कहीं के राजा नहीं थे बंगाल वाले राम मोहन राय

Rammohan

गरीब राममोहन को नकली राजा क्यों घोषित किया गया?

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

Rammohan एक गरीब परिवार का बच्चा था। बंगाल के हुगली जिले के राधानगर में रमाकांत और तारिणी देवी के पुत्र। ब्राह्मणों में बहुत से गरीब लोग होते है। गरीबी के कारण उनका सम्मान कम नहीं होता। सम्पन्न ब्राह्मणों के रिश्ते शीलवान गरीब ब्राह्मण से होते ही रहते है। गरीबी ब्राह्मणों के लिए कोई उपहास की बात नहीं है। ईस्ट इंडिया कम्पनी कोई व्यापारिक कम्पनी नहीं थी। वह समुद्री डकैतों और छिनैतों तथा लूटेरों की कम्पनी थी। ऐसे ही बेरोजगार छोकरों को उसमें भर्ती किया जाता था जो भ्रष्टाचार, लूट, झूठ और अपराध में कभी झिझके नहीं। किसी भी तरह धन लूटकर या बटोर कर या जुटाकर कम्पनी को दे सके और स्वयं भी अपने वेतन की व्यवस्था कर सके। जाहिर है कि ऐसे में वे लोग जो आमदनी जुटाते थे, उसका एक हिस्सा दबाकर रख लेते थे। यद्यपि कम्पनी अपनी ओर से बड़ी कडाई से हिसाब जांचती थी।

लंदन का अभिजात वर्ग का कोई भी व्यक्ति कम्पनी से नहीं जुडा था। कर्मचारी तो वहां के आवारा बेरोजगार वर्ग से ही आते थे। कम्पनी के मालिक लोग भी इंग्लैड के मध्यवर्ग के ही थे। कोई भी सम्भ्रांत व्यक्ति कभी ईस्ट इंडिया कम्पनी का अधिकारी बनकर नहीं आया। कम्पनी के भारतीय प्रबंधकों के अपराधों और लूट के मामलों पर इंग्लैण्ड की संसद में दो बार मुकदमे चले और बीसों बार कम्पनी की निंदा ब्रिटिश संसद में की गई।

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सबसे पहले काली मिर्च तथा मसालें भारत से ले जाकर बहुत महंगे दामों में इंग्लैण्ड तथा आसपास के राज्यों में बेचना शुरू किया। फिर कम्पनी ने तम्बाकू, चाय और कॉफी के भी व्यापार पर हाथ आजमाया लेकिन वस्तुतः उन्हें व्यापार के कोई नियम मान्य नहीं थे, छल फरेब, कपट प्रपंच और लूट तथा डकैती को ही वे व्यापार कहते थे। बंगाल के अनेक सूबेदारों में से एक छोटे सूबेदार इब्राहिम खांन से कम्पनी के लोगों ने दोस्ती बनाई। उनके लिए लगान वसूली का ठेका लिया। फिर उनसे 1690 में सूतानाटी, गोविन्दपुर और कोलकाता का दलदली इलाका मांग कर जॉब चारनॉक ने तम्बाकू रखने की कोठी बनाई और बगल में अपना निवास भी बनाया। धीरे-धीरे वे फैलने लगे। कोलकाता में ही एलेक्जेंडर डफ ने हिन्दुओं को ईसाई बनाने के प्रयोजन से 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की और एक प्रसिद्ध जमीदार देवेन्द्रनाथ ठाकुर को हिन्दू से ब्राह्मों बनाने में सफलता प्राप्त की। धीरे-धीरे अंग्रेजों के संरक्षण में कम्पनी से लाभ पाने वाले लोगों का एक वर्ग ब्राह्मों बन गया और वेदांत के नाम से वेद और बाइबल को एक बताने का तथा जीसस को भगवान का सर्वश्रेष्ठ अवतार बताने का प्रचार फैलने लगा। कम्पनी जरूरत मदों को नौकरी देने लगी।

गरीबी से परेशान राममोहन राय ने नौकरी पाने के लिए थोडी अंग्रेजी सीखी ओर 34 वर्ष की आयु में वे कम्पनी के क्लर्क हो गये। 6 वर्ष तक क्लर्की की। मेधावी होने के कारण उन्होने अंग्रेजी की दक्षता प्राप्त कर ली। इस बीच 1810 में वाश्प चालित प्रिंटिंग प्रेस चलन में आया और कम्पनी ने इसके जरिये लोगों को अपने अनुकूल बनाने के लिए अखबार निकालने की प्रेरणा राममोहन राय को दी। ईसाई मिशनरियों के वे विश्वास पात्र हो गये और 56 वर्ष की आयु में वे ब्राह्मो समाज के मुख्य व्यक्तियों में से एक बन गये। इस बीच उन्होने ईस्ट इंडिया कम्पनी के महाप्रबंधक से निकटता प्राप्त की। जिसे कम्पनी का गवर्नर जनरल कहा जाता था और जिसे 1947 के बाद कुछ मूर्ख भारतीय भारत का गवर्नर जनरल लिखते है। जबकि वे स्वयं को कम्पनी का गवर्नर जनरल ही लिखते थे।

