ईरान युद्ध में MQ-9 ड्रोन हुए फेल, फिर भारत ने अमेरिका से क्यों की डील?

MQ-9 Drone

ईरान में MQ-9 ड्रोन पर संकट

MQ-9 Drone: ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका के MQ-9 ड्रोन को हुए नुकसान ने इनकी क्षमता और सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। ईरान की ओर से दावा किया गया है कि युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में अमेरिकी MQ-9 ड्रोन गिराए गए। इसके बावजूद भारत ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स से दो MQ-9B Sea Guardian ड्रोन को लीज पर लेने का समझौता किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब युद्ध में इन ड्रोन को नुकसान पहुंचा है तो भारत इन पर भरोसा क्यों कर रहा है? दरअसल, भारतीय नौसेना लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र की निगरानी के लिए MQ-9B ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है। मौजूदा लीज खत्म होने के कारण रक्षा मंत्रालय ने नौसेना के लिए दो MQ-9B Sea Guardian को अगले 30 महीनों के लिए लीज पर लेने का करार किया है। इस सौदे की कीमत करीब 1,943 करोड़ रुपये बताई गई है।

हिंद महासागर की निगरानी में अहम भूमिका

भारतीय नौसेना के सामने हिंद महासागर के विशाल समुद्री क्षेत्र की निगरानी की बड़ी चुनौती है। समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ आतंकवाद, ड्रग तस्करी, समुद्री डकैती और क्षेत्र में बढ़ती चीनी नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखना भी जरूरी है। ऐसे में MQ-9B Sea Guardian जैसे ड्रोन नौसेना के लिए महत्वपूर्ण साबित होते हैं। ये लंबे समय तक लगातार उड़ान भर सकते हैं और समुद्र के बड़े हिस्से पर निगरानी रख सकते हैं। इनके जरिए खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोही अभियानों को अंजाम दिया जा सकता है।

क्या है MQ-9B Sea Guardian की खासियत?

MQ-9 कोई सामान्य ड्रोन नहीं है। यह एक बड़ा Remotely Piloted Aircraft System (RPAS) है, जिसे जमीन पर मौजूद ऑपरेटर नियंत्रित करते हैं। इसकी लंबाई करीब 36 फीट और विंगस्पैन लगभग 80 फीट है। MQ-9B को हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस यानी HALE श्रेणी के ड्रोन के तौर पर जाना जाता है। यह लंबे समय तक ऊंचाई पर उड़ान भरकर निगरानी कर सकता है। Sea Guardian को विशेष रूप से समुद्री अभियानों के लिए तैयार किया गया है। इसमें अत्याधुनिक सेंसर और विभिन्न पेलोड लगाए जा सकते हैं, जिससे समुद्री क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना आसान होता है।

ईरान युद्ध में क्यों उठे सवाल?

ईरान युद्ध के दौरान अमेरिकी MQ-9 ड्रोन को नुकसान पहुंचने की खबरों ने इनकी सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज कर दी है। ईरान की ओर से बड़ी संख्या में MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा किया गया है। हालांकि, ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग मामलों में जरूरी है। दरअसल, किसी भी युद्ध क्षेत्र में ड्रोन को दुश्मन की एयर डिफेंस प्रणाली से खतरा रहता है। MQ-9 जैसे बड़े और अपेक्षाकृत धीमे प्लेटफॉर्म आधुनिक मिसाइल प्रणालियों की पहुंच में आ सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ड्रोन का पूरा सिस्टम बेकार हो गया। इनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि मिशन के दौरान मानव पायलट सीधे युद्ध क्षेत्र में मौजूद नहीं होता। अगर किसी ड्रोन को मार गिराया जाता है तो उसके साथ पायलट की जान जाने का खतरा नहीं होता।

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फिर भारत क्यों ले रहा है MQ-9?

भारत के लिए MQ-9B का सबसे बड़ा फायदा लंबी दूरी की निगरानी और लंबे समय तक हवा में बने रहने की क्षमता है। हिंद महासागर जैसे विशाल क्षेत्र की लगातार निगरानी के लिए हर मिशन में मानवयुक्त विमान भेजना महंगा और संसाधन-गहन हो सकता है। भारतीय नौसेना के पास P-8I जैसे अत्याधुनिक समुद्री टोही विमान भी हैं, लेकिन हर निगरानी मिशन के लिए मानवयुक्त विमान का इस्तेमाल जरूरी नहीं है। MQ-9B ऐसे मिशनों में अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध कराता है। यानी भारत के लिए MQ-9B का इस्तेमाल लड़ाकू विमान के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि समुद्री निगरानी और टोही क्षमता को मजबूत करने वाले प्लेटफॉर्म के रूप में ज्यादा महत्वपूर्ण है।

भारत पहले ही कर चुका है 31 MQ-9B की डील

भारत ने अक्टूबर 2024 में अमेरिका से 31 MQ-9B Predator ड्रोन हासिल करने का समझौता किया था। इस पैकेज में करीब 31 ड्रोन के साथ संबंधित हथियार, सेंसर और अन्य उपकरण शामिल हैं।

इनमें दो प्रमुख वेरिएंट शामिल हैं—Sky Guardian और Sea Guardian

  • 15 Sea Guardian भारतीय नौसेना को दिए जाने हैं।
  • 16 Sky Guardian भारतीय सेना और वायुसेना के लिए हैं।
  • सेना और वायुसेना को 8-8 Sky Guardian मिलने हैं।

इन ड्रोन के जरिए भारत को LAC से लेकर हिंद महासागर तक निगरानी क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

लीज पर लिए गए दो ड्रोन क्यों जरूरी?

31 नए MQ-9B की डिलीवरी शुरू होने में समय लग रहा है। इसी बीच भारतीय नौसेना के पास मौजूद MQ-9B की मौजूदा लीज अवधि समाप्त हो रही है। इसलिए नौसेना की निगरानी क्षमता में कोई अंतर न आए, इसके लिए दो Sea Guardian ड्रोन को दोबारा लीज पर लिया गया है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इन ड्रोन में आधुनिक सेंसर और पेलोड लगे हैं, जो भारतीय नौसेना को समुद्री क्षेत्र में लगातार Intelligence, Surveillance and Reconnaissance (ISR) कवरेज देने में मदद करेंगे।

युद्ध में नुकसान के बावजूद ड्रोन क्यों अहम?

ईरान युद्ध में MQ-9 को हुए नुकसान से यह जरूर साफ होता है कि कोई भी सैन्य प्लेटफॉर्म युद्ध क्षेत्र में पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। लेकिन किसी हथियार या निगरानी प्रणाली की उपयोगिता सिर्फ इस आधार पर तय नहीं होती कि उसे कभी मार गिराया गया या नहीं। MQ-9B की उपयोगिता उसकी लंबी उड़ान क्षमता, निगरानी सेंसर, कम परिचालन लागत और मानव पायलट को खतरे से दूर रखने जैसी खूबियों में है। भारत का फोकस फिलहाल इन ड्रोन के जरिए हिंद महासागर में लगातार निगरानी क्षमता मजबूत करने पर है।

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