अखिलेश के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले में ‘ए’ का मतलब ‘अल्पसंख्यक’ है। मुस्लिम मतदाता और यादव समुदाय, पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी का मुख्य वोट बैंक रहे हैं। इनके समर्थन के बिना सत्ता में वापसी करना मुश्किल होगा। हाल के दिनों में आजम के खेमे में इस बात को लेकर नाराजगी थी कि समाजवादी पार्टी इस वरिष्ठ नेता के साथ मजबूती से खड़ी नहीं है। आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और पार्टी में सबसे प्रमुख मुस्लिम चेहरा बने हुए हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 20 जिलों की 100 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत है। रुहेलखंड क्षेत्र में, मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी मुरादाबाद में 47.12 प्रतिशत, रामपुर में 50.57 प्रतिशत, संभल में 45 प्रतिशत और अमरोहा में 38 प्रतिशत है। पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड की कई विधानसभा सीटों पर खान का काफी प्रभाव है। समाजवादी पार्टी शायद इसी वोट बैंक को सहेजने का प्रयास कर रही है। उसे लगता है कि आजम के बहाने वह मुस्लिम वर्ग का वोट एकजुट सहेज लेगी। लेकिन दिलचस्प यह भी है कि बीते विधानसभा चुनाव में आजम खां रामपुर तो छोड़िये, अपना बूथ तक नहीं बचा पाये थ्ो।भले ही कानूनी पेंच के चलते आजम खान, उनकी पत्नी और उनके बेटे खुद चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं, फिर भी पश्चिम उत्तर प्रदेश और खासकर मुस्लिम सियासत में आज भी उनका प्रभाव सबसे बड़ा माना जाता है। जौहर यूनिवर्सिटी पर मंडराते कानूनी संकट, विपक्षी दलों की घेराबंदी और आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को साधने के लिहाज से अखिलेश और आजम की होने वाली यह मुलाकात उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन गई है।

वर्तमान में जौहर यूनिवर्सिटी पर इनकम टैक्स और प्रवर्तन निदेशालय का शिकंजा कसता जा रहा है। यूनिवर्सिटी पर अनकाउंटेड फंड और अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं, जिससे आजम खान के लिए यह उनके राजनीतिक वजूद का सबसे बड़ा संकट बन गया है। यही वजह है कि इस मुलाकात में जौहर विवि को बचाने और इसे मुख्य मुद्दा बनाने पर प्रमुखता से चर्चा हुई। दबाव के बीच यह मुलाकात SP के लिए डैमेज कंट्रोल और बड़ी रणनीति तय करने का मुख्य आधार साबित होगी।
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