वेंटिक को प्रसन्न करने के लिए राममोहन ने सती प्रथा का शोर मचाया। वेंटिक को ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश राज्य के समक्ष सफाई देनी होती थी कि वह बंगाल में व्यापार करने जाकर वहां के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप क्यों करने लगा है। इसमें उसे राममोहन राय का साथ मिला। कम्पनी उसे गवाह के रूप में इंग्लैण्ड ले गई कि हां, सचमुच बंगाल में भयंकर सती प्रथा है और कम्पनी बड़ा मानवतावादी कार्य कर रही है। इसी के साथ राममोहन ने बार-बार कम्पनी के अधिकारियों से निवेदन किया कि भारत में संस्कृत और बांग्ला को शिक्षा का माध्यम न रख कर अंग्रेजी माध्यम रखा जाये। इसी में भारत का उद्धार है। यद्यपि बंगाल में विधवा को सम्पत्ति पर सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त होने से सामान्यतः वहां से विधवाएं या तो मथुरा वृन्दावन जाकर दानपुण्य और भजन पूजन करती थी या बंगाल में ही रहकर सम्पत्ति का बहुत बड़ा हिस्सा धर्म कार्य में लगाती थी।

ईसाई मिशनरियों को इसी से बहुत आपत्ति थी और उन्होंने सती प्रथा का झूठा प्रचार कर दिया तथा अपने कुछ एजेंट्स को इस काम में लगाया कि वे कुछ परिवारों को इसके लिए उकसाये कि उनके परिवार की विधवा सती हो जाये ताकि सम्पत्ति संतानों को मिल सके। फिर इसका ही अतिरंजित प्रचार कर दिया। जबकि स्वयं इंग्लैण्ड में उस समय तक स्त्री को ‘‘परसन’’ नहीं माना जाता था और स्त्री को आत्माविहीन वस्तु की तरह देखा जाता था। राममोहन राय ने इस नितांत झूठ को फैलाने में कम्पनी की और ईसाई मिशनरियों की बहुत बड़ी सेवा की।

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रूहेला लुटेरे गुलाम कादिर ने दिल्ली पर आक्रमण कर मुगलों के उत्तराधिकारियों को सार्वजनिक रूप से नाच करने को विवश किया। जब इसकी सूचना महादजी सिंधिया को मिली तो उन्होंने गुलाम कादिर को मार भगाया। तब शाह आलम द्वितीय का बेटा अकबर द्वितीय महादजी सिंधिया की शरण में गया और उन्हें अपना संरक्षक बनने की प्रार्थना की जिसे महादजी ने मान लिया। तब से अकबर द्वितीय दिल्ली में अपने छोटे से इलाके में सुरक्षित हो गया। परन्तु अंग्रेज जो सिंधिया से एक बार हार चुके थे, दूसरी बार कुछ अन्य मराठों से संधि कर फिर से शक्ति बढ़ाने लगे और तब उन्होंने अकबर द्वितीय को कहा कि तुम इस छोटे इलाके के भी नवाब नहीं हो। अपनी मालगुजारी वगैरह वसूलने का जिम्मा कम्पनी को दो और हम तुम्हें लंदन से कुछ पेंशन दिला देगें।

इसके लिए तुम आवेदन करो। तब अकबर द्वितीय ने कहा कि किससे दरख्वास्त लिखवाये। इस पर कम्पनी वालों ने कहा कि किसी राजा की बात ही हमारे ब्रिटिश अधिकारी सुनेगें, इसलिए तुम हमारे मुंशी राममोहन राय को एक राजा होने की सनद लिख दो। फिर यह तुम्हारा आवेदन लेकर लंदन जायेगें। तो हमारे सम्राट तुम्हारी विनती सुनेगें। इस पर से अकबर द्वितीय ने अपने एक राजकीय पत्र में राममोहन राय को राजा घोषित कर दिया। राममोहन राय आवेदन बनाकर ले गये, परन्तु जार्ज पंचम ने वह आवेदन ठुकरा दिया। अकबर द्वितीय ठोकरे खाता रहा। फिर कम्पनी ने बहादुर शाह जफर को उस इलाके का जागीरदार माना। जब धर्म योद्धाओं का समूह फिरंगियों को मारते काटते दिल्ली पहुँचे तो बहादुर शाह जफर ने उनका साथ देना स्वीकार किया। परन्तु अनेक भारतीय राजाओं विशेषकर राजपूतों और सिखों ने अंग्रेजों की मदद की और भारतीय धर्म योद्धा पराजित हो गये। जफर को मांडले की जेल में डाल दिया गया। जहां वे तडप-तडप के मर गये।

इस प्रकार राममोहन राय को एक पेंशन का आवेदन करने को विवश मुगल जागीरदार ने पेंशन बढ़ाये जाने के लालच में अपने एक कागज में जिसकी उस समय कोई विधिक मान्यता नहीं थी, राममोहन राय को राजा लिख दिया। अब जो लोग राममोहन राय को राजा लिखते है, वे कितने दयनीय है, यह स्पष्ट है। राममोहन राय को अंग्रेजों ने भी सदा अपना सेवक ही माना और बंगाल के कुलीन ब्राह्मण सदा उनको धर्म भ्रष्ट और पतित विधर्मी मानते थे। भटकते हुए राममोहन राय बाद के दो वर्षों में इंग्लैण्ड के ब्रिस्टल शहर में एक सामान्य ईसाई की तरह जीवन जीते रहे। उनकी मृत्यु 27 सितम्बर, 1833 को ब्रिस्टल शहर में हुई और आर्नोस वेल कब्रिस्तान (सीमेट्री) में उन्हें दफनाया गया।

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